Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    कानपुर में एक नहीं आठ खेली जाती है होली:जानिए 1942 के उस 'अनुराधा नक्षत्र' की कहानी, जिसने बदल दी परंपरा

    3 hours ago

    1

    0

    देशभर में होली का खुमार एक दिन में उतर जाता है, लेकिन कानपुर की तासीर जरा अलग है। यहाँ होली एक दिन नहीं, बल्कि पूरे आठ दिनों तक चलती है। यह कोई साधारण जश्न नहीं, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कानपुर के मज़दूरों और क्रांतिकारियों की जीत का प्रतीक है। 'झाड़े रहो कलेक्टरगंज' की फबती से लेकर हटिया के गंगा मेला तक, कानपुर की होली में संघर्ष, इतिहास और मस्ती का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। 1942 की वो क्रांति जब जेल के ताले टूटे और फिर खिला गुलाल कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ला ने बताया कि,शहर की होली का सबसे गौरवशाली इतिहास साल 1942 से जुड़ा है। उन दिनों क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों का दमन चक्र चल रहा था। हटिया के रज्जन बाबू पार्क में क्रांतिकारियों ने तिरंगा फहराकर होली खेलने का फैसला किया, लेकिन अंग्रेज पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में पूरे शहर ने एकजुट होकर फैसला किया कि जब तक साथी रिहा नहीं होंगे, होली नहीं मनाई जाएगी। सात दिनों तक शहर में सन्नाटा रहा, न किसी के घर चूल्हा जला और न किसी ने रंग छुआ। आखिरकार ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और अनुराधा नक्षत्र के दिन जैसे ही क्रांतिकारी रिहा हुए, पूरे कानपुर ने जश्न मनाया। उसी दिन गंगा स्नान हुआ और जमकर रंग खेला गया, जिसे आज भी 'गंगा मेला' के रूप में याद किया जाता है। झाड़े रहो कलेक्टरगंज' और मज़दूरों की थकान का मनोरंजन इतिहासकार अनूप शुक्ला बताते हैं, कि कानपुर मूलतः श्रमिकों का शहर रहा है। 1866 में जब कलेक्टरगंज अनाज मंडी बसाई गई, तो वहां काम करने वाले मुंशी और मुनीम अनाज की पर्छियां झाड़कर दाने इकट्ठा करते थे। बाद में यही लोग जब संपन्न हुए और होली पर तंजेब का कुर्ता पहनकर निकले, तो पुराने रईसों ने उन पर तंज कसते हुए कहा 'झाड़े रहो कलेक्टरगंज, हटिया खुली बजाजा बंद'। हटिया का बाजार 1874-75 में एक टाउन प्लानर के जरिए व्यवस्थित किया गया था और यह धीरे-धीरे शहर की संस्कृति का केंद्र बन गया। 18 गांवों में लगान के खिलाफ जंग की याद दिलाती रंग पंचमी: शहर से सटे गंगा किनारे के 18 गांवों की कहानी और भी दिलचस्प है। वाजिदपुर, प्योंदी, शेखपुर और अहिरवां जैसे गांवों में आज भी मुख्य होली के दिन नहीं, बल्कि रंग पंचमी पर होली खेली जाती है। अनूप शुक्ला बताते हैं,कि यह परंपरा अंग्रेजों द्वारा थोपे गए भारी लगान के विरोध से शुरू हुई थी। पूर्वजों ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया और उस जंग की जीत की खुशी में पंचमी को रंग खेला। आज भी जब इन गांवों के युवा यह किस्सा सुनते हैं, तो उनका चेहरा जोश से भर जाता है और जीत का वही उत्साह पंचमी पर एक-दूसरे को रंगने में दिखाई देता है। बांस के नीचे दबी चिनगारी और सांस्कृतिक केंद्रों की चमक हटिया में होली जलाने की परंपरा भी बेहद प्राचीन है। पहले होली के स्थान पर एक बड़ा बांस गाड़ा जाता था और उसके नीचे पिछले साल की दबी हुई आग यानी 'चिनगारी' सुरक्षित रखी जाती थी। बच्चे घर-घर जाकर लकड़ियाँ मांगते थे और लोग पुरानी कुर्सियां या टूटे बेलन तक दान कर देते थे। यह उत्सव सिर्फ रंगों का नहीं बल्कि अदब का भी केंद्र था। यहाँ के नवजीवन पुस्तकालय में झंडा गान के रचयिता श्यामलाल पार्षद कार्यक्रम करते थे, तो अनुरंजिका आश्रम में कवि सम्मेलनों की महफिल सजती थी। साहित्य की बात करें तो पंडित प्रतापनारायण मिश्र ने 1883 में होली के दिन ही 'ब्राह्मण' पत्र की शुरुआत की थी। आज भी कानपुर की नई पीढ़ी उसी जिंदादिली के साथ इस आठ दिनी परंपरा को सहेजे हुए है।
    Click here to Read more
    Prev Article
    श्री दाऊजी महाराज मंदिर में आज विश्व प्रसिद्ध हुरंगा:हुरियारों के नंगे बदन पर बरसेंगे कोड़े
    Next Article
    सहारनपुर में मंदिर संपत्ति का फर्जी बनामा कराया:समिति सदस्यों ने भूमाफियाओं पर लगाया 50 लाख लेने का आरोप, कोर्ट के आदेश पर FIR

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment