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    एशियन गेम्स में यूपी के 11 धुरंधर:किसी ने डंडे से भाला फेंकना सीखा, कोई रातभर कैब चलाता रहा; एक ने बिना खेले ₹3 करोड़ जीते

    22 hours ago

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    जापान के आइची-नागोया में हुए एशियन गेम्स में भारत के हिस्से में 85 मेडल आए। इनमें 16 मेडल यूपी के खिलाड़ियों ने हासिल किए। इनमें 5 गोल्ड, 3 सिल्वर और 8 कांस्य हैं। ये सिर्फ मेडल नहीं हैं, बल्कि मुश्किल हालात में कामयाबी हासिल करने वाले 11 खिलाड़ियों के संघर्ष का नतीजा है। किसी प्लेयर को प्रैक्टिस के लिए जैवलिन नहीं मिला, तो उसने बांस को छीलकर भाला तैयार कर लिया। किसी ने पिता को खोकर दिल्ली में कैब चलाई, घर संभाला और मुश्किल हालात में भी देश का नाम रोशन कर दिया। आपको ऐसे ही खिलाड़ियों की कहानियां पढ़वाते हैं… इस भास्कर पोल में हिस्सा लेकर अपनी राय दीजिए- पहली कहानी जौनपुर के रोहित यादव की है। जैवलिन थ्रो में कांस्य पदक जीतने वाले रोहित की प्रैक्टिस किसी स्पोर्ट्स एकेडमी में नहीं, गांव के खेतों से शुरू हुई। वह अपने पिता के साथ काम में हाथ बंटाते और अक्सर डंडे फेंककर उसकी दूरी नापते थे। रोहित के पिता सभाजीत यादव खुद एक एथलीट थे। उन्होंने रोहित के इस हुनर को पहचान तो लिया, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बेटे के लिए असली जैवलिन (भाला) नहीं खरीद पा रहे थे। रोहित की बढ़ती ललक को देखकर 2013 में पिता ने घर के पास उगे बांस को काटकर और छीलकर भाले तैयार किए। फिर क्या था, 14 साल की उम्र में रोहित ने बांस के डंडे से ही थ्रो करने का अभ्यास शुरू कर दिया। बाद में पैसे जुटाकर जैवलिन खरीद लिया। फिर हर दिन भाला फेंकने की प्रैक्टिस करने लगे। 13 साल की मेहनत के बाद आखिरकार वो एशियन गेम्स तक पहुंचे। जैवलिन थ्रो के फाइनल में 84.35 मीटर के थ्रो के साथ कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। अब उन्हें सरकार 75 लाख रुपए और सरकारी नौकरी देगी। अमेठी के सलमान खान ने रोइंग (नौकायन) में कांस्य पदक जीता है। सलमान 4 भाइयों और 2 बहनों में सबसे बड़े हैं। वे इंडियन आर्मी में भर्ती होना चाहते थे। इसके लिए 15 साल की उम्र से ही तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन, जब वे 18 के हुए, तब सिर से पिता का साया उठ गया। अब परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। सलमान को मजबूरी में कमाने के लिए दिल्ली जाना पड़ा। शुरुआत में छोटे-मोटे काम किए, फिर कैब चलाने लगे। रात में जब बिस्तर पर लेटते, तब उन्हें इंडियन आर्मी जॉइन करने का अपना सपना याद आता। सलमान हार मानने वालों में से नहीं थे। वह सुबह 5 बजे उठने लगे और पार्क में 1600 मीटर दौड़ की प्रैक्टिस करने लगे। कभी-कभी 4-5 किलोमीटर की दौड़ भी लगा देते। लगातार कोशिश के बाद सलमान आखिरकार 2018 में खेल कोटे से सेना में भर्ती हो गए। यहीं उन्हें रोइंग की प्रैक्टिस करने का मौका मिला। सलमान ने खुद को इतना तपाया कि आज देश के लिए कांस्य पदक जीता। नोएडा के जय कुमार नागर ने 4x400 मीटर रिले दौड़ में कांस्य पदक जीता है। वह 2019 तक जिला स्तरीय कबड्डी खेलते थे। जय के पिता दादरी में छोटी-सी किराना की दुकान चलाते हैं। अपने बेटे का खेल के प्रति लगाव देखकर उनका एडमिशन स्पोर्ट्स स्टेडियम में करा दिया। पिता का सपोर्ट मिला तो जय ने कबड्डी छोड़कर एथलेटिक्स ट्रैक पर दौड़ना शुरू कर दिया। हर दिन 400 मीटर रेस की तैयारी करते रहे। 7 साल की कठिन ट्रेनिंग के दम पर उन्होंने एशियन गेम्स में मेडल जीता। अब जय को यूपी सरकार की ओर से 75 लाख रुपए मिलेंगे। बुलंदशहर के मेराज अहमद खान ने 50 की उम्र में शूटिंग में कांस्य पदक जीता है। मेराज 90 के दशक में वीरेंद्र सहवाग के साथ क्रिकेट खेला करते थे। दोनों दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम का हिस्सा थे। 28 साल की उम्र तक मेराज अंडर-19 की कप्तानी कर चुके थे। मेराज का सपना था कि वे जब भी खेलें, उनकी जर्सी पर देश का नाम 'INDIA' लिखा हो। लेकिन, उन्हें रणजी या नेशनल टीम में जगह नहीं मिल पा रही थी। मेराज जमींदार खानदान से आते हैं। उनके पिता इलियास अहमद खान, भाई और चाचा सभी स्टेट-लेवल के ट्रैप शूटर थे। 