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    लखनऊ में ग्रीन बेल्ट पर बसा दिया था सहारा शहर:30 साल बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद; 270 एकड़ जमीन पर किसका हक?

    11 hours ago

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    लखनऊ के गोमतीनगर में 270 एकड़ जमीन पर तीन दशक से विकसित सहारा शहर का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। नगर निगम का दावा है कि यह जमीन ग्रीन बेल्ट विकसित करने के लिए दी गई थी। लेकिन, सहारा ने आवासीय और व्यावसायिक निर्माण कर लीज की शर्तों का उल्लंघन किया। लीज डीड की 30 साल की डेडलाइन भी कंप्लीट हो गई। दूसरी ओर, सहारा का दावा है कि उसने परियोजना में 2480 करोड़ रुपए का निवेश किया है और बिना वैधानिक प्रक्रिया के जमीन पर कब्जा कर लिया गया। इसी बीच राज्य सरकार इसी जमीन पर नए विधानसभा परिसर की तैयारी में जुटी है। इसकी जिम्मेदारी LDA को है। यह जमीन लखनऊ नगर निगम ने सहारा इंडिया को 100 रुपए के स्टांप पर दी थी। अब सवाल यह है कि आखिर इस जमीन पर हक किसका है? फिलहाल नगर निगम ने शर्तें तोड़ने का आरोप लगाकर कब्जा ले लिया है। अब 31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होगी। 100 रुपए की लीज से शुरू हुआ 270 एकड़ का विवाद गोमतीनगर के विपुल खंड की 270 एकड़ जमीन का विवाद करीब तीन दशक पुराना है। इसकी शुरुआत 22 अक्टूबर 1994 को हुई, जब लखनऊ नगर निगम ने यह जमीन सहारा इंडिया हाउसिंग लिमिटेड को 100 रुपए के स्टांप पर लाइसेंस डीड के जरिये दी थी। समझौते के तहत कंपनी को प्रति एकड़ एक हजार रुपए शुल्क देना था। इस क्षेत्र में करीब 170 एकड़ नगर निगम और 100 एकड़ एलडीए की जमीन शामिल थी। लीज की प्रमुख शर्त थी कि पूरे इलाके को ग्रीन बेल्ट के रूप में विकसित किया जाएगा। मामले में याचिकाकर्ता अधिवक्ता बीके सिंह का दावा है कि लीज प्रक्रिया शुरू से ही नियमों के विपरीत थी। उनके मुताबिक, 100 रुपए के स्टांप पर 30 वर्षों के लिए इतनी बड़ी जमीन का आवंटन एलडीए के नियमों के अनुरूप नहीं था। अब 30 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद नगर निगम ने आरोप लगाया है कि जमीन का उपयोग तय उद्देश्य के विपरीत किया गया और लीज की शर्तों का पालन नहीं हुआ। इसके आधार पर सितंबर 2025 में निगम ने लीज निरस्त कर जमीन का कब्जा अपने हाथ में ले लिया। ‘नियमों को दरकिनार कर सहारा को दी गई थी जमीन’ सहारा शहर की जमीन को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में याचिकाकर्ता एडवोकेट बीके सिंह शुरुआत से ही इस लीज को नियमों के खिलाफ बताते रहे हैं। एडवोकेट बीके सिंह कहते हैं- साल 1994-95 में नगर निगम और एलडीए ने नियमों को दरकिनार करते हुए यह जमीन सहारा को आवंटित कर दी थी। इस जमीन के लिए कोई रजिस्टर्ड डीड नहीं की गई। केवल स्टांप पर लीज दी गई और प्रति एकड़ हजार रुपए वार्षिक किराया तय कर दिया गया। उनका दावा है कि इतनी बड़ी जमीन के आवंटन में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। उनके अनुसार, सहारा को 270 एकड़ जमीन ग्रीन बेल्ट विकसित करने के उद्देश्य से दी गई थी। मास्टर प्लान में इस क्षेत्र को शहर की नर्सरी और हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना था, लेकिन बाद में यहां व्यावसायिक गतिविधियां और निर्माण शुरू हो गए। उनका आरोप है कि परिसर में हुए कई निर्माण लीज की शर्तों के अनुरूप नहीं थे। 