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    Jan Gan Man: Justice Swarana Kanta Sharma ने Arvind Kejriwal को करारा जवाब देकर न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा की

    3 hours from now

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    आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से मांग की थी कि वह खुद को दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से अलग कर लें। लेकिन न्यायमूर्ति शर्मा ने केजरीवाल की याचिका को सख्ती से खारिज कर दिया। अदालत के इस फैसले ने न सिर्फ न्यायपालिका की गरिमा की मजबूती से रक्षा की, बल्कि आरोपों की राजनीति पर भी सीधा प्रहार किया। नेताओं, जांच एजेंसियों और हर संस्था पर सवाल उठाने की आदत के शिकार केजरीवाल अब अदालत को भी कठघरे में खड़ा करने लगे थे, लेकिन इस बार उन्हें करारा जवाब मिला है। न्यायमूर्ति शर्मा ने साफ कर दिया कि अदालत किसी दबाव, धारणा या आरोप के आधार पर नहीं चलती। उनके ठोस और सीधे जवाबों ने केजरीवाल की दलीलों की हवा निकाल दी और उन्हें पूरी तरह निरुत्तर कर दिया। यह फैसला एक मजबूत संदेश है कि न्यायपालिका पर उंगली उठाना आसान नहीं और यहां केवल कानून की ही चलेगी। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के विस्तृत फैसले ने न केवल न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, बल्कि राजनीतिक और कानूनी दोनों ही स्तरों पर बहस को भी तेज कर दिया है।अब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर केजरीवाल भारतीय न्यायपालिका पर सवाल क्यों उठा रहे थे। क्या यह केवल एक कानूनी रणनीति थी या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश छिपी थी? एक ऐसा व्यक्ति जो खुद गंभीर आरोपों और जांचों के घेरे में है, अगर वह अदालत की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़ा करने लगे, तो यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश मानी जाएगी, बल्कि आम जनता के बीच भी भ्रम फैलाने का प्रयास लगेगा। इससे यह संदेश जाता है कि जब तथ्यों और कानून के आधार कमजोर पड़ते हैं, तो संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर माहौल बदला जाए। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में न्यायालय के सख्त रुख ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसे प्रयासों की कोई जगह नहीं है और कानून से ऊपर कोई नहीं है।इसे भी पढ़ें: Delhi High Court का Arvind Kejriwal को बड़ा झटका, Justice शर्मा को हटाने की याचिका खारिजहम आपको बता दें कि न्यायमूर्ति शर्मा ने लगभग एक घंटे तक अपना विस्तृत आदेश पढ़ते हुए उन सभी आरोपों और आशंकाओं का क्रमवार उत्तर दिया, जो केजरीवाल की ओर से उठाए गए थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी झूठ को यदि हजार बार भी दोहराया जाए, तो वह सत्य नहीं बन जाता। उन्होंने न्यायिक निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को सिरे से खारिज किया।न्यायमूर्ति शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि एक न्यायाधीश की निष्पक्षता का एक स्वाभाविक अनुमान होता है और इसे केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि केजरीवाल द्वारा व्यक्त की गई शंकाएं केवल व्यक्तिगत आशंकाएं हैं, जो किसी भी कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके सामने जो याचिका आई, वह साक्ष्यों के साथ नहीं बल्कि संकेतों, आरोपों और संदेहों के साथ आई थी। इस प्रकार की याचिका न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास प्रतीत होती है।हम आपको बता दें कि केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों में यह भी कहा गया था कि न्यायमूर्ति शर्मा ने आरएसएस से जुड़ी अधिवक्ता परिषद के कुछ कार्यक्रमों में भाग लिया, जिससे पक्षपात की आशंका बनती है। इस पर न्यायमूर्ति ने कहा कि न्यायाधीशों का विभिन्न वैचारिक संगठनों के कार्यक्रमों में भाग लेना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि बार और बेंच के बीच संबंध केवल अदालत तक सीमित नहीं होते और यह न्यायिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है। किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि या वक्ता के रूप में शामिल होना किसी भी प्रकार के वैचारिक पक्षपात का प्रमाण नहीं माना जा सकता।केजरीवाल के एक अन्य आरोप में यह भी कहा गया था कि न्यायमूर्ति शर्मा के परिवार के कुछ सदस्य सरकारी पैनल में हैं, जिससे हितों का टकराव हो सकता है। इस पर न्यायमूर्ति शर्मा ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष संबंध या प्रभाव नहीं दिखाया गया है, जिससे उनके निर्णय प्रभावित हो सकते हों। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों के बच्चों को कानून का पेशा अपनाने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके किसी भी परिजन का इस मामले से कोई संबंध नहीं है।न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं को पहले कई मामलों में इसी न्यायालय से राहत मिली थी, तब किसी प्रकार का आरोप नहीं लगाया गया। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि जब आदेश पक्ष में होते हैं, तब न्यायालय पर कोई सवाल नहीं उठता, लेकिन जब आदेश प्रतिकूल होते हैं, तब निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े किए जाते हैं। यह प्रवृत्ति न्यायिक प्रणाली के लिए खतरनाक है।हम आपको यह भी बता दें कि केजरीवाल ने यह भी तर्क दिया था कि उनके मामलों में न्यायमूर्ति शर्मा के आदेशों को उच्चतम न्यायालय ने पलट दिया था। इस पर न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने उनके आदेशों पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुछ मामलों में राहत अन्य कारणों से दी गई थी और इससे उनके निर्णय की गुणवत्ता या निष्पक्षता पर कोई प्रश्न नहीं उठता।केजरीवाल ने गृह मंत्री के बयान को आधार बनाकर भी निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। इस पर न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि न्यायालय का किसी भी राजनीतिक बयान पर कोई नियंत्रण नहीं होता और ऐसे आधार पर स्वयं को अलग करना केवल कल्पना पर आधारित होगा। अपने आदेश में न्यायमूर्ति शर्मा ने यह भी कहा कि यदि वह इस मामले से स्वयं को अलग कर लेतीं, तो यह एक गलत परंपरा की शुरुआत होती। इससे यह संदेश जाता कि न्यायपालिका पर दबाव डाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसा करना न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाएगा और यह धारणा बनेगी कि न्यायाधीश किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हुए हैं।न्यायालय ने इसे एक ऐसी स्थिति बताया जिसमें केजरीवाल को हर हाल में लाभ होता। यदि उन्हें राहत नहीं मिलती, तो वह पहले से ही परिणाम का अनुमान होने की बात कहते, और यदि राहत मिलती, तो दबाव का हवाला देते। इस प्रकार की स्थिति को न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ बताया। न्यायमूर्ति शर्मा ने स्पष्ट कहा कि स्वयं को अलग करना उनके कर्तव्य से पीछे हटना होगा। उन्होंने अपने संवैधानिक दायित्व का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय देना उनका कर्तव्य है और वह किसी भी दबाव में नहीं आएंगी। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता की परीक्षा भी है।उधर, इस फैसले के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया। भारतीय जनता पार्टी की सांसद बांसुरी स्वराज ने केजरीवाल पर न्यायपालिका पर दबाव बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश की न्यायिक व्यवस्था किसी व्यक्ति की सुविधा के अनुसार नहीं चलती, बल्कि संविधान और कानून के अनुसार संचालित होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केजरीवाल ने केवल इसलिए मामला स्थानांतरित करने की मांग की क्योंकि उन्हें न्यायालय का पूर्व आदेश पसंद नहीं आया।हम आपको बता दें कि यह पूरा मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें जांच एजेंसी ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित 23 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया गया था। न्यायालय पहले ही इस याचिका पर नोटिस जारी कर चुका है और संबंधित आदेश पर रोक भी लगा चुका है।बहरहाल, यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और संस्थागत मजबूती का प्रतीक बन गया है। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि न्यायालय किसी भी प्रकार के दबाव, आरोप या धारणा के आधार पर अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटेगा। इस घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयासों को गंभीरता से लिया जाएगा और बिना ठोस साक्ष्य के लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करने वाला माना जा रहा है, जिसमें यह संदेश दिया गया है कि न्याय केवल किया ही नहीं जाएगा, बल्कि निष्पक्ष रूप से होते हुए दिखाई भी देगा।
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