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    'जीते जी इलाहाबाद' पुस्तक समीक्षा:डॉ धनंजय चोपड़ा बोले- किताब में पुराने इलाहाबाद की बेबाकी, बौद्धिक साहस की कहानियां हैं

    16 hours ago

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    इलाहाबाद की गलियों में साहित्य की लौ जलती रही। जहां हर मोड़ पर किस्से सांस लेते हैं। ममता कालिया की 'जीते जी इलाहाबाद' उसी जिंदा शहर को शब्दों का आलम पहनाती है, जो साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गई। यह संस्मरण न केवल शहर की बनावट-मजावट उकेरता है, बल्कि हमें सिखाता है कि अपने शहर को रगों में कैसे बहाएं। ममता कालिया को साहित्य अकादमी पुरस्कार इलाहाबाद (प्रयागराज) के लिए गौरव का विषय है कि स्थानीय लेखिका ममता कालिया को 2025 का साहित्य अकादमी पुरस्कार उनके संस्मरण 'जीते जी इलाहाबाद' के लिए मिला। यह किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। शहर की बनावट, मजावट व सृजनात्मक ऊर्जा को जीवंत रूप में उकेरती है। किताब की विशेषताएं हिंदी साहित्य के जानकार व इलाहाबाद विश्वविद्यालय, मीडिया अध्ययन केंद्र के कोर्स कॉर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा बताते हैं कि 'जीते जी इलाहाबाद' केवल संस्मरण नहीं, बल्कि शहर की स्मृतियों, दोस्ती व साहित्यिक चर्चाओं की यात्रा है। इसमें भैरव प्रसाद गुप्त जैसे पुराने साहित्यकारों से लेकर धनंजय चोपड़ा जैसे नए रचनाकारों तक का जिक्र है, जो भूतकाल, वर्तमान व भविष्य की गुंजाइशें दिखाता है। लेखिका ने रानी मंडी के गंगा-यमुना कार्यालय की यादें साझा कीं, जहां साहित्यिक चर्चाएं होती थीं। युवा पीढ़ी के लिए महत्व युवाओं को यह किताब शहर की संस्कृति, रवायत व बेबाकी सिखाती है, साथ ही शब्दों की दुनिया में महारत हासिल करने का तरीका। यह कथेतर विधा में शहर को कथा रूप देने का अनूठा उदाहरण है, जो शॉर्ट कंटेंट के दौर में विरासत संजोने व भविष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है। कोई भी शहर का युवा इसे पढ़कर अपने शहर को जीना सीख सकता है। पुराने व नए इलाहाबाद का चित्रण किताब में पुराना इलाहाबाद (साहित्य व न्याय की दुनिया) व आज का प्रयागराज दोनों मौजूद हैं। ममता कालिया ने शहर को शब्दों से जिया, आसपास के किरदारों को शामिल किया, जिससे यह जीवंत बन गया। यह सिखाती है कि शहर को रगों में बहते हुए कैसे रखें। नई पीढ़ी को संदेश शॉर्ट कंटेंट व रील्स के जमाने में यह पुरस्कार समयानुकूल है। युवा रचनाकार अपने शहर की विरासत को संजोकर आगे बढ़ सकते हैं, जैसा ममता जी ने किया। किताब पढ़ने से शब्द सजोने व शहर को जिंदाबाद करने की सीख मिलेगी। इलाहाबाद की बेबाकी का उल्लेख करता है किताब का यह अंश… किताब के एक किस्से का जिक्र करते हुए डॉ. धनंजय बताते हैं कि एक बार एक साहित्यिक गोष्ठी में जब एक न्यायमूर्ति (जज) अपना भाषण दे रहे थे, तो उनकी कुछ बातें उस दौर के प्रख्यात कथाकार और संपादक भैरव प्रसाद गुप्त को नागवार गुजरीं। गुस्से में भरे भैरव प्रसाद गुप्त ने भरे मंच से कह दिया कि अगर वे सुप्रीम कोर्ट में होते, तो इस न्यायमूर्ति को तुरंत बाहर का रास्ता दिखा देते। इस तीखी प्रतिक्रिया से नाराज होकर जज साहब गोष्ठी छोड़कर नंगे पैर ही बाहर निकल गए। यह किस्सा उस दौर के इलाहाबाद की बेबाकी और बौद्धिक साहस का प्रतीक है। ममता कालिया ने अपनी किताब में इन अनकहे और अद्भुत लम्हों को बेहद रोचक ढंग से पिरोया है, जो पाठकों को पुराने इलाहाबाद की याद दिलाता है।
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