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    मिर्जापुर का खंडहर स्कूल अब कॉन्वेंट को दे रहा टक्कर:पहले 50 से कम बच्चे, अब AI-कंप्यूटर की पढ़ाई; प्रिंसिपल बोलीं- मां-बाप को भरोसा दिलाया

    5 hours ago

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    स्मार्ट क्लासरूम में डिजिटल स्क्रीन पर बच्चे समझ रहे कि AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काम कैसे करता है? कंप्यूटर के सामने बैठे बच्चों के कानों पर हेडफोन और मुंह पर माइक। क्लास की दीवारों पर सिलेबस को समझाने वाली पेंटिंग। बाहर कैंपस में हर तरफ हरियाली। ये सीन किसी हाईक्लास प्राइवेट स्कूल का नहीं है। हम बात कर रहे हैं मिर्जापुर के पीएम श्री कंपोजिट स्कूल की। हर दिन स्कूल में 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं। इस स्कूल में पढ़ाई का जो माहौल आज दिख रहा है, वैसा 2016 से पहले नहीं था। तब बिल्डिंग खंडहर थी, कमरे में बच्चों के लिए बैठने की जगह तक नहीं थी। बाउंड्रीवॉल नहीं होने से शाम होते ही ये जगह शराबियों का अड्‌डा बन जाती। धीरे-धीरे अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजने से डरने लगे। तब स्कूल की प्रिंसिपल बनीं मधुरिमा तिवारी। स्कूल को स्मार्ट बनाने के लिए उन्होंने अधिकारियों से मदद ली। घर-घर जाकर अभिभावकों को अच्छी पढ़ाई और माहौल का भरोसा दिलाया। फिर जो कहा, वो करके भी दिखाया। अब ये स्कूल मिर्जापुर के कॉन्वेंट स्कूलों को टक्कर दे रहा है। मधुरिमा को 2025 में राष्ट्रपति अवार्ड मिला। ये अवॉर्ड यूपी के दो ही शिक्षकों को मिला था, पहली मधुरिमा, दूसरे भदोही के रामलाल यादव थे। आज शिक्षक दिवस पर इस स्कूल के बदलने की कहानी को सिलसिलेवार पढ़िए… जमीन टूटी, बाउंड्री नहीं, बच्चे टाट पट्‌टी पर बैठते थे स्कूल के बदलाव की कहानी प्रिंसिपल मधुरिमा तिवारी सुनाती हैं- ये बात 2009 की है। मुझे सहायक अध्यापक की नौकरी मिली थी। पहली पोस्टिंग मिर्जापुर के मड़िहान इलाके के प्राइमरी स्कूल में हुई थी। 2 साल बाद मेरा ट्रांसफर शहर के इस स्कूल में हो गया। उस वक्त स्कूल की स्थिति क्या थी? इसके जवाब में मधुरिमा कहती हैं- ये स्कूल दो अलग-अलग कैंपस में चलता था। एक तरफ प्राइमरी और दूसरी तरफ अपर प्राइमरी स्कूल था। यहां कोई बाउंड्री नहीं बनी थी। स्कूल के अंदर बच्चे जमीन पर टाट की पट्टी बिछाकर बैठते थे। स्कूल की जमीन भी खराब थी। 2 से 3 साल के अंदर मैंने महसूस किया कि बच्चे पढ़ने के लिए नहीं आ रहे हैं। नए एडमिशन के लिए भी अभिभावक नहीं आ रहे हैं। इस वक्त तक स्कूल में 50 से भी कम बच्चे रह गए। स्कूल नहीं आने वाले बच्चों के घर जाने पर हमें पता चला कि अभिभावक स्कूल में व्यवस्थाएं नहीं होने से नाराज हैं। कई अभिभावकों ने हमसे कहा कि आपके स्कूल में क्यों भेजे, जब वहां बारिश में पानी भर जाता है, बैठने की कोई व्यवस्था नहीं है। क्या पढ़ाते होंगे आप लोग? सांसद-विधायक से