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    हमीरपुर में 25 बैलगाड़ियों से 3 किलोमीटर तक निकली बारात:बुंदेलखंड में 30 साल पुरानी परंपरा फिर हुई जीवित

    7 hours ago

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    हमीरपुर में पुरानी परंपरा के अनुसार 25 बैलगाड़ियों से बारात निकली, जिसमें लगभग 200 लोग शामिल हुए। करीब 30 वर्ष से बंद पड़ी बैलगाड़ी बारात की परंपरा को फिर से जीवित किया गया। सजी-धजी 25 बैलगाड़ियों में सवार होकर दूल्हा और बराती खेतों के रास्ते लगभग तीन किलोमीटर का सफर तय कर फार्म हाउस पहुंचे, जहां बिना शोर-शराबे और आडंबर के पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह संपन्न हुआ। मामला थाना मौदहा क्षेत्र का है। पहले देखिए तस्वीरें… जानिए पूरा मामला... मौदहा के अंतिम गांव गुड़ा में जागेंद्र द्विवेदी अपने परिवार के साथ रहते हैं। पुत्र मोहित द्विवेदी मोबिल ऑयल की दुकान चलाते हैं। मोहित की शादी भेड़ी जलालपुर निवासी मोहिनी पाठक पुत्री विवेक पाठक की 25 फरवरी को शादी तय थी। दोनों परिवारों का सपना था की बैलगाड़ी से बारात निकाली जाए जिसको लेकर 25 बैलगाड़ी बुक की गई। बुधवार दोपहर को देसी अंदाज में धूमधाम से बारात निकाली गई जिसमे लगभग 200 लोग शामिल हुए। बारात गांव गुड़ा से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित द्विवेदी परिवार के फार्म हाउस तक पहुंची। जहां पर विवाह समारोह में पुरानी रीति रिवाजों के अनुसार कठघोड़वा नृत्य और लौंडा नाच का आयोजन किया गया। पत्तल में परोसा गया देशी भोजन दूल्हा बैलगाड़ी पर सवार होकर बरातियों के साथ पहुंचा। बारात का मुख्य आकर्षण तबोरा भजन, महिलाओं द्वारा गाए गए पारंपरिक बुंदेलखंडी गीत और पत्तल में परोसा गया देशी भोजन रहा। मेन्यू में कद्दू, आलू-बैंगन की सब्जी सहित अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल थे। भोजन सभी मेहमानों को बैठाकर सम्मानपूर्वक परोसा गया। विवाह की रस्में तीन दिनों तक चलीं। पहले दिन तिलक, दूसरे दिन द्वारचार और तीसरे दिन विदाई की रस्म निभाई गई। विशेष बात यह रही कि गुरुवार, 26 फरवरी को दुल्हन की विदाई भी बैलगाड़ी से ही की गई, जो उपस्थित लोगों के लिए यादगार क्षण बन गया। दूल्हा मोहित द्विवेदी दुकान चलाते हैं, जबकि दुल्हन पढ़ाई कर रही हैं। दोनों के परिवार किसान हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में गौशाला संचालित करते हैं। दूल्हे के पिता जागेंद्र द्विवेदी 11 बीघा भूमि पर फार्म हाउस विकसित कर जैविक खेती कर रहे हैं और अन्य किसानों को भी प्रेरित करते हैं। दूल्हे के पिता जागेंद्र द्विवेदी ने बताया- “शादी आधुनिक तरीके से भी कर सकते थे, लेकिन हम किसान हैं। जैविक खेती में गाय और बछड़ों का विशेष योगदान होता है। बुजुर्गों से सीखा है कि जीवन में जो महत्वपूर्ण हों, उन्हें खुशी के मौके पर आगे रखना चाहिए। जहां विवाह हुआ, वहां न बिजली है और न पक्की सड़क, लेकिन हमने ग्रामीण परंपरा को प्राथमिकता दी। दुल्हन के पिता विवेक पाठक ने कहा - “हमने बुजुर्गों से मिली परंपराओं का पालन किया है। आज शहरों में बफे सिस्टम से भोजन की बर्बादी होती है, जबकि बुंदेलखंड की परंपरा में मेहमानों को बैठाकर सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। इसी परंपरा को निभाया गया।” इस अनूठी बारात को देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। बुजुर्गों ने इसे पुराने दिनों की याद बताया, जबकि युवाओं के लिए यह सांस्कृतिक उत्सव जैसा अनुभव रहा। ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिकता के बीच ऐसी पहल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती है।
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