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    लोलार्क कुंड में स्नान करने से गूंजती है किलकारी:कल देश के कोने-कोने से आएंगे लाखों दंपति, गुप्तकाल से जुड़ा है इतिहास

    4 hours ago

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    वाराणसी के प्राचीन लोलार्क कुंड में 17 सितंबर को लोलार्क षष्ठी का स्नान होगा। संतान प्राप्ति और विशेष रूप से पुत्र रत्न की कामना लेकर देशभर से करीब एक लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। धार्मिक मान्यता है कि लोलार्क षष्ठी के दिन कुंड में स्नान कर लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन-पूजन करने से संतान संबंधी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। काशी के इस प्रसिद्ध कुंड से जुड़ी मान्यताओं के साथ इसका इतिहास और खगोलीय संरचना भी खास है। दैनिक भास्कर की टीम ने बीएचयू के उन प्रोफेसर से बात की, जिन्होंने कुंड में स्नान करने वाले लोगों पर रिसर्च किया। बीएचयू के प्रोफेसर प्रवीण राणा सिंह करीब चार दशक से लोलार्क कुंड की मान्यता और इससे जुड़े पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं। 1995 के एक सर्वे का हवाला देते हुए प्रोफेसर राणा बताते हैं कि कुंड में स्नान करने वाले करीब 60 प्रतिशत लोगों को बाद में संतान सुख मिलने का दावा किया गया था। हालांकि, इस आंकड़े को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से प्रमाणित गर्भधारण की गारंटी नहीं माना जा सकता। लोलार्क कुंड की आस्था, इतिहास और उससे जुड़े शोध की पूरी रिपोर्ट पढ़िए….. 60 प्रतिशत लोगों को संतान सुख मिलने का दावा बीएचयू के प्रोफेसर प्रवीण राणा सिंह ने बताया कि लोलार्क कुंड की मान्यता और इसके वैज्ञानिक तथा खगोलीय संबंधों पर करीब चार दशक से अध्ययन किया जा रहा है। 1995 में किए गए एक सर्वे में दावा किया गया था कि कुंड में स्नान करने वाले करीब 60 प्रतिशत लोगों को बाद में संतान सुख प्राप्त हुआ। हालांकि, यह आंकड़ा धार्मिक परंपरा और किए गए सर्वे से जुड़ा दावा है, इसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा प्रमाणित उपचार या गर्भधारण की गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिर भी इस आंकड़े ने लोलार्क कुंड की प्राचीन मान्यता को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ाई है। प्रोफेसर प्रवीण राणा सिंह बताते हैं कि लोलार्क कुंड की संरचना, सूर्य की किरणों की स्थिति और गंगा जल का यहां विशेष संयोग दिखाई देता है। उनके अध्ययन के अनुसार कुंड की ज्यामिति और इसकी दिशा खगोलीय मानकों से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि धार्मिक आस्था के साथ इसे प्राचीन भारतीय खगोलीय ज्ञान का महत्वपूर्ण उदाहरण भी माना जाता है। उल्टे पिरामिड जैसा है कुंड का आकार लोलार्क कुंड की सबसे खास विशेषता इसकी बनावट है। करीब 50 फीट गहरे और लगभग 15 फीट चौड़े इस कुंड की सीढ़ियां नीचे की ओर जाती हुई उल्टे पिरामिड जैसी आकृति बनाती हैं। तीन दिशाओं से कुंड तक पहुंचने की व्यवस्था बताई जाती है। कुंड एक खड़े कुएं से भी जुड़ा हुआ है। प्रोफेसर राणा के अनुसार, कुंड की संरचना सामान्य जलाशयों से अलग है। इसकी दिशा, गहराई, सीढ़ियों की बनावट और सूर्य की रोशनी के पड़ने का कोण इसे विशेष बनाता है। उनके अध्ययन में लोलार्क षष्ठी के दिन सूर्य की किरणों के कुंड में पहुंचने की स्थिति को विशेष महत्व दिया गया है। उनका कहना है कि कुंड की उत्तरी दिशा खगोलीय उत्तर यानी कॉस्मिक नॉर्थ के अनुरूप बताई जाती है। लोलार्क षष्ठी के समय सूर्य की किरणें कुंड की संरचना के भीतर विशेष कोण से प्रवेश करती हैं। सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए प्रकाश का प्रभाव और कुंड के जल से उसका संपर्क एक विशिष्ट प्राकृतिक स्थिति बनाता है। इसी आधार पर लोलार्क कुंड को प्राचीन भारतीय खगोलीय ज्ञान और धार्मिक परंपरा के मेल का उदाहरण बताया