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    Delhi Riots Case: क्या Umar Khalid और Sharjeel Imam को मिलेगी ज़मानत? कोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब

    14 hours ago

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    दिल्ली दंगों की बड़ी साज़िश के मामले में आरोपी शरजील इमाम ने कड़कड़डूमा कोर्ट में ज़मानत के लिए दूसरी अर्ज़ी दाखिल की है। इससे पहले, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी थी। नई ज़मानत अर्ज़ी में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के 6 महीने बाद भी मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई है और वह पिछले 6 सालों से हिरासत में हैं। उमर खालिद की ओर से भी रेगुलर ज़मानत के लिए एक और अर्ज़ी दाखिल की गई है। एडिशनल सेशंस जज (ASJ) समीर बाजपेयी ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर शरजील इमाम की ज़मानत अर्ज़ी पर जवाब मांगा। इससे पहले, कोर्ट ने 9 जून को उमर खालिद की ज़मानत अर्ज़ी पर नोटिस जारी किया था। इन मामलों की सुनवाई 4 जुलाई को होगी।इसे भी पढ़ें: KALA HIRAN फिल्म पर भड़के Salman Khan, रिलीज पर रोक लगाने के लिए पहुंचे Delhi High Courtशरजील इमाम की ओर से कहा गया है कि 5 जनवरी, 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुई अहम घटनाओं को देखते हुए दूसरी ज़मानत अर्ज़ी दाखिल की गई है। अर्ज़ी में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के छह महीने से ज़्यादा समय बीत जाने के बावजूद, ट्रायल की कार्यवाही में कोई खास प्रगति नहीं हुई है; आरोप तय करने (चार्ज फ्रेमिंग) पर बहस अभी भी अधूरी है और याचिकाकर्ता इस FIR में लगभग छह साल से लंबी जेल की सज़ा काट रहा है। वकील अहमद इब्राहिम ने शरजील इमाम के लिए ज़मानत अर्ज़ी दाखिल की है। कहा गया है कि इस अर्ज़ी को दाखिल करने की तारीख तक, ट्रायल कोर्ट के सामने मामला आरोप तय करने के चरण तक भी नहीं पहुँचा है। आरोप पर बहस अभी पूरी नहीं हुई है।इसे भी पढ़ें: Indian Vessel Attacked In Gulf | ट्रंप ने ईरान पर भारतीय जहाजों पर हमले करने का आरोप लगाया, तेहरान ने इसे ‘निराधार’ बतायाजैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही गुलफिशा फातिमा मामले के पैराग्राफ 118 में नोट किया था - बचाव पक्ष की दलील दर्ज करते हुए कि मामला तब आरोप पर बहस के चरण में था और 'पारंपरिक अर्थों में ट्रायल की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं' हुई थी - याचिका में कहा गया है कि छह महीने बाद भी स्थिति पूरी तरह से वैसी ही बनी हुई है। इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट की एक समान बेंच ने सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी मामले में स्पष्ट रूप से कहा है कि गुलफिशा फातिमा के फैसले ने K.A. नजीब मामले में तीन जजों की बेंच के बाध्यकारी फैसले की संवैधानिक ताकत को कमज़ोर कर दिया है और उसके तर्क (रेशियो) से स्पष्ट रूप से अलग रुख अपनाया है।इसे भी पढ़ें: दिल्ली में बिजली बिल का बड़ा 'झटका': DERC ने दी मंज़ूरी, जुलाई से बढ़ेगी कीमतेंयाचिका में यह भी बताया गया है कि जिस बेंच ने गुलफिशा फातिमा का फैसला लिखा था, उसी ने बाद में 22 मई, 2026 को तस्लीम अहमद मामले में आदेश पारित किया था; इसमें बड़ी साज़िश (लार्जर कॉन्स्पिरसी) मामले के सह-आरोपी को अंतरिम ज़मानत दी गई थी और साथ ही UA(P)A की धारा 43D (5) के तहत ज़मानत से जुड़े पूरे कानूनी सवाल को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित की जाने वाली एक बड़ी बेंच को भेजा गया था।
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