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    'फॉर्च्यूनर में लड़कियां, सुल्फे के कश लेता था महंत':ग्रामीण बोले-भगवा चोला देख छोड़ा; कैथल के डेरे में साधु मारा, यहां ₹2 करोड़ के पशु

    6 hours ago

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    हमने कई बार महंत दूजपुरी को आधी रात में गाड़ी में महिलाओं के साथ पकड़ा है। सुबह सुल्फे और गांजे का नशा उतरने के बाद वो माफी मांग लेता था। हम भी उसे भगवा चोले में देख चेतावनी देकर माफ कर देते थे। जब उसके विवाद बढ़ते गए, हमने डेरे की गद्दी से हटाने का प्रयास किया, लेकिन वह कभी माफी मांगकर, कभी कोर्ट केस जीतकर गद्दी पर बैठ गया। पूरा गांव इसकी हरकतों से परेशान था। डेरे में आने वाले श्रद्धालुओं के साथ उसका व्यवहार भी ठीक नहीं था। अब दूजपुरी ने साधु शिव शंकर की हत्या का घिनौना पाप किया है। उसे कभी गांव में घुसने नहीं देंगे। -ये कहना है कैथल के बाबा लदाना के ग्रामीणों का। 400 साल पुराने इस डेरे में हर दशहरे पर 4-5 लाख श्रद्धालु आते हैं। हर एकादशी पर बाबा राजपुरी की पूजा करने के लिए 10-12 हजार श्रद्धालु आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब डेरे के संचालन की जिम्मेदारी तय करने के लिए पंचायत होगी। हालांकि अभी जिला प्रशासन डेरे की देखरेख कर रहा है। डेरे की पशुशाला में 2 करोड़ रुपए से भी अधिक कीमत पशुधन हैं। बता दें, बुधवार को महंत दूजपुरी उर्फ धर्मेंद्र ने अपने साथियों के साथ मिलकर साधु शिव शंकर पुरी की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। जिसके बाद अभी दूजपुरी पुलिस हिरासत में है। ग्रामीणों के अनुसार, वह डेरे का 22वां महंत है। मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला दूजपुरी पिछले 20 साल से गद्दीशीन था। डेरे के बारे में ग्रामीणों ने क्या बताया, पढ़िए पूरी रिपोर्ट…। पहले यहां डेरे की तस्वीरें देखिए:- पहले जानिए…400 साल पुराने डेरे की खास बातें - ग्रामीण सुरेंद्र का कहना है कि डेरा के पास करीब 62 एकड़ कृषि भूमि है। इस जमीन पर खेती होती है, जिसकी कमाई डेरे के पास ही रहती है। इसके साथ ही पांच एकड़ में मंदिर और तालाब बना है। डेरे की संरचना एक किले की तरह है। - सुरेंद्र ने बताया कि डेरे में एक पशुशाला भी है। इसमें 120 से अधिक छोटे-बड़े पशु हैं। कई दुधारू पशु भी है। इन पशुओं की अनुमानित कीमत 2 करोड़ रुपए से भी अधिक आंकी जा रही है। बाबा लदाना गांव के अलावा भी डेरे के पास जमीनें हैं। - ग्रामीण विनोद कुमार ने बताया कि एकादशी पर अधिक श्रद्धालु आते हैं। अधिकांश श्रद्धालु दान पात्र में चढ़ावा भी देते हैं। महंत दूजपुरी इसके बाद भी पैसे को डेरे के अलावा किसी सामाजिक या धार्मिक काम में नहीं लगाता था। अब पढ़िए, ग्रामीणों ने दूजपुरी पर क्या आरोप लगाए अय्याशियों में बर्बाद की डेरे की संपत्ति बाबा लदाना गांव के ही सुभाष चंद ने कहा कि दूजपुरी में साधुओं वाले मोह-माया से त्याग जैसे गुण नहीं थे। वह लग्ज़री गाड़ियों में घूमता था। कभी भी फॉर्चूनर SUV से नीचे पैर नहीं रखे। अपनी अय्याशियों के चक्कर में उसने डेरे की संपत्ति बर्बाद कर दी। नशे में गाड़ियां तोड़ देता था दूजपुरी ग्रामीण सुभाष ने बताया कि जब दूजपुरी नशे में होता था, गाड़ियों में भी तोड़फोड़ कर देता था। टूटी हुई गाड़ियों को कुछ दिन के लिए डेरे में ही रखता था। बाद में उसे बेचकर दूसरी महंगी गाड़ियां खरीद लेता था। उसके जैसी गाड़ियां गांव के बड़े जमींदारों के पास भी नहीं है। लड़कियां लेकर घूमता था ग्रामीण विनोद शर्मा ने कहा, दूजपुरी शुरू से ही विवादों में रहा है। वह लड़कियों को लेकर घूमता था। गांव के युवकों और 36 बिरादरी के लोगों से इसका हमेशा विवाद होता रहता था। महंत ने डेरे को एक बंद किला बना रखा है। अपनी मर्जी से वहां ग्रामीणों को आने देता था। 