'नियमों को दरकिनार कर दी गई थी जमीन' बीके सिंह का कहना है कि इन आदेशों को सीधे चुनौती देने के बजाय कई मुकदमों के जरिए मामले को सालों तक लंबित रखा गया। उनके मुताबिक, लीज और लाइसेंस का टाइम पीरीयड 30 साल था, जो अब पूरा हो चुका है। ऐसे में किसी भी प्राधिकरण को लीज बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बीके सिंह आगे कहते हैं कि वर्ष 2017 में जस्टिस कमलेश्वर नाथ के अवार्ड में भी कहा गया था कि सेबी से जुड़ा विवाद समाप्त होने के बाद ही सहारा के दावे पर विचार किया जाए। हालांकि, किसी भी प्राधिकरण को लीज विस्तार देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। बीके सिंह के अनुसार, जिस उद्देश्य से सहारा को जमीन दी गई थी, उसका पालन नहीं हुआ। ग्रीन बेल्ट विकसित करने के बजाय भूमि का व्यावसायिक उपयोग किया गया। उनका कहना है कि इस संबंध में उच्च न्यायालय भी अपनी टिप्पणियां कर चुका है। ऐसे में सहारा का भूमि पर कोई वैध दावा नहीं बचता। उन्होंने यह भी कहा कि सहारा इस मामले में एक बार सर्वोच्च न्यायालय से भी राहत पाने में असफल रहा है। उनके मुताबिक, यदि आवंटन की शर्तों का पालन नहीं किया जाता है तो सरकार को जमीन वापस लेने का अधिकार है। बीके सिंह के मुताबिक, भूमि आवंटन में वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। उनके अनुसार, नगर निगम केवल संपत्ति का संरक्षक होता है, जबकि एलडीए को जमीन आवंटन के लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए था। नगर निगम बोला- लीज की शर्तें टूटीं नगर निगम का दावा है कि जिस जमीन को ग्रीन बेल्ट विकसित करने के लिए दिया गया था, वहां समय के साथ आवासीय और व्यावसायिक निर्माण खड़े हो गए। निगम के मुताबिक, परिसर में लग्जरी बंगले, मॉडर्न थिएटर, पांच हजार क्षमता का सभागार और एयरपोर्ट जैसी सुरक्षा व्यवस्था तक विकसित कर दी गई। नगर निगम का आरोप है कि लीज की मूल शर्तों का पालन नहीं किया गया। करीब 40 एकड़ क्षेत्र को ग्रीन बेल्ट के रूप में सुरक्षित रखा जाना था, लेकिन भूमि का उपयोग तय उद्देश्य से अलग किया गया। निगम का कहना है कि इससे भूमि उपयोग नियमों का भी उल्लंघन हुआ। अधिकारियों के अनुसार, इन अनियमितताओं को लेकर 2020 और 2025 में कई नोटिस जारी किए गए, लेकिन स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। नगर निगम का दावा है कि सुधार के पर्याप्त अवसर दिए गए, इसके बावजूद लीज की शर्तों का पालन नहीं किया गया। जमीन पर ग्रीन बेल्ट विकसित किया जाना था लीज डीड के मुताबिक, जमीन का यूज शहर के ग्रीन बेल्ट के लिए किया जाना थ। इसके अलावा कोई भी कॉमर्शियल यूज नहीं किया जाएगा। लगभग 40 एकड़ क्षेत्र ग्रीन एरिया रहेगा। अगर कोई निर्माण करना है तो एलडीए और नगर निगम के नियमों के अनुसार ही होगा। नियम के विरुद्ध से हटकर भूमि यूज नहीं किया जाएगा। समय-समय पर देय शुल्क और अन्य शर्तों का पालन किया जाएगा। अगर शर्तें टूटती हैं तो क्या नियम है? सहारा ने जमीन के बदले नगर निगम और एलडीए को कितना पैसा दिया था? एडवोकेट बीके सिंह का कहना है कि