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    लखनऊ में गैस की किल्लत, कोयले की बढ़ी मांग:चटोरी गली में 60 फीसदी दुकानें बंद, 5000 लोग प्रभावित

    16 hours ago

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    लखनऊ में एलपीजी गैस सिलेंडर की किल्लत खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। गैस की कमी से होटल, रेस्टोरेंट और खाने-पीने के बाजारों के संचालकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। गैस न मिलने के कारण कई दुकानदार मजबूर होकर फिर से कोयले की भट्ठी और लकड़ी के चूल्हे का सहारा लेने लगे हैं। कोयले और लकड़ी के इस्तेमाल से न केवल खर्च बढ़ गया है, बल्कि काम करना भी मुश्किल हो गया है। कारीगरों को भी कोयले पर काम करने में दिक्कत हो रही हैं। गैस सिलेंडर की किल्लत होने शीरोज हैंगआउट कैफे ने फिलहाल लंच और डिनर सर्विस बंद कर दी है। फेमस चटोरी गली में सन्नाटा पसरा हुआ है। गैस का संकट वहां भी साफ नजर आ रहा है। करीबन 50 से 60 फीसदी दुकानें बंद हो गई हैं। चटोरी गली में सीधे तौर पर लगभग 200 लोग रोजगार से जुड़े हैं जिनपर संकट मंडरा रहा है। इसके अलावा, पूरे लखनऊ में वेंडिंग जोन और ठेले-खोमचे वालों की संख्या 5000 हजार से ऊपर है, जिन पर सीधा असर पड़ रहा है। गैस संकट से जूझ रहे दुकानदारों और रेस्टोरेंट संचालकों का कहना है कि अगर जल्द ही आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो उन्हें कारोबार चलाना मुश्किल हो जाएगा। सबसे पहले देखिए ये तीन तस्वीरें …. सिलेंडर संकट के बाद भट्ठियों के दाम आसमान पर लखनऊ में गैस सिलेंडर की किल्लत के बाद अब शहर में भट्ठियों के दाम भी तेजी से बढ़ गए हैं। भट्ठी की दुकानों पर भारी भीड़ देखने को मिल रही है और कई जगह इन्हें मनमाने दामों पर बेचा जा रहा है। हालात यह हैं कि जो भट्ठी पहले करीब 500 रुपए में मिलती थी, वही अब 3500 रुपए तक में बेची जा रही है। होटल और रेस्टोरेंट संचालक भट्ठी खरीदने के लिए परेशान हैं। वहीं दुकानदारों का कहना है कि भट्ठियां 7 से 8 दिन के इंतजार के बाद मिल पा रही हैं। अब पढ़िए दुकान संचालकों की समस्या… टुंडे कबाबी के ग्रैंड सन फराज का दर्द टुंडे कबाबी के ग्रैंड सन फराज ने बताया कि करीब 100 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब होटल चलाने के लिए ईंधन का इतना बड़ा संकट खड़ा हो गया है। गैस सिलेंडर के संकट से हम लोग काफी परेशान हैं। मजबूरी में कोयले का सहारा लेना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि दिक्कत यह है कि अब जो कारीगर हैं, वे नई पीढ़ी के हैं और उन्हें कोयले पर पराठा सेंकना या कबाब बनाना नहीं आता। ऐसे में अब पुराने कारीगरों को ढूंढना पड़ रहा है, जिन्हें कोयले पर खाना बनाने का अनुभव हो। फराज के मुताबिक हालात इतने खराब हैं कि यह स्थिति कोरोना काल से भी ज्यादा मुश्किल लग रही है। रमजान के महीने में आमतौर पर कारोबार काफी बढ़ जाता है, लेकिन इस बार महंगा कोयला खरीदकर भी काम चलाना पड़ रहा है, जिससे नुकसान हो रहा है। कश्मीरी चाय बेचने वाले ओसामा की परेशानी कश्मीरी चाय बेचने वाले ओसामा ने बताया कि वे कई दशकों से यह काम कर रहे हैं, लेकिन अचानक आए इस संकट का सामना करना काफी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि कश्मीरी चाय को सही रंग और जायका देने के लिए इसे लगातार 8 से 10 घंटे तक पकाना पड़ता है। ओसामा के मुताबिक अगर 10 घंटे तक लगातार कोयला जलाया जाए तो करीब दो हजार रुपए का कोयला खर्च हो जाता है। गैस सिलेंडर की किल्लत के कारण अब उन्हें पूरी तरह गैस से कोयले की ओर शिफ्ट होना पड़ रहा है। ओसामा ने आगे कहा कि वे पुराने शहर में हैं, इसलिए किसी तरह कोयला मिल जा रहा है, लेकिन शहर के दूसरे हिस्सों में तो करीब 50 प्रतिशत दुकानें बंद हो चुकी हैं। चटोरी गली की 60 प्रतिशत दुकानें बंद चटोरी गली के उपाध्यक्ष अविनाश कुमार ने बताया कि हालात अब व्यापारियों के कंट्रोल से बाहर हो चुके हैं। खाने का कारोबार करने वाले ठेला लगाने वालों से लेकर फाइव स्टार होटल तक सभी इस संकट से जूझ रहे हैं और फिलहाल किसी के पास इसका कोई ठोस समाधान नहीं है। अविनाश के मुताबिक चटोरी गली में कुल 140 दुकानें रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से करीब 60 प्रतिशत दुकानें बंद हो चुकी हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे तो अगले दो दिनों में पूरी मार्केट बंद होने की नौबत आ सकती है। कोयले पर केवल सीमित आइटम ही बनाए जा सकते हैं और अब वह भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि जैसे ही कोयला खत्म होगा, 2 से 4 दिनों के भीतर हालात और भी खराब हो सकते हैं। 