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    IIT-BHU में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बनीं शिक्षिका:भारतीय संगीत और वीणा का महत्व बताया, कहा- मोबाइल के साथ संस्कृति से भी जुड़ें बच्चे

    16 hours ago

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    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-BHU) में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का एक अलग ही अंदाज देखने को मिला। इस दौरान वह शिक्षिका की भूमिका में नजर आईं और विद्यार्थियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत, उसके वाद्य यंत्रों और उनकी आध्यात्मिक अनुभूति के बारे में रोचक अंदाज में जानकारी दी। अपने संबोधन में वित्त मंत्री ने कहा कि प्रत्येक संगीत वाद्य यंत्र का अपना महत्व है। चाहे वह वायलिन हो, बांसुरी, सारंगी या वीणा, हर वाद्य यंत्र संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है। हालांकि, कुछ वाद्य यंत्र ऐसे होते हैं, जिनकी धुन सीधे इंसान की आत्मा को छू जाती है। निर्मला सीतारमण ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के स्वतंत्रता भवन में कर्नाटक के महान संगीतकार मुत्तुस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुईं। इस दौरान उन्होंने मुत्तुस्वामी दीक्षितर की स्मृति में 250 रुपए के स्मारक सिक्के का विमोचन किया। संगीत की सारंगी का जिक्र किया उन्होंने विशेष रूप से दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत की वीणा और उत्तर भारतीय हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सारंगी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन दोनों वाद्य यंत्रों को सुनने पर व्यक्ति अपने भीतर एक अलग तरह की अनुभूति महसूस करता है। रेडियो पर या किसी संगीत कार्यक्रम में इनकी धुन सुनना भी मन को गहराई तक प्रभावित कर सकता है। वित्त मंत्री ने बांसुरी का उदाहरण देते हुए भगवान श्रीकृष्ण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बांसुरी की धुन भी लोगों को ऐसी ही आध्यात्मिक अनुभूति दे सकती है। संगीत के प्रति हर व्यक्ति की अपनी अनुभूति और भावनात्मक जुड़ाव होता है। वीणा के साथ जुड़ी है आस्था और गुरु परंपरा की विरासत वीणा के महत्व को समझाते हुए निर्मला सीतारमण ने प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत परंपरा और महान संगीतज्ञों का उल्लेख किया। उन्होंने वीणा से जुड़ी पारिवारिक विरासत, गुरु-शिष्य परंपरा और आध्यात्मिक आस्था के बारे में भी विद्यार्थियों को बताया। उन्होंने एक ऐसी वीणा का प्रसंग साझा किया, जिसे परंपरा के तौर पर परिवार में आज भी सहेजकर रखा गया है। इस वाद्य यंत्र का संबंध महान संत-संगीतकार श्री मुथुस्वामी दीक्षितर की परंपरा और उनके आध्यात्मिक आशीर्वाद से जुड़ा बताया। उन्होंने कावेरी नदी के तट और संगीत साधना के बीच के आध्यात्मिक संबंध का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, संगीत केवल सुर और ताल का मेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे साधना, श्रद्धा, गुरु का आशीर्वाद और गहरी अनुभूति भी होती है। जब वित्त मंत्री के अंदाज में दिखीं एक शिक्षिका कार्यक्रम में निर्मला सीतारमण का यह संवाद विद्यार्थियों के लिए भारतीय संगीत की परंपरा को करीब से समझने का अवसर बना। उन्होंने सहज और संवादात्मक अंदाज में संगीत के तकनीकी पक्ष से आगे बढ़कर उसके भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व को समझाया। उनकी बातों का संदेश साफ था, हर वाद्य यंत्र महत्वपूर्ण है, लेकिन कुछ सुर ऐसे होते हैं जो केवल कानों तक नहीं पहुंचते, बल्कि सीधे मन और आत्मा को स्पर्श करते हैं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा कि सांस्कृतिक आयोजनों में स्कूली बच्चों की भागीदारी उन्हें बेहद अच्छी लगती है। बच्चों को बचपन से ही भारत की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और विरासत से परिचित कराना जरूरी है। इससे उनमें अपनी सांस्कृतिक पहचान को जानने और समझने की रुचि विकसित होती है। मोबाइल के साथ संस्कृति से भी जुड़ें बच्चे वित्त मंत्री ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में बच्चे अपना काफी समय मोबाइल फोन पर बिताते हैं। इसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होने से उन्हें एक अलग अनुभव मिलता है। ऐसे आयोजनों के जरिए बच्चे भारतीय संस्कृति, भाषा, संगीत, साहित्य और विभिन्न कलाओं के योगदान को करीब से समझ पाते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत काफी समृद्ध है। बच्चों को इससे जोड़ना जरूरी है, ताकि वे अपनी परंपराओं और कला के महत्व को समझ सकें। मुत्तुस्वामी दीक्षितर की रचनाएं भारतीय मंदिरों और संस्कृति का अनूठा दस्तावेज केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान संगीतकार मुत्तुस्वामी दीक्षितर की रचनाओं की विशिष्टता और आध्यात्मिक गहराई पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके कीर्तन केवल भक्ति संगीत नहीं, बल्कि भारत के मंदिरों, भूगोल, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं का अनूठा दस्तावेज हैं। उन्होंने अपने संबोधन में मुत्तुस्वामी दीक्षितर की रचनाओं की तुलना प्रसिद्ध यात्रा-पुस्तक श्रृंखला 'लोनली प्लैनेट' से की। उन्होंने कहा कि आज किसी अनजान स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए लोग गूगल का सहारा लेते हैं, जबकि पहले यात्री लोनली प्लैनेट जैसी पुस्तकों के माध्यम से किसी स्थान के दर्शनीय स्थलों, खानपान और विशेषताओं की जानकारी प्राप्त करते थे। सीतारमण ने कहा कि मुत्तुस्वामी दीक्षितर ने इससे भी पहले अपनी संगीत रचनाओं के माध्यम से भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों और मंदिरों का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया था। उदाहरण के तौर पर काशी में देवी की स्तुति करते हुए वे काशी विश्वलक्ष्मी का वर्णन करते हैं। उनकी रचनाओं में संबंधित मंदिर के पवित्र वृक्ष (स्थलवृक्ष), आसपास की नदियों, पर्वतों और उस स्थान की भौगोलिक विशेषताओं का भी उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि दीक्षितर संस्कृत के अत्यंत सुंदर और चयनित शब्दों के माध्यम से देवी-देवताओं की महिमा और दिव्य स्वरूप का वर्णन करते थे। उनकी रचनाओं की एक और विशेषता यह थी कि वे शैव परंपरा, शाक्त उपासना और तांत्रिक साधना के विभिन्न तत्वों को भी अपनी कृतियों में समाहित करते थे। निर्मला सीतारमण ने यह भी उल्लेख किया कि महान चित्रकारों की तरह मुत्तुस्वामी दीक्षितर अपनी रचनाओं में अपनी विशिष्ट पहचान छोड़ते थे। वे अपनी कृतियों में 'गुरुगुह' नाम की मुद्रा का प्रयोग करते थे और साथ ही राग के नाम को भी रचना में समाहित करते थे। 250 रुपए के स्मारक सिक्के के बारे में जानिए प्रसिद्ध मुद्राशास्त्री सुधीर लुणावत के अनुसार, स्मारक सिक्के का वजन 35 ग्राम होगा। इसे चार धातुओं के मिश्रण से तैयार किया गया है। इसमें 50 प्रतिशत चांदी, 40 प्रतिशत तांबा, 5 प्रतिशत निकल और 5 प्रतिशत जस्ता शामिल होगा। यह सिक्का सामान्य लेन-देन में इस्तेमाल के लिए जारी नहीं किया जाएगा। चार धातुओं से तैयार होगा सिक्का सिक्के में चांदी की मात्रा सबसे अधिक होगी। इसके अलावा तांबा, निकल और जस्ता का इस्तेमाल किया गया है। 35 ग्राम वजन वाला यह सिक्का मुत्तुस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती की स्मृति में जारी किया जा रहा है।
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