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    चंबल पुल पर फिल्मी स्टिंग, शीशा तोड़कर गर्भवती को निकाला:प्रेग्नेंट बनकर पहुंची थी, डॉक्टर बनी ननद; भ्रूण का लिंग परीक्षण करने वाले गिरोह को पकड़ा

    4 hours ago

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    दोपहर करीब तीन बजे का समय था। मुरैना से धौलपुर की ओर जाती सड़क पर चंबल नदी का पुल शांत दिखाई दे रहा था। तभी अचानक दो कारें तेज रफ्तार में पुल की ओर बढ़ती नजर आईं। देखने वालों को लगा मानो दोनों के बीच कोई रेस चल रही हो, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा खतरनाक थी। पहली कार के भीतर एक गर्भवती महिला की सोनोग्राफी चल रही थी। कार के अंदर पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन लगी थी और भ्रूण का लिंग पता लगाने की अवैध प्रक्रिया जारी थी। दूसरी कार में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की टीम थी, जो इस पूरे खेल को रंगे हाथ पकड़ने के लिए पिछले कई महीनों से जाल बिछाए बैठी थी। गिरोह के सदस्यों को भरोसा था कि जैसे ही कार चंबल पुल पार करेगी, राजस्थान की सीमा शुरू हो जाएगी और वे सुरक्षित हो जाएंगे। उन्हें यह नहीं पता था कि जिस गर्भवती महिला की जांच की जा रही है, वही NHM टीम की डिकॉय (स्टिंग का जरिया) है। उसके साथ बैठी “ननद” असल में मध्यप्रदेश की सरकारी डॉक्टर थी, जो पूरे ऑपरेशन की अहम कड़ी बनी हुई थी। पुल खत्म होते ही अचानक पीछा कर रही दूसरी कार ने पहली कार को साइड से टक्कर मार दी। कार सड़क से नीचे उतर गई और रुकने को मजबूर हो गई। टीम तुरंत उतरी, लेकिन कार अंदर से लॉक थी। कुछ ही सेकेंड में पत्थरों से शीशे तोड़े गए, दरवाजा खोला गया और गर्भवती महिला व डॉक्टर को सुरक्षित बाहर निकाला गया। फिल्मी अंदाज में हुए इस स्टिंग ऑपरेशन के साथ ही चलती कार में भ्रूण लिंग परीक्षण करने वाले नेटवर्क का बड़ा राज खुल गया। चलती कार में सोनोग्राफी, बॉर्डर पार कर बचने की थी योजना जांच में सामने आया कि यह गिरोह लंबे समय से मध्यप्रदेश के बॉर्डर क्षेत्रों में सक्रिय था। गिरोह पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन को कार में इंस्टॉल कर देता था और फिर गर्भवती महिलाओं को बैठाकर चलती गाड़ी में ही सोनोग्राफी की जाती थी। इसका मकसद साफ था कि यदि बीच में कोई टीम पकड़ने पहुंचे तो गाड़ी को तुरंत दूसरे राज्य की सीमा में ले जाया जा सके, जिससे कार्रवाई करना मुश्किल हो जाए। गिरोह के सदस्य आपस में बातचीत कर रहे थे कि जैसे ही चंबल पुल पार होगा, राजस्थान की सीमा शुरू हो जाएगी और मध्यप्रदेश की टीम कुछ नहीं कर पाएगी। इस बार उनकी योजना उलटी पड़ गई। इन्होंने फिल्मी अंदाज में पकड़ा गिरोह जिस स्टिंग ऑपरेशन में कार का पीछा किया गया, उसमें दो गाड़ियां शामिल थीं। पहली गाड़ी में गर्भवती महिला के साथ डॉ. रश्मि मिश्रा “ननद” बनकर बैठी थीं। उनके साथ ब्रोकर आशा सुनीता भी थी। पीछे चल रही दूसरी गाड़ी में डॉ. बिंदु, डॉ. प्रबल, डॉ. अनुभा और संजय जोशी मौजूद थे। जैसे ही पहली कार को रोका गया और शीशा तोड़ा गया, टीम ने तुरंत गर्भवती महिला और डॉक्टर को सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद मौके से डॉक्टर, एएनएम और अन्य सहयोगियों को हिरासत में ले लिया गया। छह महीने की तैयारी के बाद बिछाया गया जाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को सूचना मिली थी कि बॉर्डर एरिया में एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय है, जो भ्रूण का लिंग बताने का अवैध धंधा कर रहा है। सूचना मिलने के बाद NHM ने एक स्टिंग ऑपरेशन की योजना बनाई। सबसे पहले एक गर्भवती महिला को डिकॉय के रूप में तैयार किया गया। उसे इस जोखिम भरे ऑपरेशन के लिए तैयार करने में ही करीब 15 दिन लग गए। इसके बाद एक स्थानीय इंफॉर्मर को गिरोह तक पहुंचने का काम सौंपा गया। करीब डेढ़ महीने की ट्रेसिंग के बाद यह पता चला कि गिरोह में कौन-कौन लोग शामिल हैं और वे किस तरह गर्भवती महिलाओं तक पहुंचते हैं। इस दौरान एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस नेटवर्क में कुछ एएनएम भी शामिल थीं। ऐसे चलता था पूरा नेटवर्क दूसरे स्टिंग में आशा कार्यकर्ता ने मांगे 50 हजार एक अन्य स्टिंग ऑपरेशन में टीम की बातचीत सुनीता नाम की एक आशा कार्यकर्ता से हुई। उसने भ्रूण का लिंग बताने के लिए 50 हजार रुपए की मांग की। डील के अनुसार आधी रकम एडवांस और बाकी जांच के बाद कार में देने की बात तय हुई। उसने यह भी कहा कि महिला अभी तीन महीने की गर्भवती है, इसलिए कुछ दिन इंतजार करना होगा ताकि जांच में स्पष्ट जानकारी मिल सके। करीब दो महीने बाद उसने दोबारा संपर्क कर जांच के लिए तैयार रहने को कहा। इस बार लोकेशन मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश बॉर्डर पर तय की गई। यूपी बॉर्डर पर भी चल रहा था खेल इस ऑपरेशन में गर्भवती महिला को लेने के लिए कार मुरैना के पास चंबल पुल से पहले रानीपुरा के एक ढाबे पर पहुंची। वहां से महिला को बैठाकर कार इटावा की ओर रवाना हुई। कार इटावा सफारी के आसपास घूमती रही और फिर शहर का चक्कर लगाकर एकता कॉलोनी रोड से वापस मध्यप्रदेश में दाखिल हुई। यहां महिला को फिर उसी ढाबे पर छोड़ दिया गया। जांच के बाद उसे बताया गया कि गर्भ में लड़का है। हालांकि, इस केस में गाड़ी का पीछा और फोटो सबूत उतने मजबूत नहीं थे, लेकिन कॉल रिकॉर्डिंग और ऑडियो सबूत के आधार पर कार्रवाई संभव हो सकी। बीते कुछ सालों से लिंगानुपात में आ रही गिरावट विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे स्टिंग ऑपरेशन इसलिए जरूरी हो गए हैं क्योंकि राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात में गिरावट का चिंताजनक पैटर्न सामने आया है। आंकड़ों के अनुसार, 2016-18 में मध्यप्रदेश का लिंगानुपात 925 था। 2019-20 में यह घटकर 919 हो गया। 2020-22 में यह और गिरकर 915 तक पहुंच गया। हालांकि 2023 में इसमें हल्का सुधार हुआ और आंकड़ा 917 तक पहुंचा, लेकिन यह अभी भी पहले के स्तर से नीचे है। आंकड़ों के अनुसार 2021-23 में मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में लिंगानुपात 911 रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 941 दर्ज किया गया। इससे साफ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेटियों के जन्म का अनुपात अभी भी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे भ्रूण लिंग परीक्षण और बेटे की चाह जैसी सामाजिक मानसिकता बड़ी वजह है। नेटवर्क का पर्दाफाश, चुनौती अभी बाकी NHM की संयुक्त संचालक डॉ. प्रज्ञा तिवारी का कहना है कि इस स्टिंग ऑपरेशन से एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। हालांकि, भ्रूण लिंग परीक्षण का यह अवैध कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसको खत्म करना ही हमारा लक्ष्य है। इसके लिए ना केवल स्टिंग ऑपरेशन बल्कि लगों को अवेयर करने, लिंग की जांच करने वाले गिरोह की जानकारी देने वालों को 50 हजार रुपए से दो लाख रुपए तक का अवार्ड तक दिया जा रहा है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बेटे की चाह और सामाजिक दबाव के कारण अभी भी कई लोग इस रास्ते पर जा रहे हैं। इन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए हम कई तरह की मुहीम भी चला रहे हैं। विभाग लगातार निगरानी और कानूनी कार्रवाई के जरिए इस काले कारोबार पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है। ये खबर भी पढ़ें.. पत्नी के शरीर में पुरुषों वाले XY क्रोमोसोम मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक डिफेंस अधिकारी और उनकी पत्नी की साल 2023 में हुई अरेंज मैरिज के बाद जिंदगी सामान्य और खुशहाल चल रही थी, लेकिन दो साल बाद भी संतान नहीं होने पर जब उन्होंने इलाज शुरू कराया तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। जांच में पता चला कि महिला के शरीर में सामान्य महिलाओं की तरह XX क्रोमोसोम नहीं, बल्कि पुरुषों वाले XY क्रोमोसोम हैं।पूरी खबर पढ़ें
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