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    कानपुर की होली में गूंजता था ‘रंडुवा सम्मेलन’:1947 में हुई शुरुआत, नेहरू के करीबियों की भी होती थी नजरबंदी; दिग्गज नेता बनते थे कैदी

    2 hours ago

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    गंगा-जमुनी तहजीब और अलमस्त मिजाज के लिए मशहूर कानपुर की होली का इतिहास बेहद रोचक रहा है। आज भले ही होली हुड़दंग और शोर-शराबे तक सीमित होती नजर आती हो, लेकिन आजादी के ठीक बाद शहर में ‘रंडुवा सम्मेलन’ जैसी बौद्धिक और हास्यपरक परंपरा जीवित थी। वर्ष 1947-48 के आसपास शुरू हुआ यह आयोजन करीब एक दशक तक कानपुर की सांस्कृतिक पहचान बना रहा। इस मंच पर विधुर जीवन जी रहे पुरुषों के एकाकीपन को कविता और व्यंग्य के जरिए उत्सव में बदला जाता था। पटकापुर के बिहारी जी मंदिर से हुई शुरुआत कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ल के अनुसार, इस सम्मेलन की नींव दयाशंकर दीक्षित ‘देहाती’ ने रखी थी। नरवल के मूल निवासी देहाती जी ने पटकापुर और कुर्संमा के प्रबुद्ध नागरिकों के साथ मिलकर इस अनूठी परंपरा की शुरुआत की। आयोजन का मुख्य केंद्र पटकापुर स्थित बिहारी जी मंदिर था। सम्मेलन का निमंत्रण पत्र ही इसकी सबसे बड़ी पहचान हुआ करता था। दिग्गज संपादक और मंत्री बनते थे ‘कैदी’ सम्मेलन की लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1951 के चतुर्थ सम्मेलन की अध्यक्षता ‘हिंदी केसरी’ के प्रख्यात संपादक आचार्य लक्ष्मीधर वाजपेयी ने की थी। उस दौर के चर्चित अखबार ‘वीर भारत’ में इसकी खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। 1953 के एक अंक में छपा था कि “कानपुर के बड़े-बड़े रंडुवों की गिरफ्तारी होगी।” इस प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की सूची में तत्कालीन खाद्य मंत्री चंद्रभानु गुप्ता, शिवनारायण टंडन और ब्रजबिहारी मेहरोत्रा जैसे बड़े नाम शामिल बताए जाते थे। इन हस्तियों को ‘रंडुवा हवालात’ में नजरबंद करने की घोषणा होती थी, जहां वे सलाखों के पीछे नहीं, बल्कि मंच पर बतौर सभापति और वक्ता मौजूद रहते थे। दोहों और व्यंग्य से सजती थी महफिल रंडुवा सम्मेलन केवल हास्य का मंच नहीं था, बल्कि उच्च कोटि के साहित्यिक व्यंग्य का केंद्र भी था। कवि देहाती के दोहे सम्मेलन की जान माने जाते थे। वे ‘सरदार पटेल’ से लेकर ‘बापू’ तक का जिक्र इतने अलमस्त अंदाज में करते थे कि श्रोता ठहाके लगाने को मजबूर हो जाते थे। इन आयोजनों में बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा, लक्ष्मीकांत त्रिपाठी और श्याम विजय पांडे जैसे प्रबुद्ध लोग भी शिरकत करते थे, जिससे चर्चाओं को बौद्धिक धार मिलती थी। हालांकि 1958-59 के बाद यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ी और 1960 के आसपास पूरी तरह समाप्त हो गई। जानकारों का मानना है कि बाद में शुरू हुआ ‘गदहा सम्मेलन’ इसी परंपरा का परिवर्तित रूप था, जिसने हास्य-व्यंग्य की उस विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
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