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    मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान तय करेगा केस की दिशा:न्यूरोसर्जन पर छेड़छाड़ केस, जानकार बोले- मेडिकल रिपोर्ट का खास प्रभाव नहीं

    8 hours ago

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    प्रयागराज में न्यूरो सर्जन डॉ. कार्तिकेय शर्मा पर दर्ज छेड़खानी के केस की दिशा अब मजिस्ट्रेट के समक्ष छात्रा का बयान तय करेगा। जानकारों का कहना है कि अभी जिन धाराओं में केस दर्ज हुआ है, वह सात साल तक की सजा वाले हैं, ऐसे में फिलहाल पुलिस के पास गिरफ्तारी का कोई आधार नहीं है। अब मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान के बाद ही आगे कार्रवाई होगी। विस्तार से समझिए शहर भर में चर्चा का विषय बने इस मामले में आगे की कार्रवाई को हमने विस्तार से समझने के लिए हमने कानून के जानकारों से बात की। इसके बाद जो तथ्य निकलकर सामने आए, उनसे यही बात सामने आई कि केस की दिशा बीएनएसएस 183(सीआरपीसी 164) के तहत पीड़िता के बयान पर तय होगा। कौन-कौन सी धाराएं लगीं BNS 74- महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग। दोषी पाए जाने पर कम से कम एक साल और अधिकतम पांच साल की सजा। BNS 76- किसी महिला को निर्वस्त्र करने या नग्न होने के लिए मजबूर करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग। दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 3 वर्ष का सश्रम कारावास, जो 7 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना। BNS 127(2)- किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध एक निश्चित सीमा से बाहर जाने से रोकना। दोषी पाए जाने पर1 वर्ष तक का कारावास + 5000 रुपये जुर्माना। आगे क्या होगा सीनियर क्रिमिनल लॉयर विक्रम सिन्हा बताते हैं, FIR दर्ज होने के बाद अब इस मामले में पुलिस पहले पीड़िता का बयान दर्ज करेगी। हालांकि इसका कोई खास महत्व नहीं। इसके बाद उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान के लिए ले जाया जाएगा। यहां पीड़िता जो बयान देगी, वही इस केस की दिशा तय करेगा। अगर उसके बयान से किसी अन्य अपराध का कारित होना पाया जाता है तो पुलिस मामले में संबंधित धाराएं बढ़ाएगी। अगर बयान में तहरीर के उलट कोई अन्य बात आती है, तो उसी के अनुरूप आगे कार्रवाई होगी। मेडिकल परीक्षण रिपोर्ट का कोई खास प्रभाव नहीं शासकीय अधिवक्ता गैंगस्टर कोर्ट गुलाब चंद्र अग्रहरि कहते हैं, ऐसे मामलों में मेडिकल रिपोर्ट का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। पीड़िता मजिस्ट्रेट के समक्ष जो बयान देगी, वही आगे की कार्रवाई का आधार बनेगा। फिलहाल जिन धाराओं में मुकदमा लिखा गया है, वह सात साल तक की सजा वाली हैं, ऐसे में गिरफ्तारी का कोई आधार नहीं बनता। अपराध संज्ञेय लेकिन गिरफ्तारी जरूरी नहीं हाईकोर्ट के सीनियर क्रिमिनल लॉयर रजनीश प्रताप सिंह ने बताया, केस में जो धाराएं अभी लगी हैं, उनसे संबंधित सभी अपराध संज्ञेय हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि सात साल से कम की सजा में जब तक जरूरी न हो, गिरफ्तारी न की जाए। ऐसे में पुलिस आगे की कार्रवाई के लिए पीड़िता के कोर्ट में बयान दर्ज होने तक इंतजार करेगी। बयान के बाद दो कंडीशन बन सकती हैं। धाराएं वही रहीं तो बीएनएसएस की धारा 35 के तहत नोटिस तामील कराकर छोड़ा जाएगा, धाराएं बढ़ी तो गिरफ्तारी भी की जा सकती है।
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