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    INDIA ब्लॉक को कागजी बताया, राहुल को बात-बात पर नीचा दिखाया, फिर भी क्या अखिलेश-पवार-कांग्रेस देंगे ममता का साथ?

    4 hours from now

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    समय बड़ा बलवान होता है। समय और हालात बदले। ममता बनर्जी 15 साल के बाद बंगाल की सत्ता से बाहर हो गई हैं। ममता बनर्जी चुनाव हारने के बाद  पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करने को आई। वह भी काली घाट में अपने घर में टीएमसी के दफ्तर में नहीं। प्रेस से मुखातिब होते हुए उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में बीजेपी, चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बलों पर हमला बोलते हुए कहा साफ कहा कि वे हारी नहीं हैं। ममता ने कहा कि बीजेपी ने 100 से ज्यादा सीटें लूटीं हैं। सीएम की कुर्सी जाते ही उन्होंने सोनिया-राहुल से लेकर उद्धव-सोरेन तक का नाम ले डाला। ममता को ये नाम अचानक यूं ही नहीं याद आए हैं। ममता बनर्जी ने एक बार कोलकाता में एक बयान भी दिया था। उसका जिक्र करना भी बड़ा जरूरी है। तब उन्होंने एक बात कही थी कि इंडिया ब्लॉक जो है ना वो कागज पर है। जमीन पर नहीं है। लेकिन वही कागज वाला जो है इंडिया ब्लॉक अब उनको उम्मीद है और भरोसा है। बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की काफी समय तक कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने की चर्चाएं थीं। कुछ सीटों पर दोनों दलों में एक राय नहीं बन पाई। ऊपर से तो दोनों ही दल चुप्पी साधे रहे, लेकिन अंदर ही अंदर खटपट होती रही। अचानक एक दिन ममता ने कह दिया- 'एकला चलो', यानी बंगाल में INDIA गठबंधन को खारिज करते हुए अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान। ममता को लग रहा था कि कांग्रेस बंगाल में लेफ्ट के साथ भी 'गलबहियां' कर रही है, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। वाम दल के विरोध की लहर पर सवार होकर ही ममता सत्ता के शिखर तक पहुंची थीं। ऐसे में ये नजदीकी ममता को खटकी और उन्होंने फौरन किसी भी तरह के गठबंधन से दूरी बना ली।इसे भी पढ़ें: हिंदू अस्मिता की बातें, विवेकानंद सा पहनावा, बंगाल के 'योगी' को CM बनाएगी BJP?इंडिया गठबंधन को मजबूत करने की आई यादममता ने इंडिया गठबंधन मजबूत करने का फैसला किया। सभी इंडिया गठबंधन के नेताओं की आभारी हूं। ऐसा उन्होंने बताया। राहुल गांधी- सोनिया गांधी का नाम लिया। जिन राहुल गांधी के बारे में कभी-कभी वह व्यक्तिगत तौर पर टिप्पणियां भी करती रही। अखिलेश यादव का साथ और उनकी जो केमिस्ट्री है सबको पता है। पर यहां भी एक बात छिपा गई। उन्होंने कहा अखिलेश यादव ने मुझे फोन किया और उन्होंने कहा मैं अभी आना चाहता हूं। आपसे मिलना चाहता हूं। वो आ रहे हैं। हेमंत सोरेन का भी जिक्र किया और तेजस्वी यादव का भी। तेजस्वी यादव उनके यहां चुनाव प्रचार करने गए थे। उद्धव ठाकरे का भी जिक्र किया। अरविंद केजरीवाल और बाकी नेताओं ने मुझे फोन किया। अरविंद तो खुलकर ममता बनर्जी के साथ हैं। ममता ने  कहा मैं एक फ्री बर्ड हूं। मतलब आजाद पंछी हूं। इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं से मिलकर आगे की रणनीति बनेगी और फिर हम पूरे देश में बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत इंडिया ब्लॉक बनाएंगे। इंडिया ब्लॉक की एक बैठक में कुछ ऐसी बात हुई कि ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन से बाहर निकलने का फैसला कर लिया था और इस फैसले में उन्होंने बड़ी चालाकी से अरविंद केजरीवाल को भी जोड़ लिया था। वही ममता बनर्जी बंगाल का चुनाव हारने के बाद आखिर क्यों कह रही हैं कि मुझे इंडिया गठबंधन को मजबूत करना है। याद दिला रही हैं कि इंडिया ब्लॉक के किन-किन नेताओं ने उन्हें फोन किया और बताया कि हम आपके साथ हैं। वक्त बड़ा बलवान होता है। समय और हालात बदले। ममता बनर्जी 15 साल के बाद बंगाल की सत्ता से बाहर हो गई हैं। तो अब उन्हें राहुल गांधी की भी याद आ रही है। अखिलेश यादव की भी याद आ रही है और ऐसे तमाम नेताओं की क्यों ममता बनर्जी आज अकेली पड़ने पर इंडिया गठबंधन की माला जप रही है। मैं इस्तीफा नहीं दूंगी। मैं हारी नहीं हूं। मैं हराई गई हूं।