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    जौहर कानपुरी ने शायर बशीर बद्र को याद किया:बोले-अमेरिका में पाकिस्तानी शायर को शायरी से दिया था जवाब

    13 hours ago

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    1. उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए… 2. कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता। गुफ़्तगू उनसे रोज़ होती है, मुद्दतों सामना नहीं होता। यह कहना है मशहूर शायर जौहर कानपुरी का, जो करीब 20 साल तक डॉ. बशीर बद्र के साथ मुशायरों में रहे और उनके साथ मंच साझा किया। डॉ. बशीर बद्र का जन्म कानपुर के बशीरगंज में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी शहर के हलीम स्कूल से हुई थी। दैनिक भास्कर ने कानपुर से जुड़ी यादों और शहर के इस मशहूर शायर के बारे में शायरा शबीना अदीब, जौहर कानपुरी और उर्दू अदब के जानकार प्रोफेसर डॉ. खान अहमद फारूख से बातचीत की। पढ़िए देश दुनिया के मशहूर शायरों ने क्या कहा जौहर कानपुरी ने कहा मशहूर शायर जौहर कानपुरी ने बताया कि बशीर बद्र की पैदाइश कानपुर में हुई थी। उन्होंने शहर के हलीम स्कूल से शिक्षा हासिल की। उनके पिता पुलिस विभाग में थे। ट्रांसफ़र होने पर परिवार इटावा चला गया। करीब 10 साल की उम्र तक वह इटावा में रहे। बाद में उनके पिता का ट्रांसफ़र फतेहपुर हो गया और परिवार वहां चला गया। 14 साल की उम्र में उनके पिता का इंतक़ाल हो गया था। खास बात यह है कि उनके पिता सैयद मोहम्मद नज़ीर का निधन भी इसी बीमारी से हुआ था। उस समय बशीर बद्र को पुलिस विभाग में नौकरी मिल गई और उनका ट्रांसफ़र इलाहाबाद हो गया। इलाहाबाद में उनकी मुलाक़ात दुनिया के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी से हुई। वहां वह उनके पास नौकरी करने लगे, जिसके लिए उन्हें 50 रुपये महीने मिलते थे। वहीं से उन्होंने शायरी का अंदाज़ सीखा और फ़िराक़ गोरखपुरी के ख़त भी लिखने लगे। जौहर कानपुरी ने एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हुए कहा कि 90 के दशक में अमेरिका में एक बड़ा मुशायरा हुआ था। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से शायर पहुंचे थे। पाकिस्तान से भी कई शायर आए थे। तभी मशहूर शायर अहमद फ़राज़ की एंट्री हुई तो उनके पीछे करीब 20 लोग वाहवाही करते हुए पहुंचे। मंच पर बैठे एक पाकिस्तानी शायर ने कहा, “जब हमारे यहां के शायर आते हैं तो ऐसा ही होता है। इस पर बशीर बद्र ने जवाब दिया, “हिंदुस्तान का शायर आता हुआ नहीं, जाता हुआ देखा जाता है। उनके शब्दों में इतना विश्वास था कि मानो उन्हें पहले से पता हो कि महफ़िल उन्हीं के नाम होने वाली है। हुआ भी वही। जैसे ही उन्होंने शेर पढ़ने शुरू किए, पूरा मुशायरा उनके नाम हो गया। कार्यक्रम खत्म होने के बाद लोगों का हुजूम उनके पीछे चल पड़ा। तब बशीर साहब ने उसी शायर से कहा “देखा आपने, हिंदुस्तान का शायर आता हुआ नहीं, जाता हुआ देखा जाता है। देश की मशहूर शायरा शबीना अदीब ने साझा की यादें मशहूर शायरा शबीना अदीब ने कहा कि उनके लिए यह गर्व की बात है कि बशीर बद्र की पैदाइश कानपुर में हुई थी। उन्हें कई बार उनके साथ मंच साझा करने और उनकी सरपरस्ती में शेर पढ़ने का मौक़ा मिला। उन्होंने बताया, “जब भी मैं भोपाल जाती थी और उनसे मुलाक़ात होती थी, वह अपने घर पर खाना ज़रूर खिलाते थे। शबीना ने बताया कि दो साल पहले वह जौहर साहब के साथ उनसे मिलने भोपाल गई थीं। उनकी पत्नी ने बताया कि बीमारी की वजह से वह करीब 12 साल से कुछ याद रखने में असमर्थ थे। उम्र का असर भी था। लेकिन जब हम लोग उनके पास गए और मैंने उनका मशहूर शेर पढ़ा… कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो। तो वह गुनगुनाने लगे और आगे की लाइनें ख़ुद पूरी करने लगे। यह देखकर हम बहुत खुश हुए। उन्हें भी अच्छा लगा। फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि इन्हें जाने मत देना। शबीना अदीब ने कहा कि यह उनकी ज़िंदगी का बहुत कठिन दौर था। एक ऐसा समय, जब इंसान बुलंदियों पर पहुंच जाए और फिर उसे वही सब याद न रहे। बशीर साहब के आख़िरी साल कुछ ऐसे ही गुज़रे। उन्होंने कहा, “जितने चाहने वाले मैंने उनके देखे, उतने किसी और शायर के नहीं देखे। वह भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शेर और ग़ज़लें हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगी। वह कई साल एक कमरे में रहे, लेकिन उनकी शायरी हमारे दिलों के कमरों में हमेशा क़ैद रहेगी। उर्दू अदब के जानकार डॉ. खान अहमद फारूख ने क्या कहा उर्दू अदब के जानकार डॉ. खान अहमद फारूख ने कहा कि उर्दू शायरी का एक बड़ा नाम आज हमारे बीच नहीं रहा, यह बेहद दुखद है। उन्होंने कहा, “मैं उसी कॉलेज में पढ़ा हूं, जहां से उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शुरू की थी। डॉ. बशीर बद्र की शायरी में एक अलग तरह का नयापन था। उनके शेर लोगों की ज़ुबान पर मुहावरों की तरह चढ़ जाते थे। आम बातचीत में लोग उनके शेर इस्तेमाल करते थे। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में मशहूर थे। उर्दू ग़ज़ल और शायरी पर उनकी किताबें भी हैं और उन्होंने इसी विषय पर पीएचडी भी की थी। डॉ. फारूख ने कहा, “कानपुर से उन्हें बेहद लगाव था। साल 1999 में कानपुर के एक मुशायरे में उनसे लंबी मुलाक़ात हुई थी। मैंने दिल्ली और कानपुर, दोनों जगह उनके मुशायरे सुने। बशीर साहब कभी किसी की नकल नहीं करते थे। उनका अंदाज़ और तरन्नुम बिल्कुल अलग था।
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