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    गोरखपुर में रमजान के 17वें दिन हुई फातिहा ख्वानी:जंग-ए-बद्र के शहीदों को याद किया, इस्लामी शिक्षा पर डाली रोशनी

    3 hours ago

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    गोरखपुर में रमजान का 17वें दिन इबादत के साथ पूरा हुआ। तुर्कमानपुर स्थित मकतब इस्लामियात में हजरत आयशा सिद्दीका और जंग-ए-बद्र के शहीदों की याद में फातिहा ख्वानी हुई। इसमें उलेमा ने हजरत आयशा की जिंदगी और जंग-ए-बद्र की अहमियत पर अपने विचार रखे। मुख्य वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि उम्मुल मोमिनीन हजरत आयशा सिद्दीका पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीवी और पहले खलीफा हजरत अबू बक्र की बेटी थीं। वह बहुत विद्वान थीं और उनसे कई हदीस बयान की गई हैं। उन्होंने कहा कि हजरत आयशा महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली बड़ी शख्सियत थीं। जंग-ए-बद्र में 313 सहाबा ने लिया था हिस्सा कारी अनस ने बताया कि 17 रमजान 2 हिजरी को जंग-ए-बद्र हुई थी। इसमें 313 सहाबा ने हिस्सा लिया था। उन्होंने कहा कि इस जंग में मुसलमानों को अल्लाह की मदद से जीत मिली थी। शिक्षिका शिफा खातून ने कहा कि हजरत आयशा तमाम मुसलमानों की पाक मां हैं। उनकी जिंदगी दुनिया की महिलाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कहा कि उनकी पाकीजगी और परहेजगारी का जिक्र कुरआन में भी मिलता है। कम साधनों के बावजूद मिली जीत मदीना मस्जिद रेती के इमाम मुफ्ती मेराज अहमद कादरी ने कहा कि जंग-ए-बद्र इस्लामी इतिहास की पहली जंग थी। इसमें मुसलमानों की संख्या 313 थी, जबकि दुश्मनों की संख्या उनसे कई गुना ज्यादा थी। मुसलमानों के पास केवल 70 ऊंट और दो घोड़े थे, लेकिन हिम्मत और भरोसे के साथ उन्हें जीत मिली। अंत में सलात-ओ-सलाम पढ़कर दुनिया में अमन और शांति की दुआ की गई। शहर में रमजान के साथ इबादत का माहौल बढ़ गया है। मस्जिदों और घरों में नमाज और कुरआन की तिलावत हो रही है। रमजान का दूसरा अशरा खत्म होने के करीब है और तीसरा अशरा जहन्नम से आजादी का माना जाता है। अंतिम दस दिनों में शबे कद्र की रात की खास अहमियत होती है।
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