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    इलॉन मस्क की न्यूरालिंक से आगे निकला चीन:दुनिया की पहली कॉमर्शियल ब्रेन चिप 'NEO' को मंजूरी मिली; क्लिनिकल ट्रायल सफल

    2 hours ago

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    चीन ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) टेक्नोलॉजी को कॉमर्शियल बनाने की रेस में इलॉन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक को पीछे छोड़ दिया है। चीन ने सफल क्लिनिकल ट्रायल के बाद दुनिया की पहली कॉमर्शियल इस्तेमाल वाली ब्रेन चिप 'NEO' को मंजूरी दे दी है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सिक्के के आकार का यह इम्प्लांट कॉमर्शियल इस्तेमाल के लिए क्लिनिकल टेस्टिंग पास करने वाला दुनिया का पहला सर्जिकली इम्प्लांटेड BCI डिवाइस बन गया है। बीजिंग की सिंहुआ यूनिवर्सिटी और न्यूराकल टेक्नोलॉजी ने डेवलप किया इस आधुनिक डिवाइस को बीजिंग की सिंहुआ यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स और शंघाई स्थित न्यूराकल टेक्नोलॉजी ने मिलकर तैयार किया है। रेगुलेटरी मंजूरी मिलने के बाद अब इस बात की पूरी उम्मीद है कि इस डिवाइस को चीन के सरकारी हेल्थकेयर सिस्टम के लिए बड़े पैमाने पर बनाया जाएगा। पहले फेज में लकवाग्रस्त मरीजों को मदद मिलेगी NEO चिप का पहला वर्जन मुख्य रूप से उन मरीजों की मदद के लिए तैयार किया गया है जो रीढ़ की हड्डी की चोट (स्पाइनल कॉर्ड इंजरी) और पैरालिसिस (लकवा) से जूझ रहे हैं। यह डिवाइस ऐसे मरीजों को उनके नर्वस सिस्टम के कुछ हिस्सों पर फिर से नियंत्रण हासिल करने में मदद करेगा। हालांकि, रिसर्चर्स, टेक कंपनियां और इन्वेस्टर्स इस टेक्नोलॉजी को इंसानों और मशीनों के बीच बातचीत के एक बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं। इलॉन मस्क की न्यूरालिंक को मंजूरी का इंतजार यह डेवलपमेंट ऐसे समय में सामने आया है जब इलॉन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक अमेरिका में इंसानों पर ट्रायल तो कर रही है, लेकिन उसे अभी तक कॉमर्शियल उपयोग के लिए रेगुलेटरी अप्रूवल नहीं मिला है। मस्क ने हाल ही में इजराइल में एक इवेंट के दौरान वीडियो लिंक के जरिए बात करते हुए अपनी तकनीक को 'जीसस-लेवल टेक्नोलॉजी' कहा था। मस्क का मानना है कि लकवाग्रस्त लोगों को कंट्रोल वापस देना और आंखों की रोशनी लौटाना बहुत बड़ी बात है। न्यूरालिंक का दावा है कि उसके इम्प्लांट से लोग सिर्फ सोचकर टाइप कर सकेंगे और कंप्यूटर कर्सर चला सकेंगे। न्यूरालिंक से कैसे अलग है चीन का NEO इम्प्लांट एनालिस्ट्स का मानना है कि चीन के तेजी से आगे निकलने की बड़ी वजह NEO इम्प्लांट का खास डिजाइन है। जहां न्यूरालिंक के N1 डिवाइस को दिमाग के सेरेब्रल कॉर्टेक्स के अंदर तक इलेक्ट्रोड्स डालने की जरूरत होती है। वहीं चीन का NEO डिवाइस खोपड़ी (स्कल) और दिमाग के बीच में बैठता है। इसमें आठ सेंसर्स को दिमाग की सुरक्षात्मक बाहरी झिल्ली (ड्यूरा मैटर) के ऊपर रखा जाता है, जिससे सर्जरी में चीर-फाड़ बहुत कम होती है। यह इम्प्लांट दिमाग के सिग्नल्स को पकड़कर पास के कंप्यूटर में भेजता है, जहां वे डिजिटल कमांड में बदल जाते हैं। 36 मरीजों पर सफल टेस्टिंग, गंभीर बीमारियों में फायदेमंद रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक 36 मरीजों पर इस डिवाइस का टेस्ट किया जा चुका है, जिसके बेहद पॉजिटिव रिजल्ट्स मिले हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कम चीर-फाड़ वाले इस तरीके से मेडिकल रिस्क काफी कम हो जाते हैं। यह टेक्नोलॉजी पैरालिसिस के अलावा पार्किंसंस, मिर्गी (एपिलेप्सी), स्ट्रोक और डिप्रेशन जैसी दिमागी और नर्व यानी तंत्रिका संबंधी बीमारियों से पीड़ित लाखों लोगों के जीवन में सुधार कर सकती है। प्राइवेसी और हैकिंग का खतरा भी बढ़ा सकारात्मक पहलुओं के बीच इस तकनीक ने सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर गंभीर चिंताएं भी पैदा कर दी हैं। ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट डॉ. डेविड टफले का कहना है कि ये डिवाइस जितने मददगार हैं, उतने ही जोखिम भरे भी हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि थ्योरिटिकली हैकर्स इन डिवाइस के जरिए मरीज के संवेदनशील न्यूरल डेटा जैसे कि उनके विचारों और यादों तक पहुंच सकते हैं। इतना ही नहीं हैकिंग के जरिए मरीज की एकाग्रता को प्रभावित किया जा सकता है या उनके चलने-फिरने के सिग्नल्स को भी मैनिपुलेट किया जा सकता है। न्यूरालिंक के ट्रायल में शामिल मरीज ने साझा किया था अनुभव दूसरी तरफ न्यूरालिंक का N1 इम्प्लांट फिलहाल 9 मरीजों पर टेस्ट किया जा रहा है। इस ट्रायल का हिस्सा बनीं ऑड्रे क्रूज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपना अनुभव साझा करते हुए लिखा था कि मैंने 20 साल में पहली बार अपना नाम लिखने की कोशिश की है, मैं इस पर काम कर रही हूं। यह जानकर गर्व होता है कि मेरी यात्रा न्यूरालिंक को इस तकनीक को बेहतर बनाने में मदद कर रही है, जिससे एक दिन लाखों लोग अपने दिमाग से डिवाइसेज को कंट्रोल कर सकेंगे। न्यूरालिंक को 2023 में मिली थी ह्यूमन ट्रायल के लिए मंजूरी सितंबर 2023 में मस्क की ब्रेन-चिप कंपनी न्यूरालिंक को अपने पहले ह्यूमन ट्रायल के लिए इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूशनल रिव्यू बोर्ड से रिक्रूटमेंट की मंजूरी मिली थी। मंजूरी के बाद से ही न्यूरालिंक ह्यूमन ट्रायल के लिए लोगों की भर्ती कर उन पर इस डिवाइस का ट्रायल किया जा रहा है। न्यूरालिंक के मुताबिक, ट्रायल उन लोगों पर किया जा रहा है, जिन लोगों को सर्वाइकल स्पाइनल कॉर्ड में चोट या एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) के कारण क्वाड्रिप्लेजिया है। स्टडी को पूरा होने में करीब 6 साल लगेंगे। इस दौरान पार्टिसिपेंट को लैब तक आने-जाने का ट्रैवल एक्सपेंस दिया जा रहा है। ट्रायल के जरिए कंपनी यह देखना चाहती है कि ये डिवाइस मरीजों पर कैसे काम कर रही है। मई 2024 में कंपनी को ट्रायल के लिए यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से मंजूरी मिली थी। न्यूरालिंक डिवाइस क्या है? 1. फोन को सीधे ब्रेन से जोड़ेगा न्यूरालिंक ने सिक्के के आकार का एक डिवाइस बनाया है जिसे "लिंक" नाम दिया गया है। ये डिवाइस कंप्यूटर, मोबाइल फोन या किसी अन्य उपकरण को ब्रेन एक्टिविटी (न्यूरल इम्पल्स) से सीधे कंट्रोल करने में सक्षम करता है। उदाहरण के लिए, पैरालिसिस से पीड़ित व्यक्ति मस्तिष्क में चिप के प्रत्यारोपित होने के बाद केवल यह सोचकर माउस का कर्सर मूव कर सकेंगे कि वे इसे कैसे मूव करना चाहते हैं। 2. कॉस्मैटिक रूप से अदृश्य चिप न्यूरालिंक ने कहा, हम पूरी तरह से इम्प्लांटेबल, कॉस्मैटिक रूप से अदृश्य ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस डिजाइन कर रहे हैं, ताकि आप कहीं भी जाने पर कंप्यूटर या मोबाइल डिवाइस को कंट्रोल कर सकें। माइक्रोन-स्केल थ्रेड्स को ब्रेन के उन क्षेत्रों में डाला जाएगा जो मूवमेंट को कंट्रोल करते हैं। हर एक थ्रेड में कई इलेक्ट्रोड होते हैं जो उन्हें "लिंक" नामक इम्प्लांट से जोड़ते हैं। 3. रोबोटिक प्रणाली डिजाइन की कंपनी ने बताया कि लिंक पर थ्रेड इतने महीन और लचीले होते हैं कि उन्हें मानव हाथ से नहीं डाला जा सकता। इसके लिए कंपनी ने एक रोबोटिक प्रणाली डिजाइन की है जिससे थ्रेड को मजबूती और कुशलता से इम्प्लांट किया जा सकता है। इसके साथ ही न्यूरालिंक ऐप भी डिजाइन किया गया है ताकि ब्रेन एक्टिविटी से सीधे अपने कीबोर्ड और माउस को बस इसके बारे में सोच कर कंट्रोल किया जा सके। डिवाइस को चार्ज करने की भी जरूरत होगी। इसके लिए कॉम्पैक्ट इंडक्टिव चार्जर भी डिजाइन किया गया है जो बैटरी को बाहर से चार्ज करने के लिए वायरलेस तरीके से इम्प्लांट से जुड़ता है। मस्क ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस टेक्नोलॉजी से बनाई चिप इलॉन मस्क ने जिस टेक्नोलॉजी के जरिए चिप बनाई है उसे ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस या शॉर्ट में BCIs कहा जाता है। इस पर कई और कंपनियां भी सालों से काम कर रही हैं। ये सिस्टम ब्रेन में रखे गए छोटे इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल पास के न्यूरॉन्स से संकेतों को "पढ़ने" के लिए करता है। इसके बाद सॉफ्टवेयर इन सिग्नल्स को कमांड या एक्शन में डिकोड करता है, जैसे कि कर्सर या रोबोटिक आर्म को हिलाना। क्या होती है ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) टेक्नोलॉजी? ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस एक ऐसी तकनीक है जो इंसान के दिमाग और बाहरी डिवाइसेज (जैसे कंप्यूटर, रोबोटिक आर्म या व्हीलचेयर) के बीच एक सीधा कम्युनिकेशन रास्ता बनाती है। जब हम कुछ सोचते हैं, तो दिमाग में इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स पैदा होते हैं। BCI डिवाइस इन सिग्नल्स को पढ़कर डिजिटल कमांड में बदल देता है, जिससे मरीज बिना हाथ-पैर हिलाए केवल सोचकर कंप्यूटर या मशीन को ऑपरेट कर सकता है।
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