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    गैस संकट से बदला लखनऊ का जायका:एक हफ्ते से चौक का वेज पॉइंट बंद, व्यापारी बोले- ₹5500 में मिल रहा है सिलेंडर

    1 hour ago

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    “हमारे व्यापार को 100 साल हो चुके हैं, लेकिन इतना बड़ा संकट कभी नहीं देखा। गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा है और कारीगरों को कोयले व भट्ठी पर काम करने में काफी परेशानी हो रही है।” यह दर्द बयां किया लखनऊ के मशहूर टुंडे कबाबी के ग्रैंडसन अबुबकर ने। लखनऊ में कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की आपूर्ति पर ब्रेक लगने से शहर के खानपान कारोबार पर बड़ा असर पड़ा है। चौक के पारंपरिक बाजार से लेकर बड़े-बड़े मॉल के फूड कोर्ट तक इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि करीब 80 फीसदी व्यापारी प्रभावित हुए हैं और कई दुकानों के ठप होने की नौबत आ गई है। आखिर कितने दिनों से दुकानें बंद हैं? व्यापारी इस संकट को लेकर क्या कह रहे हैं? और इसका असर ग्राहकों पर कितना पड़ रहा है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… पहले देखिए 2 तस्वीरें… मौजूदा स्थिति- मशहूर टुंडे कबाब ने दाम किए दोगुने गैस सिलेंडर की किल्लत की वजह से फेमस टुंडे कबाब ने अपने कबाब के दाम लगभग दोगुने कर दिए हैं। चौक चौराहे पर वेज प्वाइंट पर लगी करीब 20 दुकानें पिछले एक हफ्ते से बंद पड़ी हैं, जिससे दुकानदार और कस्टमर दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दुकानदारों के सामने तीन विकल्प दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान दुकानदारों ने अपनी परेशानी बयां की। उन्होंने बताया कि गैस सिलेंडर की दिक्कत काफी बढ़ गई है। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि गैस को लेकर इतना बड़ा संकट होगा। व्यापारियों के मुताबिक, उनके पास अभी तीन विकल्प हैं। या तो वो दुकान बंद कर दें या फिर महंगे दामों पर सिलेंडर खरीदकर खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ा दें। तीसरा ये है कि वो भट्ठी पर बनाकर लिमिटेड सामान बेचें। अब पढ़िए व्यापारियों की परेशानी कबाब के बढ़ाने पड़े दाम टुंडे कबाबी के ग्रैंड सन अबुबकर बताते हैं कि हमारे व्यापार को 100 साल हो रहे हैं, लेकिन इतना बड़ा संकट कभी नहीं आया। कॉमर्शियल गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा है जिसके बाद हम लोग कोयला और भट्ठियों पर खाना बना रहे हैं। अभी तक जो कबाब हम लोग 5 रुपए पीस में बेचते थे, उसे अब वह 10 रुपए पीस बेचना शुरू कर दिया है। वहीं, पराठा 10 रुपए का है। जब वह खत्म हो जाता है तो हम लोग 20 रुपए का पराठा बनाते हैं, जो डबल पराठा कहलाता है। कारीगरों को भी कोयले पर और भट्ठी पर काम करने में बहुत परेशानी हो रही है। कोयले की कीमत प्रति किलो ₹15 तक बढ़ी अबुबकर बताते हैं कि- कुछ दिन पहले सरकार कह रही थी कि सब कुछ पर्याप्त है फिर ऐसी क्या वजह है कि होटल वालों को गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा है। कॉमर्शियल सिलेंडर क्यों नहीं मिल रहा है कहां पर कालाबाजारी हो रही है सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। जिस तरह से हम लोग धंधा कर रहे हैं इससे प्रॉफिट भी नहीं हो रहा है। बस इतना समझ लीजिए की दुकान चल रही है जिसकी मुख्य वजह है कि हम दुकान बंद नहीं कर सकते अपने कर्मचारियों को हटा नहीं सकते। त्योहार का समय है और ये लोग बेरोजगार हो जाएंगे। इस वक्त कोयले के दाम भी बढ़ गए हैं। पत्थर का कोयला 15 रुपए से बढ़कर 25 रुपए का हो गया है। जबकि, लकड़ी वाला कोयला 30 रुपए से बढ़कर 40-45 रुपए का हो गया है। KGMU के पास की दुकान 4 दिन से बंद KGMU के पास अमन भोजनालय है। यहां बड़ी संख्या में तीमारदार और मेडिकोज नाश्ता करते हैं। संचालक आशीष मिश्रा कहते हैं- पिछले 25 वर्षों से हम खाने का व्यापार कर रहे हैं, लेकिन ऐसा संकट पहले कभी नहीं देखा। गैस सिलेंडर की किल्लत शुरू होने के बाद एक-दो दिन तक काम चला। अब सिलेंडर खत्म हो गया और हमें दुकान बंद करनी पड़ी। पिछले 4–5 दिनों से दुकान बंद है। हमारी दुकान मेडिकल कॉलेज के पास है, इसलिए बड़ी संख्या में तीमारदार और डॉक्टर यहां खाना खाते थे। दुकान बंद होने से उन्हें भी काफी परेशानी हो रही है। केसर दूध और लस्सी बिकना बंद हुई चौक प्रसिद्ध दुकान राजा ठंडाई के मलिक आशीष ने बताया कि हमारी दुकान 1936 से चल रही है। इसका उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। इतने सालों से हम लोग ठंडाई के साथ केसर दूध और लस्सी बेचते हुए चले आ रहे हैं। मगर गैस सिलेंडर की कीमत के बाद हमने केसर दूध और लस्सी बेचना बंद कर दिया है क्योंकि दोनों ही आइटम तैयार करने के लिए दूध को पकाना पड़ता है। फिलहाल हम लोग सिर्फ कच्चे दूध से ठंडाई तैयार कर रहे हैं। बाकी मार्केट में जितनी खाने पीने की दुकानें हैं वह एक हफ्ते से बंद है दुकानदार के साथ काम करने वाले कर्मचारी भी परेशान हैं। 2000 वाला सिलेंडर 5500 में मिल रहा खाने के व्यापारी राजीव कहते हैं- कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की आपूर्ति पर रोक लगने से हमारा काम पूरी तरह प्रभावित हो गया है। छोटे सिलेंडर भी इस्तेमाल नहीं करने दिए जा रहे हैं, ऐसे में हमारे पास दुकान बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। दुकान बंद होने से सबसे ज्यादा असर हमारे साथ काम करने वाले मजदूरों पर पड़ा है। हमारे यहां 22 लड़के काम करते हैं। हम उन्हें तो किसी तरह खिला रहे हैं, लेकिन उनके परिवारों के सामने परेशानी खड़ी हो गई है। हमें दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है राजीव ने कहा- हमें दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है। एक तरफ कर्मचारियों को वेतन देना पड़ रहा है और दूसरी तरफ दुकान बंद होने से व्यापार पूरी तरह ठप है। सरकार से बस यही अपील है कि गैस सिलेंडर की कालाबाजारी पर रोक लगाई जाए। फिलहाल, काम चलाने के लिए लकड़ी और कोयले को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहे हैं।
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