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    महोबा में कुम्हारों का पुश्तैनी काम संकट में:फ्रिज-फिल्टर से घटी मांग, मेहनत का नहीं मिल रहा दाम

    2 hours ago

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    महोबा में सदियों पुराना मिट्टी के बर्तन बनाने का शिल्प आधुनिकता के कारण संकट में है। भटीपुरा और शेखूनगर के प्रजापति समाज के लोग आज भी चाक पर मेहनत कर रहे हैं, लेकिन फ्रिज और वाटर फिल्टर की बढ़ती लोकप्रियता ने उनके पुश्तैनी काम को प्रभावित किया है। उन्हें अपनी मेहनत के अनुपात में मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। कल्लू प्रजापति, जो पिछले 20 सालों से इस पेशे में हैं, अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ मिट्टी के मटके बनाते हैं। उनका परिवार 15 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद लगभग 50 मटके तैयार कर पाता है। हालांकि, इन मटकों को बेचने के बाद मिलने वाला मुनाफा उनकी मेहनत के मुकाबले बहुत कम होता है। कल्लू बताते हैं कि फिल्टर प्लांट और ठंडे पानी के थरमस आने के बाद से मटकों की मांग आधे से भी कम रह गई है। 40 साल से इस पेशे में लगे हीरालाल की स्थिति भी ऐसी ही है। हीरालाल के अनुसार, पहले मटकों की इतनी मांग होती थी कि आपूर्ति करना मुश्किल हो जाता था। अब स्थिति यह है कि मटके बिक नहीं पाते और रखे रह जाते हैं। हीरालाल यह भी कहते हैं कि फ्रिज का पानी भले ही ठंडा हो, लेकिन वह सेहत के लिए हानिकारक है, जबकि मटके का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है और गले को नुकसान नहीं पहुंचाता। संघर्ष की ये कहानी आरती की भी है। आरती के मुताबिक पूरा घर इस काम में लगा रहता है। मिट्टी दूर से लाना, उसे फुलाना, भूसा मिलाना और फिर भट्ठे में पकाना यह प्रक्रिया जितनी जटिल है, मुनाफा उतना ही कम। 15-20 दिनों की मेहनत के बाद अगर एक हजार रुपये भी बच जाएं, तो उसे ये लोग बड़ी बात मानते हैं। इसी छोटी सी रकम से बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च जुड़ा है। गोपी जैसे कारीगरों का कहना है कि यह केवल व्यापार नहीं, एक साधना है। ग्राहक प्रीतम जैसे लोग आज भी मटके की अहमियत समझते हैं और 60 रुपये में एक मटका खरीदकर खुश हैं, लेकिन ऐसे कद्रदानों की संख्या घटती जा रही है।
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