2003 के आसपास क्रिकेट करियर में ठहराव आने पर वे अपने चचेरे भाई के साथ दिल्ली की कर्णी सिंह शूटिंग रेंज पहुंचे। वहां उन्होंने राजा रणधीर सिंह और मानशेर सिंह जैसे दिग्गज निशानेबाजों को देखा, जिनकी जर्सी पर भारतीय तिरंगा लगा था। बस यहीं से उन्हें अपना सपना पूरा करने का रास्ता दिख गया। फिर उन्होंने अपने पहले प्यार क्रिकेट को अलविदा कहकर शूटिंग को करियर बना लिया। गाजीपुर के रहने वाले राजकुमार ने एशियन गेम्स में भारतीय टीम को गोल्ड मेडल दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, बांग्लादेश के खिलाफ मैच के दौरान उनके बाएं हाथ के अंगूठे में फ्रैक्चर हो गया था। वे सेमीफाइनल और फाइनल नहीं खेल पाए। लेकिन, उनकी टीम ने फाइनल में शानदार जीत दर्ज कर गोल्ड जीता। 2028 के लॉस एंजिल्स ओलिंपिक का टिकट भी पक्का कर लिया। राजकुमार पाल 3 भाइयों में सबसे छोटे हैं। बड़े भाई जोखन पाल और राहुल पाल नेशनल लेवल के हॉकी खिलाड़ी थे। उन्हीं को देखकर छोटे भाई राजकुमार के मन में भी हॉकी थामने का जुनून पैदा हुआ। राजकुमार बचपन में बांस के डंडे से हॉकी खेलते और बड़े भाई से गोल दागने का हुनर सीखते। जब वे 10 साल के थे, तभी उनके पिता कालिका पाल का अचानक निधन हो गया। बड़े भाई जोखन अंतरराष्ट्रीय लेवल पर खेलना चाहते थे, लेकिन अब उनके कंधों पर घर की जिम्मेदारी आ गई थी। इसलिए जोखन ने अपनी हॉकी स्टिक राजकुमार के हाथ पकड़ा दी। उन्हें पहले गाजीपुर के करमपुर स्टेडियम, फिर मेघबरन सिंह हॉकी स्टेडियम ले गए। जहां राजकुमार ने हॉकी की बारीकियां सीखीं। 2012 में राजकुमार का सिलेक्शन लखनऊ के साईं स्पोर्ट्स हॉस्टल में हो गया। इसके बाद 2018 में राजकुमार के ऊपर अचानक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बड़े भाई जोखन पाल का बीमारी से निधन हो गया। हालांकि, राजकुमार के दूसरे नंबर के भाई राहुल और उनकी मां मनराजी देवी ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया। मां और भाई ने मजदूरी करके उनके लिए पैसे जुटाए, जिससे राजकुमार ने मेहनत जारी रखी। आगे बढ़ते हुए भारतीय हॉकी टीम में अपनी जगह बनाई। विप्रज को बिना खेले मिलेंगे ₹3 करोड़, गुलवीर को सबसे ज्यादा इनाम बाराबंकी के विप्रज निगम भारतीय क्रिकेट टीम के ऑलराउंडर हैं। वह एशियाई खेलों के लिए चुनी गई 15 सदस्यीय टीम में शामिल थे। हालांकि, टूर्नामेंट के किसी भी मैच में उन्हें खेलने का मौका नहीं मिला। टीम इंडिया ने सेमीफाइनल में बांग्लादेश को हराया था। फाइनल में भारत का मुकाबला अफगानिस्तान से होना था, लेकिन बारिश के कारण मैच नहीं हो सका। इसके बाद बेहतर रैंकिंग के आधार पर भारत को विजेता घोषित कर दिया गया। इस तरह टीम इंडिया ने गोल्ड मेडल जीत लिया। नियम के मुताबिक, टीम के हर सदस्य को इस जीत का हिस्सा माना जाता है। इसलिए बिना एक भी गेंद खेले विप्रज निगम को यूपी सरकार की ओर से 3 करोड़ रुपए मिलेंगे। इसके साथ ही उन्हें क्लास-1 अफसर की नौकरी का ऑफर भी मिलेगा। अलीगढ़ के सिरसा गांव के रहने वाले गुलवीर सिंह इस बार यूपी के सबसे सफल एथलीट रहे हैं। उन्होंने एशियन गेम्स में 2 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज मेडल जीता। इससे पहले ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गुलवीर ने 1 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज अपने नाम किया था। दोनों बड़े टूर्नामेंट के 5 पदकों को मिलाकर देखें, तो गुलवीर को यूपी सरकार की ओर से सबसे ज्यादा 5 करोड़ रुपए की सम्मान राशि मिलेगी। कभी एथलेटिक्स किट और जूते खरीदने के लिए पैसे जुटाना मुश्किल था। लेकिन, आज गुलवीर यूपी के सबसे ज्यादा सम्मान राशि पाने वाले एथलीटों में शामिल हैं। -------------------------- यह खबर भी पढ़ें- 45 लाख गांठ वाली कालीन, डिजाइन में 50 जानवर छिपे, दावा- साड़ी के वेस्ट से बनी जयपुरी कालीन भदोही के कार्पेट एक्सपो मार्ट में हस्तकला का अनोखा संगम दिखा। इस साल 45 लाख गांठों से बुना गया कश्मीरी ‘हैप्पी ट्री ऑफ लाइफ’ कालीन और साड़ी के कचरे से बनी जयपुरी कालीन लोगों की पसंद बनीं। एक्सपो में 4 राज्यों के 300 निर्यातकों और बुनकरों के स्टॉल लगे। रिपोर्ट में पढ़िए…
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