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    ईरान के लिए खड़े हो गए 121 देश! UN में कैसे पिटा अमेरिका?

    4 hours from now

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    ईरान से युद्ध के बाद से अमेरिका को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग होने का डर अब साफ तौर पर दिखने लगा है। दुनिया भर के जो देश अमेरिका की दादागिरी के कारण उसके साथ खड़े रहा करते थे, अब वो देश वैश्विक मंच पर उसके खिलाफ वोटिंग तक करने लगे हैं। इसकी सबसे बड़ी तस्वीर संयुक्त राष्ट्र के मंच पर देखने को मिली। जहां एक तरफ समुद्री सुरक्षा और होमू जलडमरू मध्य को लेकर तीखी बहस चल रही थी तो दूसरी तरफ परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी की बैठक में ऐसा फैसला हो गया जिसने वाशिंगटन को झटका दे दिया। न्यूयॉर्क में हुई यूएनएससी बैठक के दौरान अमेरिका के प्रतिनिधि माइकल व्ट्स ने खुले तौर पर सहयोगी देशों से मदद की अपील की। उन्होंने कहा कि समुद्री स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए एक गठबंधन खड़ा होना होगा। जिसमें सैन्य ताकत के साथ-साथ व्यापार, बीमा और मानवीय एजेंसियों को भी शामिल होना चाहिए। साफ था कि अमेरिका अब अकेले इस टकराव को संभालने की स्थिति में नहीं दिख रहा है। खासकर तब जब होरमुज में उसकी रणनीति लगातार चुनौती का सामना कर रही है।  इसे भी पढ़ें: Russia-China से इतना डरा अमेरिका? पेंटागन का कैसा बड़ा कबूलनामादूसरी तरफ ईरान के प्रतिनिधि अमीर सैद इरावानी ने उसी मंच से सीधा पलटवार किया और कहा कि स्थाई शांति तभी संभव होगी जब ईरान के खिलाफ आक्रामकता पूरी तरीके से खत्म हो जाएगी और उसके संप्रभु अधिकारों का सम्मान किया जाएगा। यानी संदेश साफ था कि ईरान खुद को रक्षात्मक नहीं बल्कि बराबरी की स्थिति में देख रहा है और दबाव में झुकने को कतई तैयार नहीं। इस बीच जमीन पर हालात भी अमेरिका के लिए आसान नहीं दिख रहे। रिपोर्ट्स के मुताबिक होमज में 30 से ज्यादा ईरान से जुड़े जहाज अमेरिकी दबाव के बावजूद गुजर चुके हैं। हालांकि अमेरिकी सेना ने कुछ जहाजों को रोका और दो को जब्त करने का दावा भी किया। लेकिन तस्वीर यह बताती है कि पूरी तरीके से नियंत्रण स्थापित करना अब भी अमेरिका के लिए चुनौती बना है और इसी कूटनीति और सैन्य दबाव के बीच आया एनपीटी का बड़ा फैसला जहां अमेरिका ने आखिरी वक्त तक कोशिश तो बहुत की कि ईरान को कोई अहम जिम्मेदारी ना मिले लेकिन 121 देशों के समर्थन से ईरान को उपाध्यक्ष बना दिया गया। यही वह मंच है जिसका मकसद परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना है और अब उसी मंच पर ईरान की मौजूदगी और मजबूत हो गई। इसे भी पढ़ें: UAE OPEC Exit Impact India: यूएई क्यों हो रहा OPEC से बाहर, क्‍या हमें खुश होना चाह‍िए?अमेरिका ने इस फैसले को एनपीटी की विश्वसनीयता पर सवाल बताते हुए कड़ा विरोध जताया। उसके अधिकारियों ने कहा कि ईरान पर ऐसे आरोप हैं कि वह अप्रसार प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता। इसलिए उसे पद पर चुनना गलत संदेश देता है। लेकिन दूसरी तरफ ईरान ने भी पलटवार करते हुए अमेरिका के नियत पर सवाल खड़े कर दिए और याद दिलाया कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने वाला दुनिया का एकमात्र देश अमेरिका ही रहा है। दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका रही गुटनिरपेक्ष और ग्लोबल साउथ देशों की जिन्होंने बड़ी संख्या में ईरान के पक्ष में वोट कर दिया। चीन और रूस पहले से ही ईरान के साथ खड़े थे। लेकिन इस बार अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों ने भी हॉल का समर्थन दिया। जिससे अमेरिका का विरोध कमजोर पड़ गया। यानी यह सिर्फ एक कूटनीतिक घटना नहीं बल्कि बदलते वैश्विक संतुलन की साफ झलक है। जहां हर मुद्दे पर अमेरिका की बात मान लेना जरूरी नहीं रह गया और कई देश खुलकर अलग रुख अपनाने लगे। अब सवाल यही है क्या यह बदलाव अस्थाई है या फिर एक नए वैश्विक शक्ति संतुलन की शुरुआत। क्योंकि अगर इसी तरीके से अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन कम मिलता गया तो उसका दबदबा धीरे-धीरे चुनौती में तब्दील हो सकता है और ईरान जैसे देश इसी मौके को अपने पक्ष में बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका कमजोर पड़ गया है। यह कहना आसान है, लेकिन हकीकत इससे ज्यादा पेचीदा है। 
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