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    'झंडूआ' बोलने वाले, आज अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी 'झंडू जी' पुकारते:कॉमनवेल्थ में आज खेलेंगे नालंदा के खिलाड़ी, मां बोली- अब मुझे कोई सब्जी वाली नहीं कहता

    4 hours ago

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    ‘सब्जी बेचकर बेटे को पढ़ाया-लिखाया। अब उसका सिलेक्शन कॉमनवेल्थ गेम्स में हो गया है। पहले बेटे को सभी झंडूआ कहकर बुलाते थे, पर आज उसे बड़े आदर से झंडू जी कहकर पुकारते हैं। मुझे पहले लोग सब्जी वाली के रूप में देखते थे। आज अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी की मां कहकर बुलाते हैं। जीवन में इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता। ’ ये बातें झंडू की मां कमला देवी कह रही हैं, जिनके बेटे का सिलेक्शन कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा पावरलिफ्टिंग टीम में हुआ है। स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत 23 जुलाई से हो चुकी है। झंडू 24 जुलाई को 72 किलोग्राम भार वर्ग में भाग ले रहे हैं। भास्कर टीम ने इंटरनेशनल प्लेयर झंडू के परिवार से बात की, खिलाड़ी की कामयाबी-संघर्ष रिपोर्ट में पढ़ें… पहले झंडू की कुछ तस्वीरें… पढ़ाई के साथ मां-पिता की मदद भी करते थे झंडू झंडू हरनौत के सबनौह डीह गांव के रहने वाले हैं। 4 भाइयों और 3 बहनों में सबसे छोटे हैं और दिव्यांग हैं। 4 साल की उम्र में झंडू को पोलियो मारा था। कमर के नीचे का एक साइड का अंग काम करना बंद कर दिया था। परिवार की आर्थित स्थिति ठीक नहीं थी। मां-पिता हरनौत बाजार में सड़क किनारे आलू-प्याज बेचकर घर चलाते हैं। पूरा परिवार एक किराए के कमरे में रहता है। झंडू पढ़ाई भी करते थे और मां-पिता की काम में मदद भी करते थे। इसी बीच वे खेलने के लिए समय भी निकाला करते थे। झंडू मां-पिता और दुकान की तस्वीरें… बेटे का कॉमनवेल्थ में जाना, हमारे लिए गर्व की बात- पिता झंडू के पिता रामानंद पासवान कहते हैं कि बेटे का कॉमनवेल्थ में सिलेक्शन होना ये हमारे लिए बहुत ही गर्व और खुशी की बात है। झंडू बचपन से ही काफी तेज रहा है। वो शारीरिक रूप से दिव्यांग जरूर है, पर उसकी इच्छाशक्ति कभी कमजोर नहीं हुई है। उसने अपना हौसला बनाए रखा। आज उसने खेल-खेल में ही विदेश तक सफर कर लिया है। एक पिता के लिए इससे बड़ी बात क्या होगी। हमें और क्या चाहिए। हरनौत नहीं, बिहार का नाम रोशन कर रहा- भाई बड़े भाई कुंदन कुमार कहते हैं कि पिता की तरह ही मुझे भी गर्व हो रहा है। बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। बाजार से गुजरते हैं तो हर कोई कहता है आपका भाई सिर्फ हरनौत का नहीं, बल्कि पूरे बिहार का नाम रोशन कर रहा है। उसका लगन ही उसे आज ऊपर तक लेकर गया है। झंडू को पैरालंपिक पदक विजेता ने ट्रेनिंग दी एक साधारण परिवार के लड़के को अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनाने के पीछे कई लोगों का योगदान रहा है। मागदर्शक के रूप में कुंदन कुमार पांडे 2019 से लगातार जुड़े हुए हैं। इसके अलावा रॉकस्टार जिम के संचालक और ट्रेनर की भी भूमिका रही, जिन्होंने तकनीकी ट्रेनिंग दी। इसके बाद उनकी प्रतिभा को पहचान मिली और उनका चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI), राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र, गांधीनगर (गुजरात) में हुआ। वहां उन्हें पैरालंपिक पदक विजेता राजेंद्र सिंह रहेलू का सानिध्य मिला। राजेंद्र ने अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग दी। बिहार पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन के सचिव संदीप कुमार ने भी झंडू कुमार को हर स्तर पर सहयोग दिया। सब्जी विक्रेता के बेटे का कॉमनवेल्थ में पहुंचा गर्व की बात- कोच नालंदा पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन के सचिव और झंडू के कोच कुंदन कुमार पांडे कहते हैं कि बहुत सौभाग्य की बात है कि आज नालंदा की धरती और हरनौत जैसे छोटे से इलाके से निकलकर कोई खिलाड़ी कॉमनवेल्थ जैसे प्रतिष्ठित मंच पर भाग लेने जा रहा है। वहां हरनौत के एक सब्जी विक्रेता के बेटे का पहुंचना पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। यह ओलंपिक के समकक्ष माना जाने वाला विश्व स्तरीय मंच है। कॉमनवेल्थ गेम्स कब और कैसे शुरू हुआ कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत 1930 में कनाडा के हैमिल्टन में हुई थी। तब इसे ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था। पहले एडिशन में ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़े 11 देशों के 400 से ज्यादा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। इसमें एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, लॉन बॉल्स, रोइंग, स्विमिंग और रेसलिंग जैसे खेल शामिल थे। 1930 से 1950 तक इस टूर्नामेंट को ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा गया। 1954 में इसका नाम बदलकर ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स किया गया। 1970 में यह ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स बना और 1978 से इसे कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम से जाना जाता है। इसका आयोजन हर चार साल में होता है। इसका मकसद कॉमनवेल्थ देशों के खिलाड़ियों को बड़े इंटरनेशनल मंच पर कम्पटीशन का अवसर देना है। भारत ने पहली बार 1934 में हिस्सा लिया था। कितने वेन्यू पर होंगे इवेंट्स? कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का आयोजन ग्लासगो के चार अलग-अलग वेन्यू पर किया जाएगा। ग्लासगो दूसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करेगा। इससे पहले 2014 में पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया था।
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