80 प्रतिशत लोगों ने तो उसकी वजह से डेरे में जाना तक बंद कर दिया था। पंचायत कर फैसला लिया जाएगा ग्रामीणों का कहना है कि अब डेरे की देखरेख के लिए पंचायत और पूरा गांव है। यहां पर एक पुजारी है, जो पूजा पाठ कर करते हैं। सुरक्षा के लिए 2 पुलिसकर्मी तैनात है। आसपास के गांव की भी अब पंचायत करने की योजना है। पंचायत के बाद ही डेरे की देखरेख करने का फैसला लिया जाएगा। बाबा राजपुरी और उनके डेरे का इतिहास… 1690 में जन्म, 8 साल की उम्र में धारण किया चोला : गांव बाबा लदाना में 1690 में बाबा राजपुरी का जन्म हुआ था। उन्होंने करीब आठ साल की उम्र में गांव बात्ता में जाकर चोला धारण किया और संत सरस्वती पुरी को गुरु बनाया। इसके बाद उन्होंने गांव बात्ता में गुरु से अलग डेरा बनाया। बाबा राजपुरी 52 शक्तिपीठ में शामिल माता हिंगलाज को काफी मानते थे। बताते है कि करीब 300 साल पहले गांव बाबा लदाना में इस डेरे की स्थापना हुई। यहां बाबा राजपुरी के 360 धूणे हैं। वर्तमान में दूजपुरी डेरे में मुख्य महंत: डेरा बाबा राजपुरी के पहले महंत सिद्ध पुरी थे, जिन्होंने 1709 में समाधी ली। इनके बाद महंत भंडार पुरी ने 1745, महंत शुद्ध पुरी ने 1778, महंत भण्डार पुरी ने 1803, महंत ज्ञान पुरी ने 1871, महंत तोतापुरी ने 1884, महंत चेतनपुरी ने 1897, महंत हजारी पुरी ने 1905 में समाधी ली। अब वर्तमान में डेरे के मुख्य महंत दूजपुरी हैं। महंत तोतापुरी स्वामी रामकृष्ण परमहंस के गुरू रहे हैं। डेरा में प्रतिदिन चार बार होती है आरती : डेरे में प्रतिदिन चार बार आरती होती है। पहली आरती सुबह चार बजे, दूसरी भोग आरती दोपहर 11:30 बजे, तीसरी आरती तीन बजे और इसके बाद संध्याकालीन आरती होती है। 31 ज्योत जगाई जाती है। डेरा राजपुरी बाबा लदाना की पूजा, बात्ता डेरा का भंडारा और क्योड़क की अलख काफी प्रसिद्ध है। डेरे पर दशहरे से अगले दिन विशाल मेला लगता है, जिसमें श्रद्धालु घी, दूध चढ़ाते हैं। चांदनी एकादशी पर भी यहां मेला लगता है। डेरा के पास 80 एकड़ भूमि, 135 पशु : डेरे के पास करीब 80 एकड़ जमीन और 135 पशु हैं। कोई पशु खरीदा नहीं गया है। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु पशुओं को दान में देकर जाते हैं। डेरा परिसर में 400 साल पुराना जाल (जिसे स्थानीय भाषा में 'जैल' या 'पीलू' भी कहा जाता है) का पेड़ है। -------------- यह खबर भी पढ़ें… 'रात को गाड़ी में युवतियां लेकर घूमता था महंत':ग्रामीणों का दावा- फिजिकल रिलेशन बनाता, डेरे की वजह से चुप थे; कैथल में साधु मारा कैथल के बाबा लदाना गांव स्थित राजपुरी डेरे में साधु की हत्या के बाद ग्रामीणों ने मुख्य महंत दूजपुरी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि महंत की हरकतों से वे लंबे समय से परेशान थे। (पूरी खबर पढ़ें)
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