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    मोदी से मिलकर क्या वरुण को नई जिम्मेदारी मिलेगी:यूपी की सियासत में 2 साल से 'गायब'; 2024 के बाद पीलीभीत नहीं गए

    2 hours ago

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    साल 2009- वरुण गांधी राजनीति में आए और पीलीभीत से सांसद बन गए। 2014 में वह सुल्तानपुर सीट से लड़े, पौने दो लाख वोटों से फिर जीत गए। इस चुनाव से ठीक पहले उन्होंने पीलीभीत में एक भाषण दिया था। कहा था- अगर कोई हिंदुओं की तरफ हाथ बढ़ाता है या सोचता है कि हिंदू नेतृत्वविहीन है, तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूं कि उसका हाथ काट डालूंगा। ऐसे बयानों की वजह से वरुण गांधी यूपी में मशहूर होते चले गए। हिंदुत्व का बड़ा चेहरा बन गए। देश में BJP की सरकार बनी, पीएम नरेंद्र मोदी बने। यूपी में चर्चा फैल गई कि 2017 में BJP जीतेगी, तो वरुण गांधी मुख्यमंत्री बनेंगे। प्रयागराज में तो भावी मुख्यमंत्री के पोस्टर तक लग गए। यूपी में चुनाव में BJP जीती। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। वरुण गांधी की सियासी सक्रियता धीरे-धीरे कम होती चली गई। 2019 में उन्हें स्टार प्रचारक नहीं बनाया गया। पार्टी की कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया। 2024 में टिकट भी नहीं दिया गया। वरुण की सक्रियता एकदम खत्म हो गई। 17 मार्च को वह प्रधानमंत्री मोदी से मिले। अब फिर से उनकी चर्चा शुरू हो गई। क्या उन्हें आगे जिम्मेदारी मिलेगी? क्या राहुल गांधी के खिलाफ BJP एक बार फिर वरुण को खड़ा करेगी? हमने इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की। पढ़िए हमारी खास रिपोर्ट… मोदी से नाराजगी, इसलिए साइड होते चले गए वरुण वरुण गांधी की राजनाथ सिंह से नजदीकी रही है। वह चाहते थे कि राजनाथ सिंह ही प्रधानमंत्री बनें। इसे ऐसे समझिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता में रैली की। उस रैली में जनता मोदी-मोदी के नारे लगाने लगी। वरुण ने मंच से डांटते हुए कहा कि ये मोदी-मोदी क्या है? प्रधानमंत्री मोदी की यह रैली सफल रही। अगले दिन वरुण ने कहा कि यह रैली विफल रही। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए। दूसरी तरफ राजनाथ सिंह के स्थान पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बने। इसके बाद वरुण गांधी पार्टी में थोड़ा साइडलाइन होते नजर आए। महासचिव का पद भी उनसे ले लिया गया। 2019 में वरुण गांधी पीलीभीत से चुनाव लड़े और जीत गए। यहां से वह और विद्रोही स्वभाव के हो गए। कई मौके पर उन्होंने पार्टी की गाइडलाइन से हटकर बातें की। इनमें 4 घटनाएं अहम रहीं, जिन्होंने शासन की निगाह में उन्हें विद्रोही करार कर दिया। 1. रोहित वेमुला की मौत- वरुण ने कहा था कि लेटर पढ़कर मुझे रोना आ रहा है। उन्होंने संकेत दिए कि ये घटना संस्थागत असफलता का नतीजा है। 2. किसान आंदोलन- वरुण ने कहा था- किसान हमारे अपने हैं। उनके शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाया नहीं जा सकता। किसानों के साथ अहंकार नहीं, बल्कि संवाद होना चाहिए। 3. गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ का मामला- अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। किसानों की मौत को निर्दोषों का खून करार दिया। 