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    महंगा होगा कैंसर का इलाज, दवाएं नहीं मिल रहीं:जंग के कारण शॉर्टेज, देशभर में कमी;फेफड़ों, मुंह, सर्वाइकल और यूटेरस कैंसर के इलाज में जरूरी

    12 hours ago

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    पेट्रोल-डीजल और क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों से जुड़ी खबरें इन दिनों लगातार सुर्खियों में हैं, लेकिन अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा। इसने भारत में कैंसर के इलाज को भी मुश्किल बना दिया है। स्थिति ऐसी है कि कैंसर के 7 प्रमुख प्रकारों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं की कमी से हर 100 में से करीब 70 मरीज प्रभावित हो सकते हैं। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरपर्सन डॉ. श्याम अग्रवाल के अनुसार, पूरे देश में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावी दवाओं सिस्प्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) की पिछले दो से तीन सप्ताह से भारी कमी बनी हुई है। ये दोनों दवाएं कैंसर के इलाज की फर्स्ट लाइन थेरेपी का हिस्सा हैं और फेफड़ों के कैंसर, मुंह के कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, गर्भाशय कैंसर, ओवरी कैंसर, टेस्टिकुलर कैंसर समेत कई अन्य कैंसर के उपचार में व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं। आखिर इन जीवनरक्षक दवाओं की कमी क्यों हो रही है? क्या इसका संबंध वैश्विक तनाव और सप्लाई चेन से है? मरीजों के इलाज पर इसका कितना असर पड़ सकता है? और भविष्य में इस संकट से कैसे निपटा जा सकता है? इस खबर में भोपाल से लेकर दिल्ली और मुंबई तक के विशेषज्ञों ने इन सभी सवालों के जवाब दिए हैं और स्थिति के हर पहलू को विस्तार से समझाया है। भास्कर एक्सपर्ट पैनल में ये रहे शामिल बिना इलाज लौट रहे कैंसर रोगी जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. हरमीत कौर बताती हैं, दवाओं की उपलब्धता नहीं होने की वजह से हर दूसरा मरीज प्रभावित है। कई मरीजों का इलाज तक अधूरा रह रहा है। जबकि, कुछ को बिना इलाज ही वापस भेजना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर चाहकर भी मरीजों को पूरा और मानक इलाज नहीं दे पा रहे हैं, जिससे इलाज की निरंतरता और परिणाम दोनों प्रभावित हो सकते हैं। भोपाल के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. टी.पी. साहू ने चिंता जताते हुए कहा, यह बेहद टफ टाइम्स हैं। अब सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी ही नहीं, बल्कि लाइफ सेविंग कीमोथेरेपी दवाओं तक पर इसका असर पड़ने लगा है। मैं एक ऑन्कोलॉजिस्ट के तौर पर चिंतित हूं कि मैं अपने मरीजों को वैसा इलाज नहीं दे पा रहा, जैसा देना चाहता हूं। अभी एक-डेढ़ महीने हम किसी तरह कर पाए, लेकिन आगे क्या होगा, पता नहीं। अब डॉक्टरों का इलाज के तरीकों में बदलाव पर फोकस मुंबई स्थित कामा और एल्ब्लेस अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. तुषार पाल्वे ने बताया कि प्लैटिनम-बेस्ड कीमोथेरेपी दवाओं की भारी कमी से कैंसर के मरीजों के इलाज पर असर पड़ रहा है। सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लैटिन और ऑक्सालिप्लैटिन जैसी जरूरी दवाओं की सप्लाई में रुकावट के कारण डॉक्टरों को इलाज के स्टैंडर्ड तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों पर भी इस कमी का असर पड़ा है। हालांकि, प्लैटिनम वाली दवाओं की कमी तो है, लेकिन दूसरी कीमोथेरेपी दवाएं मिल रही हैं। इसलिए, भले ही सभी इलाज पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं, लेकिन इससे कुछ खास मरीजों के इलाज पर असर पड़ रहा है। घरेलू दवा कंपनियों को भी इन दवाओं की सप्लाई बढ़ानी चाहिए, ताकि कमी खत्म हो और मरीजों के इलाज में आने वाली रुकावटें कम हों। दवाओं के दाम में 50% तक वृद्धि की संभावना केंद्र सरकार ने कैंसर के इलाज में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली दो महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाओं सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमत बढ़ाने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। देशभर में इन दवाओं की कमी और बढ़ती उत्पादन लागत को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। जल्द ही इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी हो सकती है। फार्मा कंपनियों की मांग और उत्पादन लागत के आकलन के बाद सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। रिपोर्टों के अनुसार सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में 10% से 50% तक वृद्धि की जा सकती है, ताकि इनकी उपलब्धता बनी रहे और उत्पादन फिर से सामान्य हो सके। दरअसल, युद्ध और सप्लाई बाधाओं के कारण प्लैटिनम-बेस्ड कीमो दवाओं की सप्लाई में लगभग 50% तक कमी आने का अनुमान है। इसका असर सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लैटिन और ऑक्सालिप्लैटिन जैसी दवाओं की उपलब्धता और कीमतों पर देखने को मिल रहा है। 30 साल से सबसे सस्ती और भरोसेमंद दवा है सिस्प्लैटिन भोपाल के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. टी.पी. साहू के अनुसार, रेडियोथेरेपी के साथ इलाज का असर बढ़ाने के लिए सिस्प्लैटिन पिछले 20-30 साल से सबसे भरोसेमंद दवा मानी जाती है। इसका उपयोग लंबे समय से स्थापित इलाज पद्धति का हिस्सा रहा है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि सिस्प्लैटिन जैसी दवा जहां हजारों रुपए में इलाज पूरा कर देती है, वहीं इसका विकल्प इम्यूनोथेरेपी लाखों रुपए तक पहुंच जाता है, जो आम मरीजों की पहुंच से बाहर है। इस कारण मध्यम और निम्न आय वर्ग के मरीजों के लिए यह दवा बेहद अहम मानी जाती है। अब इसके रेट में भी वृद्धि होने जा रही है। देश के 70% तक कीमोथेरेपी में उपयोग भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ओ.पी. सिंह के अनुसार, करीब 70% कीमोथेरेपी रेजिमेंस में सिस्प्लैटिन का उपयोग होता है। ऐसे में इसकी कमी सीधे तौर पर बड़े स्तर पर मरीजों को प्रभावित कर रही है। इसका मतलब यह है कि हर दस में से लगभग सात मरीजों के इलाज में यह दवा किसी न किसी रूप में शामिल रहती है, जिससे इसकी उपलब्धता पूरे कैंसर उपचार तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। कई प्रमुख कैंसर के इलाज की 'बैकबोन' सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन को दुनिया भर में कीमोथेरेपी की सबसे महत्वपूर्ण दवाओं में माना जाता है। इनका उपयोग फेफड़ों, मुंह, सर्वाइकल, ओवरी, स्तन, अंडकोष, गॉलब्लैडर समेत कई प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है। ऑन्कोलॉजिस्ट इन्हें कई कैंसरों की फर्स्ट-लाइन थेरेपी का प्रमुख हिस्सा मानते हैं। ये दोनों दवाएं राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) और डीपीसीओ के तहत मूल्य नियंत्रण में हैं। कच्चे माल की कीमत बढ़ने के बावजूद कंपनियां दवाओं के दाम नहीं बढ़ा पा रही थीं। उद्योग का कहना है कि उत्पादन लागत और निर्धारित बिक्री मूल्य के बीच बड़ा अंतर आ गया, जिसके कारण कई कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया या बंद कर दिया। देश के 70% तक कीमोथेरेपी में उपयोग गांधी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ओपी सिंह के अनुसार, करीब 70% कीमोथेरेपी रेजिमेंस में सिस्प्लैटिन का उपयोग होता है। ऐसे में इसकी कमी सीधे तौर पर बड़े स्तर पर मरीजों को प्रभावित कर रही है। इसका मतलब यह है कि हर दस में से लगभग सात मरीजों के इलाज में यह दवा किसी न किसी रूप में शामिल रहती है, जिससे इसकी उपलब्धता पूरे कैंसर उपचार तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ये खबर भी पढ़ें… एक ही ऑपरेशन में दो कैंसर का इलाज राजधानी के एम्स भोपाल ने जटिल कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यहां 52 वर्षीय मरीज के शरीर में एक साथ पनपे दो अलग-अलग प्राथमिक कैंसर का एक ही ऑपरेशन में सफल इलाज कर डॉक्टरों ने नई मिसाल कायम की है। यह मामला चिकित्सा विज्ञान में बेहद दुर्लभ माना जाता है।पूरी खबर पढ़ें
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