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    गोरखपुर में ओपी राजभर बोले- 'पंडित' मतलब विद्वान:जाति से जोड़ेंगे तो समस्या होगी, सरकार बनाने का सपना देख रहे अखिलेश यादव

    4 hours ago

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    गोरखपुर पहुंचे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश एसआई भर्ती परीक्षा में आए विवादित प्रश्न पर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मैं इसे दो दृष्टि से देखता हूं। एक दृष्टि गलत है। दूसरी दृष्टि से देखेंगे तो पंडित मतलब विद्वान होता है। लेकिन जब पंडित को जाति से जोड़ेंगे तो जाति तो ब्राह्मण है। ब्राह्मण यदि खुद को पंडित से जोड़ ले तो उनके लिए दिक्कत है कि ऐसा प्रश्न क्यों आ गया? जिसने भी इस तरह का प्रश्न बनाया है, उसने अपने बुद्धि-विवेक से बनाया है। जहां तक मेरा मानना है कि ऐसे प्रश्न नहीं बनाने चाहिए। ओमप्रकाश राजभर 15 मार्च को महराजगंज जिले में प्रस्तावित सामाजिक समरसता रैली में शामिल होने आए थे। उन्होंने कहा कि एसआई भर्ती परीक्षा को देखते हुए वहां के डीएम व एसपी ने कार्यक्रम एक दिन टालने को कहा था। उन्होंने कहा कि छात्रों के हित में उन्होंने कार्यक्रम 16 को कर दिया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा कि इस रैली में 50 हजार से अधिक लोग शामिल होंगे। 22 फरवरी को चुनावी शंखनाद रैली की थी और उसमें लाखों लोग जुटे थे। सवाल : विधानसभा चुनाव में एक साल से कम समय बचा है, क्या तैयारी है? जवाब : एनडीए के सभी दल तेयारी में जुटे हैं। चाहे वह जयंत चौधरी हों, डा. संजय निषाद हों, ओमप्रकाश राजभर हों या अनुप्रिया पटेल। मैंने 22 फरवरी को चुनावी शंखनाद रैली की थी, जिसमें लाखों लोग जुटे थे। अब कल महराजगंज में सामजाक समरसता रैली करने जा रहा हूं। इसमें भी 50 हजार से अधिक लोग जुटेंगे। सवाल : आज कांशीराम की जयंती है, मायावती ने लखनऊ में बड़ी रैली की है। इससे कितना फर्क पड़ेगा? जवाब : मायावती जी के पास एक बड़ा वोट बैंक है। लेकिन सरकार बनाने के लिए पर्याप्त वोट नहीं है। सवाल : सपा को लेकर क्या कहेंगे? जवाब : सपा के पास यादव व मुस्लिम, दो वोट बैंक है लेकिन दोनों में बिखराव हो रहा है। सहारनपुर से बलिया तक, लाखों मुलमन भाजपा के साथ हैं। लाखों यादव भाजपा का झंडा लेकर घूम रहे हैं और अखिलेश यादव सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं। उनके पास कौन है जो वोट दिलाने की कूबत रखता हो। अभी कुछ दिन पहले मैंने देखा कि एक कांग्रेस के एक दगे हुए कारतूस को ज्वाइन कराया है। वह राहुल जी को प्रधानमंत्री बनाकर लौटे हैं, अब इनको मुख्यमंत्री बनाएंगे। आखिर वे कौन से वोट बैंक में इजाफा करा देंगे। खुद की कूबत है नहीं। जिस कम्युनिटी से आते हैं, वह लंबे समय से तो सपा के ही साथ है। अगर भाजपा की बात करें तो उनके साथ जितने भी घटक दल हैं, सबके पास कूबत है। चाहे वो जयंती चौधरी हों, डा. संजय निषाद हों, अनुप्रिया पटेल हों, ओमप्रकाश राजभर हों या खुद भाजपा ही क्यों न हे, सबके पास वोट दिलाने की कूबत है। यहां काफी लोग हैं, जो बहुत बड़ी ताकत बने हैं। अब चाहे सपा हो, बसपा हो या कांग्रेस, इनके पास कोई ऐसा हथियार नहीं है, जिससे इनको वोट मिले। सवाल : लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तो कुछ और ही परिणाम थे? जवाब : देखिए, जो लोकसभा का चुनाव होता