इसे भी पढ़ें: चुनावी हार के बाद Mamata Banerjee को झटका, भतीजे Abhishek समेत Z+ Security का घेरा हुआ कमअपना नफा और नुकसान देखकर फैसला लेने की आदत2024 के लोकसभा चुनाव का वो दौर जब इंडिया गठबंधन के कन्वेनर और चेयरमैन पद की कवायद गढ़ी जा रही थी। नीतीश कुमार और मल्लिकार्जुन खरगे तक के नाम लगभग तय हो गए थे। ऐन वक्त पर अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर ममता दीदी ने दूसरा गेम प्लान बना लिया था कि अगर किसी भी तरीके से उनको कन्वीनर नहीं बनाया जाता है तो ना तो हम खेलेंगे ना खेलने देंगे। वो ज़िद पर आ गई कि अगर आपने ऐसा किया मुझे कन्वीनर नहीं बना के नीतीश कुमार को कन्वीनर बनाया तो फिर हम इंडिया ब्लॉक से चल देंगे। अंत में क्या हुआ नीतीश कुमार इंडिया ब्लॉक से निकले और चले गए एनडीए में और जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो इसका मलाल आज तक सभी दलों को है। ममता बनर्जी को लगता है कि जब उनको जरूरत पड़े तो इंडिया ब्लॉक उनके साथ रहे। लेकिन जब इंडिया ब्लॉकर जरूरत पड़े तो वह अपना नफा और नुकसान देखती है। अडानी के मुद्दे पर टीएमसी ने रखा राहुल से अलग रुख गौतम अडानी के मामले पर तय हुआ कि संसद के अंदर और संसद के बाहर  सांसद प्रदर्शन करेंगे तो अडानी के मुद्दे पर प्रदर्शन होगा। सारी पार्टियां तैयार थी। अचानक से टीएमसी ने अपना स्टैंड बदल लिया। बातचीत फाइनल हो जाती है। सब कुछ तय हो जाता है। लेकिन फायदा क्योंकि उनको दिखता है तो फिर ममता बनर्जी उससे अलग निकल लेती हैं। अडानी के मुद्दे पर भी संसद के अंदर और बाहर उन्होंने इंडिया गठबंधन का साथ नहीं दिया। इसके अलावा एसआईआर के मुद्दे को उठाया राहुल गांधी ने। उन्होंने कहा वोट चोरी हो रही है। महाराष्ट्र में उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कई सारे प्रेस कॉन्फ्रेंस किए। लेकिन तब तक ममता बनर्जी एसआईआर और वोट चोरी के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन के साथ खड़ी नहीं थी।खुद को पीएम मोदी के मुकाबिल खड़ा करने की चलाई मुहिमइतना ही नहीं मोदी सरकार को सरकार से लेकर संसद में विभिन्न मुद्दों पर घेरते राहुल गांधी और कांग्रेस का साथ देने की बजाए ममता बनर्जी का पूरा फोकस खुद को पीएम मोदी के मुकाबिल खड़ा करने में लगा था। उद्धव ठाकरे की पार्टी में संजय राउत ने कहा था कि अगर बीजेपी से कोई लड़ सकता है तो ममता बनर्जी लड़ सकती है। अखिलेश यादव गए थे कोलकाता और ममता बनर्जी से उनकी मुलाकात हुई। बाहर निकले पत्रकारों ने कुछ सवाल पूछे तब उन्होंने कहा था कि अगर बीजेपी से कोई लड़ सकता है सबसे मजबूती से लड़ रही हैं तो वह ममता बनर्जी लड़ रही हैं। मतलब उन्हें राहुल गांधी ने ये सब कुछ जो है शरद पवार ने ये भी ये बात कही थी। एक तरीके से ना इंडिया ब्लॉक के अंदर ही एक ब्लॉक बना लिया था।बंगाल में आगे क्या होतासत्ता पक्ष का हमेशा से दावा होता है कि रैली में उमड़ने वाली भीड़ जीती गारंटी है लेकिन 2026 में अलग होगी। इलेक्शन कमीशन की रिपोर्ट की माने तो भाजपा 206 सीटें जीत रही है। इतिहास रच रही है। टीएमसी केवल 81 सीटों पर सिमटी है। यह ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक है जिसने पूरे नैरेटिव को ध्वस्त किया है। जो प्रचारित किया गया था कि बंगाल में दीदी अच्छी है। बंगाल में खाली खेला दीदी करती है। अमार बोंगला लेकिन फिर आरजी कर  जैसी घटनाएं होती हैं और खोखले नारों से जनता बदलाव की प्यासी थी। 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से शुरू हुआ यह सफर 19 दिसंबर 2020 के इस्तीफे से गुजरता हुआ आज 2026 को अपने असली अंजाम तक पहुंचाया। इसीलिए कहानी केवल एक व्यक्ति की जीत की भी नहीं है। उस हर वोटर की भी है जिसने चुप्पी तोड़ी। उस तंत्र को चुनौती दी।  शुभेंदु अधिकारी ने शून्य से शिखर तक का जो सफर तय किया वो जनता के विश्वास को कई गुना बढ़ा रहे हैं। अब देखते हैं बंगाल में क्या होता है।
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