सहारा को 270 एकड़ जमीन महज 100 रुपए के स्टांप पर दे दी गई थी। उनके मुताबिक, नगर निगम, एलडीए और सहारा के बीच भूमि विकास के लिए लाइसेंस एग्रीमेंट किया गया, लेकिन पूरी लीज प्रक्रिया ही नियमों के विपरीत थी। बीके सिंह के अनुसार, सहारा ने अदालत में दावा किया है कि उसने इस परियोजना में करीब 2480 करोड़ रुपए का निवेश किया और 87 से अधिक भवन विकसित किए। कंपनी ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर वह लीज विस्तार के लिए अतिरिक्त धनराशि जमा करने को भी तैयार थी। 22 अप्रैल 2026 को सहारा की याचिका खारिज की थी इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 22 अप्रैल 2026 को सहारा की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद सहारा ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसमें सहारा ने कहा कि द ऑर्बिटल ट्रीबुलस एट लखनऊ से रिटायर्ड जस्टिस कमलेश्वर नाथ के ऑर्डर का जिक्र किया जा रहा है। इसमें लीज रीन्युअल करने की बात करते हुए ऑर्डर किये जाने की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार, नगर निगम और एलडीए से क्या पूछा है? 29 मई 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। नगर निगम ने लीज निरस्त करने के क्या आधार बताए? नगर निगम का कहना है कि मूल उद्देश्य से अलग निर्माण किए गए। ग्रीन बेल्ट की शर्तों का उल्लंघन हुआ। कई नोटिस के बावजूद सुधार नहीं किया गया। लीज और लाइसेंस डीड की शर्तों का पालन नहीं हुआ। 'बिना मुआवजा और वैधानिक प्रक्रिया के कब्जा नहीं' सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क है कि परियोजना में हजारों करोड़ रुपए का निवेश किया गया। 2017 का आर्बिट्रेशन आदेश उसके पक्ष में है। पूरी जमीन ग्रीन बेल्ट नहीं है। नगर निगम की कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। बिना मुआवजा और वैधानिक प्रक्रिया के कब्जा नहीं लिया जा सकता। अब नजर 31 जुलाई पर 31 जुलाई 2026 की सुनवाई इस बहुचर्चित विवाद में बेहद अहम मानी जा रही है। इसी सुनवाई से यह साफ होने की दिशा तय होगी कि गोमती नगर की बहुमूल्य 170 एकड़ जमीन पर अंतिम अधिकार सहारा समूह का रहेगा या सरकार का। वहीं, इस जमीन पर प्रस्तावित नए विधानभवन कॉम्प्लेक्स का भविष्य भी काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा। ----------------------- ये खबर भी पढ़िए- लखनऊ नगर निगम ने सील किया सहारा शहर : सुब्रतो कोठी और स्वप्ना कुटी पर जड़ा ताला, सहारा प्रबंधन ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा लखनऊ नगर निगम ने अल्टीमेटम खत्म होने के बाद आज सुबह 11:30 बजे सहारा शहर की सीलिंग की कार्रवाई शुरू की। 5 घंटे से अधिक समय तक चली सीलिंग में 170 एकड़ में फैले सहारा शहर और सुब्रत रॉय की कोठी सील कर दिया। अंदर रहने वाले कर्मचारियों और सिक्योरिटी टीम के लोगों को बाहर निकाला। उनकी पत्नी स्वप्ना रॉय की 'स्वप्ना कुटी' कोठी भी सील कर दिया। इसी में स्वप्ना रॉय अपने रिश्तेदारों के साथ में रहती थीं। सहारा शहर के मवेशियों गाय, भैंस, भैंसा और सांड़ को कान्हा उपवन भेजा गया। मुर्गियों और बत्तख को भी नगर निगम ने शेल्टर होम भेजा गया। (पूरी खबर पढ़िए)
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