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    लखनऊ हाईकोर्ट ने कहा- अफसर दोष भावना से दूर रहें:शस्त्र लाइसेंस याचिका पर स्थायी और पैतृक निवास का अंतर समझाया

    2 hours ago

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    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक शस्त्र लाइसेंस से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि सरकारी अधिकारियों को अपने वैधानिक दायित्वों का निर्वहन करते समय दोष भावना से दूर रहकर न्यायहित में कार्य करना चाहिए। कोर्ट ने याची के शस्त्र लाइसेंस आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लेने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने अजय प्रताप सिंह की याचिका पर यह आदेश दिया। कोर्ट ने जिलाधिकारी के आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याची के अधिवक्ता होने के कारण ही जिलाधिकारी ने उस पर तथ्य छिपाने का आरोप लगाया। याची अजय प्रताप सिंह ने बताया कि वह वर्ष 2003 से हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं। उन्होंने विकास नगर स्थित अपने मकान में पिछले 10 वर्षों से निवास करने का उल्लेख करते हुए इसी पते पर शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। हालांकि, लखनऊ के जिलाधिकारी ने 9 जनवरी को उनका आवेदन खारिज कर दिया। जिलाधिकारी ने तर्क दिया कि याची का पैतृक निवास सुल्तानपुर है, जबकि उन्होंने अपने शपथ पत्र में स्थानीय और स्थायी पता लखनऊ का दिया है। जिलाधिकारी के अनुसार, याची ने जानकार होते हुए भी शपथ पत्र में इस तथ्य का उल्लेख नहीं किया। न्यायालय ने पाया कि सुल्तानपुर में पैतृक निवास होने की जानकारी याची ने स्वयं दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल पैतृक निवास सुल्तानपुर में होने के आधार पर याची को लखनऊ का स्थायी निवासी नहीं माना जा सकता, जबकि उसके आधार कार्ड, वोटर आईडी और अवध बार के कार्ड सभी लखनऊ के पते पर ही हैं। न्यायालय ने समझाया कि 'स्थायी निवास' और 'पैतृक निवास' दो अलग-अलग शब्द समूह हैं, जिनके अर्थ भिन्न हैं। स्थायी निवास का अर्थ है कि व्यक्ति उस स्थान पर अस्थायी रूप से नहीं, बल्कि स्थायित्व के साथ निवास कर रहा है। इन टिप्पणियों के साथ, न्यायालय ने जिलाधिकारी को याची के शस्त्र लाइसेंस के आवेदन पर नए सिरे से विचार कर निर्णय लेने का आदेश देते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।
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