मिले, अफसरों से ग्रांट मंजूर कराई, तब सही हुई बिल्डिंग मधुरिमा कहती हैं- 2016 में हम सांसद-विधायक से मिले। अधिकारियों के सामने जर्जर भवन की तस्वीरें रखी। ग्रांट सेंक्शन होने के बाद बिल्डिंग ठीक करवाई गई। सबसे पहले हमने प्राइमरी और अपर प्राइमरी, दोनों स्कूल एक ही कैंपस में किए। फिर 1 साल बाद मैं यहां की प्रिंसिपल बन गई। अब हम नई बिल्डिंग और क्लासरूम की तस्वीरें लेकर अभिभावकों के पास जाने लगे। उनसे बच्चों को दोबारा हमारे स्कूल भेजने की दरख्वास्त की। पहले ही साल में इसका असर दिखा। बच्चों की संख्या 56 से बढ़कर 132 तक पहुंच गई। यह हम लोगों के लिए एक उपलब्धि जैसा था। हमने कोशिशें जारी रखीं, हर क्लास में प्रोजेक्टर लगाए, स्कूल में हरियाली बढ़ाई। 2018 में पहला सम्मान, फिर पढ़ाने के तरीकों पर प्रयोग किए 2018 में मिर्जापुर के BSA प्रवीण तिवारी स्कूल पहुंचे। क्लास और कैंपस को देखकर उन्होंने तारीफ की। प्रशस्तिपत्र भी दिया। यह स्कूल और उसकी प्रिंसिपल के लिए पहला सम्मान था। मधुरिमा कहती हैं- इस सम्मान के बाद महसूस हुआ कि स्कूल को और बेहतर बनाना है। मेरी साथी टीचर्स ने बच्चों को पढ़ाने के नए-नए तरीकों पर काम करना शुरू किया। हर टॉपिक को रोचक तरीके से समझने, ज्यादा से ज्यादा सिलेबस को स्क्रीन पर दिखाकर समझाने की कोशिश करने लगे। बच्चों को अपने खर्च पर आईडी कार्ड देने लगे स्कूल में बच्चे साफ ड्रेस, जूते-टाई और आईडी कार्ड के साथ दिख रहे थे। इस पर मधुरिमा कहती हैं- हमारे स्कूल के आसपास कई प्राइवेट स्कूल हैं। सरकारी स्कूलों में फीस नहीं लगती, बच्चों में सरकारी और प्राइवेट स्कूल को लेकर कोई हीनभावना न पनपे, इसलिए उन्हें ड्रेस कोड में आने को कहा जाता है। कई चीजें सरकार की तरफ से नहीं मिलती हैं, उन्हें मैं और मेरा स्टाफ अरेंज करके बच्चों को देते हैं। बेटे-बेटी से सीखकर यहां बच्चों को कंप्यूटर पढ़ाती हूं… इस स्कूल में कंप्यूटर लैब है। मॉडर्न लाइब्रेरी है। बच्चों के लिए स्मार्ट क्लास है। कंप्यूटर सिस्टम लगाए गए हैं। अब सवाल आता है कि इन चीजों के बारे में बच्चों को कैसे पढ़ाया जा रहा? मधुरिमा कहती हैं- हमने बीएससी की, फिर बीएड-बीटीसी किया। यह सही बात है कि कंप्यूटर पढ़ने का वक्त नहीं मिला। लेकिन घर में एक बेटा और बेटी हैं, उनके जरिए मैंने कई चीजें सीख ली। इसके अलावा विभाग अलग-अलग समय पर हम लोगों को ट्रेनिंग देता है, उसी के जरिए यहां हम बच्चों को सिखाते हैं। ‘प्राइवेट स्कूल से नाम कटाकर यहां आने लगे अभिभावक’ इस वक्त मधुरिमा के स्कूल में कुल 221 बच्चों का नामांकन है। हमने पूछा कि अब तो लोग प्राइवेट स्कूल से नाम कटवाकर यहां आते होंगे? मधुरिमा कहती हैं- एक अभिभावक आए और कहा कि नाम लिख लीजिए। हमने नाम लिखा, लेकिन पता चला कि उन्होंने 2 महीने पहले ही प्राइवेट स्कूल में यूकेजी में एडमिशन करवाया है। हमने कहा कि आप वहां जाकर इनका नाम कटवा दीजिए, तभी यहां यू-डायस पर नाम दर्ज हो