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    लखनऊ में अभिलेख प्रदर्शनी, जनगणना पर संगोष्ठी:प्रो. गुप्ता ने बताया सामाजिक-आर्थिक शोध में जनगणना का महत्व

    2 hours ago

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    राजधानी लखनऊ में एक अभिलेख प्रदर्शनी एवं संगोष्ठी का आयोजन किया गया।यह कार्यक्रम उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार, लखनऊ और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु के स्कूल ऑफ डेवलपमेंट की ओर से किया गया। जिसका विषय 'गिनती में आओ-भारत में जनगणना का डाक इतिहास' था। इस कार्यक्रम के तीसरे दिन लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार गुप्ता ने 'सामाजिक एवं आर्थिक शोध में जनगणना का महत्व' विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया।अपने संबोधन में प्रो. गुप्ता ने जनगणना के आंकड़ों को शोधार्थियों के लिए गहन विश्लेषण हेतु अत्यंत उपयोगी बताया। उन्होंने शोधार्थियों को आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन और सहसंबंध के आधार पर निष्कर्ष निकालने की सलाह दी। राज्यों में महिलाओं की जनसंख्या पुरुषों से कम प्रो. गुप्ता ने उदाहरण देते हुए बताया कि 1951 से 2011 तक भारत की जनसंख्या में वृद्धि हुई है, जबकि कुल प्रजनन दर (टी.एफ.आर.) में गिरावट दर्ज की गई है। उन्होंने इसके पीछे कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने मातृसत्तात्मक राज्यों जैसे पूर्वोत्तर और केरल में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक होने का उल्लेख किया, जबकि हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे पुरुषसत्तात्मक राज्यों में महिलाओं की जनसंख्या पुरुषों से कम है। महिला साक्षरता को प्रजनन दर में गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण बताते हुए, उन्होंने महिला साक्षरता में ड्रॉपआउट दर कम करने पर जोर दिया। 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त होगा भारत सरकार के 2047 तक विकसित भारत बनने के लक्ष्य के संदर्भ में, प्रो. गुप्ता ने जनगणना से प्राप्त साक्षरता आंकड़ों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विभिन्न राज्यों में साक्षरता दर भिन्न-भिन्न है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य में साक्षरता दर को समान करने का प्रयास किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका मानना था कि ऐसा होने पर 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में, सहायक निदेशक (संरक्षण) विजय कुमार श्रीवास्तव ने प्रो. प्रमोद कुमार गुप्ता को उनके वक्तव्य के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को भी धन्यवाद दिया।
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