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    कानपुर जू में एक बाघ पर 1 लाख महीना खर्च:इलेक्ट्रोलाइट्स का घोल पीते हैं, 24 घंटे VIP देखभाल की जाती है

    2 hours ago

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    कानपुर चिड़ियाघर में रहने वाले एक बाघ का खर्च 1 लाख रुपए प्रति महीने के आसपास है। यहां रहने वाले जानवरों का खर्च इंसानों के खर्च से 5 गुना ज्यादा है। जबकि एक मध्यम वर्गीय परिवार एक महीने मे 15 से 20 हजार रुपए के खर्च में अपने परिवार का भरण पोषण कर लेता है। यही खर्च सर्दियो के दिनों में करीब 10 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। ऐसे में एक मध्यम वर्गीय परिवार के खर्च से ज्यादा एक बाघ के ऊपर खर्च किया जा रहा है। लेकिन अब गर्मियों में टेम्परेचर 44 डिग्री के पार हो गया है। ऐसे में चिड़ियाघर के जानवरों, पक्षियों और अन्य जीवों के खर्च और बढ़ गए है। गर्मियों में इलेक्ट्रोलाइट्स से बुझती है प्यास कानपुर जू के क्षेत्रीय वन अधिकारी नावेद इकराम और पशु चिकित्सक डॉ. नासिर की निगरानी में इनका 'डाइट चार्ट' बेहद बारीकी से तैयार होता है। इन मांसाहारी जीवों को दिन भर में केवल एक बार भोजन दिया जाता है, और उसका समय भी फिक्स है दोपहर के ठीक 2 बजे। इनका मुख्य आहार भैंसे का मांस है, जो सीधे स्लॉटर हाउस से आता है। दिलचस्प बात यह है कि, मौसम के हिसाब से इनकी थाली का वजन भी घटता-बढ़ता है। कड़ाके की ठंड में जो टाइगर 10 किलो मांस चट कर जाता है। गर्मियों में उसकी डाइट घटाकर 6 से 8 किलो कर दी जाती है, ताकि पाचन सही रहे। इतना ही नहीं, पारा चढ़ते ही इन खूंखार शिकारियों को डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए पानी में खास इलेक्ट्रोलाइट्स का घोल भी दिया जाता है। हर रोज इनका शाम को रुटीन चेकअप भी किया जाता है जिसमें उनकी हर एक एक्टिविटी पर नजर रक्खी जाती है। सिर्फ मीट ही नहीं, तीमारदारी पर भी होता है खर्च इन वन्यजीवों का खर्च केवल उनकी भारी-भरकम डाइट तक सीमित नहीं है। इन्हें तंदुरुस्त रखने के लिए जू प्रशासन को मोटा मेडिकल बिल भी चुकाना पड़ता है। हर जानवर के वैक्सीनेशन, रूटीन चेकअप और देखरेख के अलावा विशेषज्ञ डॉक्टरों की फीस पर सालाना करीब 1.50 से 2 लाख रुपए अलग से खर्च होते हैं। इन बेजुबानों की 24 घंटे देखरेख के लिए 40 लोगों को लगाया गया है, जो सुबह की सफाई से लेकर शाम 5 बजे होने वाले फाइनल हेल्थ चेकअप तक हर गतिविधि पर नजर रखती है। असल में, ये 12 लाख रुपए सिर्फ एक जानवर को पालने की कीमत नहीं है, बल्कि विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने के लिए प्रशासन द्वारा चुकाया जाने वाला 'कंजर्वेशन टैक्स' है। मिडिल क्लास की सैलरी से महंगा है कानपुर जैसे शहर में एक आम कर्मचारी महीने के 25 से 50 हजार रुपए कमाता है, जिसमें उसे घर का किराया, बिजली, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सब देखना होता है। दूसरी ओर, जू के एक बाघ का मासिक खर्च सीधा 1 लाख रुपए बैठता है। यानी एक बाघ के रखरखाव पर होने वाला खर्च एक आम आदमी की इनकम से करीब दो से तीन गुना ज्यादा है। बावजूद इसके, इन 'महंगे मेहमानों' का ख्याल रखा जा रहा है। साल 2025-26 में 4.30 लाख से ज्यादा दर्शकों ने टिकट कटाकर इन वन्यजीवों का दीदार किया, जो यह बताता है,कि शहर के लोग अपने इन 'शाही पड़ोसियों' पर खर्च होने वाली इस बड़ी रकम को उनकी शान और संरक्षण के लिए जायज मानते हैं। डॉ. नासिर ने बताया- वर्तमान में जू में 13 टाइगर, 4 शेर, 24 तेंदुए,9 भेड़िया,13 लकड़बग्घा,20 सियार,2 लोमड़ी,3 जंगली बिल्ली,2 कटमूर समेत कुल 70 से ज्यादा ऐसे मांसाहारी वन्य जीव है। जिन्हें मांस दिया जा रहा है। सर्दियों में जहां शेर, तेंदुआ, टाइगर इन्हें 10 किलो मांस दिया जाता है तो वहीं, गर्मियों में इनकी डायट 6 से 8 किलो कर दी जाती है। इसी तरीके से अगर हम बात करें अन्य मांसाहारी वन्य जीवों की तो उन्हें गर्मियों में 2.5 किलो मांस और सर्दियों में 4 किलो मांस खाने में दिया जाता है। जोकि सरकारी फंड से आता है।
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