पाएगा। वह गए तो स्कूल वाले नाम ही नहीं काट रहे थे, हमने अधिकारियों की मदद ली। इसके बाद उस गरीब अभिभावक से स्कूल वालों ने 1600 रुपए लिए। जब ये बात मुझे पता चली, तो बहुत दुख हुआ। अब छात्र-छात्राओं की बात कंप्यूटर लैब में पढ़ाई कर रही छात्रा खुशी से हमने पूछा कि आसपास के लोग यह नहीं पूछते कि सरकारी स्कूल में क्यों पढ़ती हो? खुशी कहती है- जब लोग हमसे कहते हैं, तो हम उन्हें बताते हैं कि हमारे स्कूल में तुम्हारे स्कूल से कहीं ज्यादा पढ़ाई होती है। हमारा स्कूल प्राइवेट स्कूल से भी अच्छा है। यहां भी वही सब है, जो उनके महंगे स्कूलों में है। बातचीत में हमें पता चला कि खुशी के पिता कारपेंटर हैं, उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह अपनी बच्ची को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा सकें। 'यहां सुविधाएं प्राइवेट स्कूलों से कम नहीं हैं' कंप्यूटर लैब में बैठी 8वीं की छात्रा साम्या कहती हैं- मैं पहली क्लास से पढ़ रही हूं, मेरे पापा कारपेंटर हैं, मां घर पर ही रहती हैं, यहां हमें कोई फीस नहीं देनी होती है। हमारा स्कूल बहुत अच्छा है। डिजिटल क्लास, डिजिटल लाइब्रेरी है। कई चीजें जब समझ नहीं आती तो हम मैम से पूछ लेते हैं। मैम सब समझा देती हैं। ऑनलाइन क्लास में पढ़ाई कर रही 8वीं की बच्ची तमन्ना कहती हैं- मेरे पापा सिलाई मास्टर हैं। परिवार की ऐसी स्थिति नहीं कि हमें प्राइवेट स्कूल में पढ़ा पाए, इसलिए मैं यहीं पढ़ती हूं। यहां सुविधाएं किसी प्राइवेट स्कूल से कम नहीं है। सब कुछ बहुत अच्छा है। हम तो मैम से कह रहे हैं कि इस स्कूल को और आगे बढ़वा दीजिए, वरना 9वीं के लिए आर्य कन्या विद्या मंदिर में जाकर पढ़ना होगा। स्कूल में बच्चों और स्टाफ के साथ बातचीत करने के बाद समझ आया कि फिलहाल यह स्कूल अब मॉडल स्कूल जैसा हो गया है। हर वह सुविधा इस स्कूल में मौजूद है, जो पढ़ाने के लिए होनी चाहिए। दिक्कत सिर्फ स्टाफ की कमी की है। मधुरिमा के अलावा एक सहायक टीचर और एक शिक्षा मित्र हैं। यानी तीन लोग यह स्कूल संभाल रहे हैं। यहां और स्टाफ की जरूरत है, ताकि बच्चों को और बेहतर ढंग से पढ़ाया-सिखाया जा सके। ----------------- ये पढ़ें - UP में चुनाव से पहले 70 हजार नई नौकरियां: 1 लाख युवाओं को मिलेगा जॉइनिंग लेटर, जेन-जी को अपने पक्ष में करने की कोशिश में सरकार 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार करीब 70 हजार नई भर्तियां निकालने की तैयारी में है। इनका विज्ञापन कभी भी जारी हो सकता है। वहीं, सरकार ने अगले 4 महीनों में 1 लाख से ज्यादा युवाओं को नियुक्ति पत्र (जॉइनिंग लेटर) देने का लक्ष्य रखा है। मुख्य सचिव एसपी गोयल खुद इसकी निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने विभागों को खाली पदों की जानकारी जल्द से जल्द संबंधित चयन आयोग को भेजने के निर्देश दिए हैं। पढ़िए पूरी खबर...
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