4. सांसद रहते हुए CM योगी से नहीं मिले- 30 दिसंबर, 2021 को सीएम योगी ने पीलीभीत में एक रैली की। बरेली और शाहजहांपुर के सांसद आए, लेकिन सांसद वरुण गांधी नहीं आए। पीएम से मिले, लिखा- मार्गदर्शन का सौभाग्य मिला 17 मार्च, 2026 को दिन में 11 बजकर 1 मिनट पर वरुण गांधी ने सोशल मीडिया पर एक फोटो पोस्ट की। इस फोटो में उनके साथ पीएम नरेंद्र मोदी, वरुण की पत्नी यामिनी रॉय और बेटी अनुसूया थी। वरुण ने लिखा- पीएम मोदी से मिलकर उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके आभामंडल में अद्भुत पितृवत स्नेह और संरक्षण का भाव है। आपसे हुई भेंट इस विश्वास को और दृढ़ बना देती है कि आप देश और देशवाहियों के सच्चे अभिभावक हैं। पढ़िए इस मुलाकात पर एक्सपर्ट क्या कहते हैं वरुण राजनीतिक पुनर्वास की खोज में हमने वरुण और पीएम मोदी की इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग सीनियर जर्नलिस्ट से बात की। वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- वरुण गांधी अब अपना राजनीतिक पुनर्वास खोज रहे हैं। पीएम मोदी के खिलाफ उन्होंने सब कुछ करके देख लिया। जिस वक्त मोदी नरेटिव में कमजोर पड़ रहे थे, उस वक्त वरुण अपने बयानों और लेखों के जरिए उन पर हमलावर रहे। किसान आंदोलन के दौरान तो विपक्षियों के साथ बैठकर अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रोपगेंडा करते रहे। हर्षवर्धन कहते हैं- वरुण गांधी को लगा कि 2024 में नरेंद्र मोदी की सियासत खत्म हो जाएगी। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा। नरेंद्र मोदी की राजनीति रही है कि वह गांधी परिवार के खिलाफ उसी परिवार से ही किसी एक व्यक्ति को अपने साथ रखते हैं। वरुण भले राहुल-प्रियंका के खिलाफ नहीं बोलते, लेकिन उनके साथ रहने से एक मैसेज जाता है कि गांधी परिवार का एक व्यक्ति कांग्रेस के खिलाफ है। हमने पूछा कि वरुण को राजनीति में कहां फिट किया जा सकता है? क्या 2027 के चुनाव को देखते हुए यूपी में कोई जिम्मेदारी दी जा सकती है? हर्षवर्धन कहते हैं- ऐसा नहीं लगता। वरुण को यूपी भेजने का कोई कारण नहीं दिखता। उन्हें पार्टी में ही कोई पद दिया जा सकता है। हालांकि, कोई बड़ा और निर्णायक पद दिया जाए, इसकी संभावना भी कम नजर आती है। मेनका ने कहा था वरुण मुख्यमंत्री होते तो… पीलीभीत के सीनियर जर्नलिस्ट केशव अग्रवाल कहते हैं- 2024 के बाद वरुण गांधी पीलीभीत नहीं आए। यहां के कुछ लोगों से संपर्क में रहे, लेकिन कोई निर्देश देने जैसी बात नहीं की। अब जो मुलाकात है, वह पार्टी में रिश्ते को सुधारने की कोशिश दिखती है। क्योंकि यह बात सभी जानते हैं कि वरुण गांधी पिछले कुछ सालों में भाजपा सरकार और नरेंद्र मोदी पर हमलावर रहे हैं। वरुण को पार्टी में नजरअंदाज करने को लेकर केशव कहते हैं- इसके 2 मजबूत कारण नजर आते हैं। पहला- खुद को 2017 के चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का दावेदार प्रजेंट करना। जगह-जगह भावी मुख्यमंत्री का पोस्टर लगवाना। दूसरा- मेनका गांधी ने एक बार कहा था कि वरुण गांधी मुख्यमंत्री होते, तो पीलीभीत के लोगों की चांदी-चांदी होती। यही बयान पार्टी आलाकमान को गाइडलाइन से इतर लगे होंगे और उन्होंने इन्हें साइड किया। राहुल नहीं चाहते, वरुण कांग्रेस में आए केशव कहते हैं- जिस वक्त वरुण गांधी अपनी सरकार पर आक्रामक थे, उसी दौरान उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने की पेशकश की थी। उस वक्त राहुल गांधी पंजाब में थे। उन्होंने इसे तुरंत खारिज कर दिया था। हो सकता है कि वह वरुण गांधी से डर गए हों, क्योंकि वरुण के अंदर मेच्योरिटी है। राहुल की छवि भाजपा मीडिया सेल ने खराब कर दी है। हो सकता है, राहुल गांधी मेच्योरिटी को लेकर ही वरुण गांधी को पार्टी में नहीं लाना चाहते। अब वरुण गांधी का सियासी सफर शुरू से समझते हैं… वरुण का जन्म 13 मार्च, 1980 को दिल्ली में हुआ था। इसके 3 महीने बाद वरुण के पिता संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई। वरुण 4 साल के हुए तो उनकी दादी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत हो गई। इस घटना के बाद वरुण और उनकी मां मेनका गांधी अकेले पड़ गईं। मेनका गांधी ने वरुण को पढ़ाया। 1988 में मेनका गांधी जनता दल में शामिल हो गईं। 1989 में पीलीभीत से सांसद बन गईं। यही वह सीट है, जहां से वरुण गांधी की सियासत शुरू हुई। पहली बार 1999 में मेनका गांधी ने वरुण गांधी का परिचय पीलीभीत की जनता से करवाया। उस चुनाव में वरुण ने अपनी मां के लिए कैंपेन किया। 2004 में वरुण भाजपा में शामिल हुए। प्रदेश की 40 सीटों पर प्रचार किया। 2009 में भाजपा ने पीलीभीत से प्रत्याशी बनाया, वरुण जीत गए। 2014 में वरुण को सुल्तानपुर सीट से प्रत्याशी बनाया। वरुण यहां भी जीत गए। लेकिन, इसी बीच अपने बयानों के चलते वरुण लगातार पॉपुलर होते चले गए। आक्रामक भाषणों से चर्चित हुए वरुण यूपी में 2012 से 2017 के बीच सपा की सरकार थी। वरुण गांधी इस सरकार पर हमलावर रहे। जब भी मंच पर होते, आक्रामक भाषण देते। पीलीभीत में एक बार उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसावादी सिद्धांत को ही खारिज कर दिया था। वरुण ने कहा था- मैं इसे बेवकूफी मानता हूं कि कोई अगर आपके गाल पर एक चांटा मारे, तो आप दूसरा गाल आगे कर दें। उसके हाथ काट दो, जिससे वह किसी दूसरे पर भी हाथ न उठा सके। वरुण हर जगह इसी तरह का भाषण देते थे। इसके चलते वह पश्चिमी यूपी, खासकर रुहेलखंड इलाके में पॉपुलर हो गए। उस वक्त भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे। उन्होंने वरुण गांधी को पश्चिम बंगाल का प्रभारी बना दिया। वरुण के समर्थक युवाओं ने वरुण सेना बना ली। प्रयागराज समेत कई जगहों पर भावी मुख्यमंत्री वरुण गांधी को पोस्टर लगा दिए गए थे। लेकिन, खुद को मुख्यमंत्री की तरह पेश करने का ये तरीका उनके ही खिलाफ चला गया। पहले मोदी और फिर योगी के खिलाफ काम करते रहने से वरुण धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों से दूर होते चले गए। अब पीएम मोदी से मिलकर वह फिर अपनी सियासी जमीन तलाश रहे हैं। ----------------------- यह खबर भी पढ़ें- वरुण गांधी परिवार के साथ PM मोदी से मिले, लोकसभा में टिकट कटने के बाद पहली मुलाकात, अहम जिम्मेदारी मिल सकती है लोकसभा चुनाव में पीलीभीत से टिकट कटने के बाद भाजपा नेता वरुण गांधी ने पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की। उनकी पत्नी यामिनी और बेटी अनुसूया भी साथ रहीं। सूत्रों के मुताबिक, वरुण ने देश के मौजूदा हालात पर पीएम से चर्चा की। उनका मार्गदर्शन लिया। पीएम ने भी वरुण और उनकी पत्नी से हालचाल पूछा और बेटी को दुलारा। पढ़िए पूरी खबर...
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