है, वहां तीन पार्टियां लड़ती हैं तो तीन जाति के प्रत्याशी हो सकते हैं। उसी में बंटवारा होता है लेकिन जब चुनाव विधानसभा का होता है तो वही तीन जाति के प्रत्याशी 15 जाति के हो जाते हैं। वोटों का विभाजन होता है। हमारी तैयारी पूरी है। हम ही जीतेंगे और एनडीएम की सरकार बनेगी। सवाल : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, यूजीसी और एसआई भर्ती परीक्षा को लेकर विवादों का दौर चल रहा है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा? जवाब : मैंने विवाद बहुत देखे हैं। एनआरसी अब किसी को याद है? सब भूल गए न। इसी तरह वर्तमान में चाहे यूजीसी हो या कोई और विवाद, उसका कोई असर नहीं है। धीरे-धीरे चुनव अभी साल भर दूर है। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह जरूर है कि आंदोलन करने वाले लोग अब नहीं है। आजादी के लिए आंदोलन किया गया था, अब वैसा नहीं है, इसलिए असर नहीं पड़ेगा। हम जो धरातल पर देख रहे हैं उससे यही स्पष्ट होता है कि जो जिस पार्टी में है, उसी का गुणगान करता है, फिर चाहे वो किसी भी जाति का हो। कोई टिकट पाने के लिए तो कोई किसी अन्य कारण से। जब चुनाव में चार जगह मंच लगेगा तो चारो, चार दलों के लिए वोट मांगेंगे। ऐसे में एकजुटता कहां है। सवाल : अखिलेश यादव अविमुक्तेश्वरानंद के आंदोलन में गए थे। इससे क्या संदेश देना चाहते हैं ? जवाब : सपा ने ही उनके खिलाफ मुकदमा लिखाया था। लाठीचार्ज किया था। जो शंकराचार्य होता है, वह लोगों को धर्म के प्रति जागरूक करता है। लेकिन ये क्या कर रहे हैं। ये तो द्वेष पैदा कर रहे हैं। कभी सीएम के खिलाफ बोलते हैं तो कभी पीएम के खिलाफ। ये कौन सा तरीका होता है। आंदोलन अपने हिसाब से करिए लेकिन उसमें राजनीतिक दलों को लेकर आएंगे तो आंदोलन पोलिटिकल हो जएगा। अगर राजनीति करनी है ते कुर्ता-पाजामा चढ़ाइए। सवाल : त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां हैं। पंचायती राज मंत्री के तौर पर क्या स्पष्ट करना चाहेंगे? जवाब : देखिए, पंचायत चुनव अपने समय पर होगा। 12 मई तक प्रधानों का कार्यकाल है। मतपत्र छपकर सभी जिलों में चला गया है। 15 अप्रैल को मतदाता सूची का प्रकाशन हो जाएगा। राज्य निर्वाचन आयोग हो या सरकार, चुनाव कराने की तैयारी पूरी है। जहां तक पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की बात है तो वह भी अगली कैबिनेट की बैठक में गठित हो जाने की उम्मीद है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जो भ्रांतियां हैं वह एसआईआर, जनगणना को लेकर है। सवाल : त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की सूची में मतदाताओं की संख्या एसआईआर सूची से अधिक है। क्या पंचायतों में भी एसआईआर की जरूरत है? जवाब : दोनों सूची में अंतर होने का बड़ा कारण है। जब नगर पंचायत में चुनाव होता है तो उससे सटे गांव, जो नगर पंचायत में शामिल नहीं है, वहां के लोगों को भी मतदाता सूची में शामिल करा दिया जाता है। इसी तरह जिनकी उम्र 16 व 17 साल रहती है, संभावित प्रत्याशी उनका नाम भी जोड़वा देते हैं। जबकि एसआईआर में ऐसा कुछ नहीं हुआ। लाखों लोगों के नाम मृतक होने, शिफ्टेड होने के कारण कट गए हैं। आने वाले दिनों में वन नेशन, वन इलेक्शन होगा। एक वोटर लिस्ट होगी। उसके बाद प्रधान खुद ही इसे दुरुस्त करा देंगे। इसमें एसआईआर की जरूरत नहीं है।
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