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    लखीमपुर खीरी के ओयल में पीतल कारोबार संकट में:पुश्तैनी कारीगरी हो रही प्रभावित, कारोबारी बोले- सरकार से नहीं मिल रही मदद

    16 hours ago

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    लखीमपुर खीरी के ओयल कस्बे का प्रसिद्ध पीतल कारोबार अब अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। कभी 'पीतल नगरी' के नाम से मशहूर यह कस्बा, जो शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर सीतापुर मार्ग पर स्थित है, अपनी पुश्तैनी कारीगरी के लिए जाना जाता था। यहां बटुआ, लोटा, कटोरा, चिमचा, गगरी और करवा जैसे पारंपरिक पीतल के बर्तन बनाए जाते थे। इन उत्पादों की मांग न केवल स्थानीय स्तर पर थी, बल्कि इन्हें प्रदेश के कई जिलों में भी भेजा जाता था। हालांकि, समय के साथ हालात बदल गए हैं। सरकारी प्रोत्साहन की कमी, बढ़ती महंगाई, कच्चे माल की अनुपलब्धता और आधुनिक फाइबर और स्टील के बर्तनों की बढ़ती लोकप्रियता ने इस कारोबार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। अब पुश्तैनी कारीगर भी इस व्यवसाय को जारी रखने में असमर्थता व्यक्त कर रहे हैं। कम हो रही पीतल के बर्तनों की खरीदारी पीतल के दामों में लगातार वृद्धि से उत्पादन लागत कई गुना बढ़ गई है। इसके विपरीत, बाजार में सस्ते फाइबर और स्टील के बर्तनों की उपलब्धता ने पारंपरिक पीतल के बर्तनों की मांग को आधे से भी कम कर दिया है। एक समय हर घर की आवश्यकता रहे पीतल के बटुआ, कटोरा और लोटा अब कम ही खरीदे जाते हैं। एक समय था जब ओयल के लगभग हर घर में पीतल के बर्तन बनाने का छोटा-बड़ा कारखाना चलता था। परिवार के सदस्य मिलकर काम करते थे और व्यापारी तैयार माल को आसपास के जिलों में बेचते थे। बड़ी रेलवे लाइन बनने से पहले यहां एक रेलवे स्टेशन भी था, जिससे कच्चे माल का आयात और तैयार माल का निर्यात आसान था। अब यह सुविधा समाप्त हो गई है और कारोबार कुछ गिने-चुने घरों तक सिमट कर रह गया है। मोहल्ला बगिया के कारोबारी राम सिंह ने बताया, ‘छोटे व्यापारियों को सरकार से छूट मिलनी चाहिए। पुलिस अक्सर माल वाहनों को रोक लेती है, जबकि इसके लिए एक अलग विभाग है। पहले रेलवे स्टेशन होने से व्यापार सुरक्षित और सुगम था, अब वह सुविधा भी नहीं है।’ पुश्तैनी कारोबारी बोले- बाजार अब सिमट गया है पुश्तैनी कारोबारी अन्नू लाल कसेरा बताते हैं- हमारे परिवार में यह काम पीढ़ियों से होता आया है। अब कोयले की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। सरकार से न सहायता मिलती है, न प्रशिक्षण। पहले सिधौली, कमलापुर, पीलीभीत, लखनऊ, बाराबंकी और फतेहपुर तक माल जाता था, अब बाजार सिमट गया है। वहीं, बर्तन कारीगर कैलाश नाथ का कहना है- मैं 1993 में मुरादाबाद ट्रेनिंग के लिए गया था। कई बार वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। पहले तैयार माल कई जिलों तक भेजा जाता था, अब सुविधाएं खत्म हो गई हैं। सरकार से कोई सहायता नहीं मिल रही पीतल कारोबारी सत्यम सिंह कहते हैं- हमारे पुश्तैनी व्यापार को सरकार से किसी प्रकार का प्रोत्साहन या वित्तीय सहायता नहीं मिल रही। आधुनिक तरीके से काम करने की कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है और मांग आधी से भी कम रह गई है। कभी ओयल की पहचान रहे पीतल उद्योग की चमक अब फीकी पड़ती नजर आ रही है। यदि समय रहते सरकारी सहयोग, प्रशिक्षण और बाजार की नई संभावनाएं नहीं मिलीं, तो यह पारंपरिक कला इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाने का खतरा झेल रही है।
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