जाता है। हालांकि इन दावों के वैज्ञानिक प्रभावों को लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से स्वतंत्र और व्यापक प्रमाण की आवश्यकता है। गंगा जल और सूर्य को माना गया शक्ति का संयोग लोलार्क कुंड की धार्मिक मान्यता में सूर्य और गंगा दोनों का विशेष स्थान है। काशी में इसे सूर्य उपासना से जुड़े प्रमुख स्थलों में माना जाता है। मान्यता है कि यहां गंगा जल और सूर्य की ऊर्जा का विशेष संयोग होता है। प्रोफेसर राणा के अध्ययन के अनुसार, प्राचीन भारतीय परंपरा में सूर्य को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। लोलार्क कुंड की संरचना इस प्रकार तैयार की गई है कि विशेष अवसर पर सूर्य की किरणें कुंड के भीतर तक पहुंचें। धार्मिक आस्था रखने वाले श्रद्धालु इसे शरीर और मन के लिए शुभ ऊर्जा से जोड़ते हैं। लोलार्क कुंड की चर्चा प्राचीन भारतीय ग्रंथों और काशी के धार्मिक इतिहास में भी मिलती है। प्रोफेसर राणा के अनुसार, शतपथ ब्राह्मण में बारह सौर महीनों से जुड़े बारह आदित्य या सूर्य स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। इसी व्यापक सूर्य उपासना परंपरा से लोलार्क की धार्मिक अवधारणा को जोड़कर देखा जाता है। 1822 में जेम्स प्रिंसेप ने भी किया था उल्लेख लोलार्क कुंड की संतान प्राप्ति से जुड़ी मान्यता नई नहीं है। काशी के इतिहास और पुराने यात्रावृत्तांतों में भी इसका उल्लेख मिलता है। प्रोफेसर राणा के अनुसार, 1822 में ब्रिटिश अधिकारी और काशी के मानचित्रण एवं अध्ययन से जुड़े जेम्स प्रिंसेप ने भी लोलार्क कुंड को गर्भधारण में सहायक माने जाने की स्थानीय मान्यता का उल्लेख किया था। बाद के अध्ययनों में भी लोलार्क को प्रजनन संबंधी धार्मिक परंपराओं यानी 'फर्टिलिटी कल्ट' के संदर्भ में देखा गया। प्रोफेसर राणा और उनकी टीम ने इस विषय पर वर्ष 2009 में शोधपत्र भी प्रकाशित किया था। उनके अनुसार, लोलार्क कुंड सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि काशी के प्राचीन जल प्रबंधन, सूर्य उपासना, वास्तु और खगोलीय ज्ञान को समझने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण स्थल है। गुप्तकाल से जुड़ा बताया जाता है इतिहास लोलार्क कुंड का इतिहास भी बेहद पुराना माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार इसकी मूल संरचना गुप्तकाल यानी करीब चौथी शताब्दी के आसपास विकसित हुई मानी जाती है। बाद में 10वीं शताब्दी में गहड़वाल वंश के राजा गोविंदचंद्र ने इसके आसपास पुनर्निर्माण कराया। समय के साथ लोलार्क कुंड काशी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने लगे। बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने भी कुंड के आसपास निर्माण और सुंदरीकरण कराया। आज लोलार्क कुंड के आसपास पर्यटन की दृष्टि से भी विकास किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश पर्यटन और स्थानीय प्रशासन की ओर से क्षेत्र के सुंदरीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़े कार्य किए जा रहे हैं। तीन डुबकी, फल दान और गीले कपड़े छोड़ने की परंपरा लोलार्क षष्ठी के स्नान को लेकर मंदिर की अपनी धार्मिक परंपराएं हैं। मंदिर के प्रधान पुजारी रमेश कुमार पांडेय के अनुसार, संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपती लोलार्क षष्ठी के दिन कुंड में तीन बार डुबकी लगाते हैं। स्नान के बाद दंपती की ओर से कुंड में एक फल अर्पित करने की परंपरा है। इसके साथ ही भीगे हुए कपड़े वहीं छोड़ने की भी मान्यता बताई जाती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यह पुराने कष्टों और बाधाओं को पीछे छोड़कर नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। कुंड में स्नान के बाद श्रद्धालु लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन और पूजन करते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होती है।
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