4 लाख का धंधा सिमटकर 80 हजार पर पहुंचा चटोरी गली से करीब 200 लोग सीधे तौर पर रोजगार से जुड़े हैं, जिनके परिवार भी इसी कमाई पर निर्भर हैं। इसके अलावा सब्जी सप्लाई करने वाले, साफ-सफाई करने वाले और अन्य सेवाएं देने वाले लोगों को मिलाकर करीब 5000 लोग इस संकट से प्रभावित हो रहे हैं। गैस सिलेंडर की किल्लत के कारण कई दुकानदारों और कर्मचारियों को मजबूरी में ई-रिक्शा चलाना या मजदूरी करना शुरू करना पड़ा है। सामान्य दिनों में पूरी मार्केट से प्रतिदिन करीब 4 लाख रुपए का कारोबार होता था, जो अब घटकर करीब 80 हजार रुपए रह गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात कितने खराब हो चुके हैं। 50 साल पुराना दादा का दौर लौटा मुबीन होटल के मालिक शोएब कुरैशी ने बताया कि होटल के 50 साल के इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति आई है, जब उन्हें फिर से कोयले और लकड़ी के चूल्हों पर लौटना पड़ रहा है। उनके मुताबिक ऐसा लग रहा है मानो वे 50 साल पीछे चले गए हों। उन्होंने बताया कि अब लोग होटल में बैठकर खाने से ज्यादा ग्रेवी और निहारी पैक कराकर ले जा रहे हैं, जिससे अंदाजा लगता है कि लोगों के घरों में भी गैस सिलेंडर की समस्या है। शोएब के अनुसार उनके पास अभी सिर्फ एक दिन का बैकअप बचा है। होटल में भट्ठी वाले चूल्हे तैयार किए गए हैं और धीरे-धीरे लकड़ी और कोयले पर शिफ्ट किया जा रहा है। हालांकि इस प्रक्रिया में लेबर ज्यादा लगेगी और खाने की लागत भी बढ़ेगी, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है। शोएब कुरैशी का कहना है कि- संभवतः यह मामला अभी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जानकारी में नहीं पहुंचा है। जैसे ही उन्हें स्थिति का पता चलेगा, उम्मीद है कि कार्रवाई होगी। यह मामला सीधे लोगों के पेट से जुड़ा हुआ है और गरीब आदमी पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। शिरोज कैफे बंद करने की नौबत शिरोज कैफे के मैनेजर नितिन ने बताया कि गैस की किल्लत के बाद इलेक्ट्रॉनिक चूल्हा और इंडक्शन पर कैफे चला रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह आती है कि हमारे सारे क्रोकरी इंडक्शन फ्रेंडली नहीं है। गैस चूल्हे की तरह इस पर सामान जल्दी और ज्यादा नहीं बन पाता है। इसलिए हम लोगों ने बड़ी पार्टी का आर्डर लेना बंद कर दिया है लंच और डिनर भी नहीं दे रहे हैं। कैफे चलाने के लिए सिर्फ स्नैक्स के साथ चाय कॉफी और लिक्विड आइटम दे रहे हैं। मगर इस तरह बहुत दिनों तक नहीं चल पाएगा अगर दो-चार दिन में स्थिति सामान्य नहीं हुई तो हमें यह कैफे बंद करना पड़ेगा। इस कैफे से 30 लोग जुड़े हुए हैं जिनके परिवार बच्चों की पढ़ाई सब कुछ चलता है वह सभी लोग बेहद चिंतित हो रहे हैं। कोयले से ही चल रहा काम इदरीस बिरयानी के मालिक अबू बकर का कहना है कि मौजूदा हालात में कोयले ने ही दुकानदारों को जिंदा रखा है। उन्होंने बताया कि अब उनका पूरा काम कोयले पर ही निर्भर हो गया है। गैस सिलेंडर मिलना तो दूर, अब उसके बारे में सोचना भी मुश्किल हो गया है। अबू बकर के मुताबिक उन्हें अपने परिवार के साथ-साथ होटल में काम करने वाले कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी निभानी है। वहीं कई ग्राहक भी होटल के खाने पर निर्भर हैं, क्योंकि उनके घरों में भी गैस सिलेंडर की किल्लत है। इन्हीं को देखते हुए उन्होंने अब कोयले पर ही खाना बनाकर काम जारी रखने का फैसला किया है, ताकि किसी तरह कारोबार और रोजगार दोनों चल सके। ----------------------- ये खबर भी पढ़िए- ग्राउंड रिपोर्ट- ₹1600-3500 में लखनऊ में तुरंत मिल रहे सिलेंडर : युवक बोला- 4 दिन से घर में खाना नहीं बना; बंद हो रहे होटल-रेस्टोरेंट देश में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत के बीच इसके दाम भी आसमान छू रहे हैं। लखनऊ में दिन-दिनभर लाइन में खड़े के रहने पर भी लोगों को सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। लोगों का दावा है कि इन सबके बावजूद 950 रुपए वाला सिलेंडर 1600 रुपए देने पर तुरंत मिल रहा है। कॉमर्शियल सिलेंडर भी 3500 रुपए में आसानी से उपलब्ध है। (पूरी खबर पढ़िए)
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