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    निषाद पार्टीआज करेगी शक्ति प्रदर्शन:कश्यप, गुर्जर, निषाद, पिछड़ा और अति पिछड़ा को साधेगी, लोकसभा चुनाव पर फोकस

    8 hours ago

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    पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत इन दिनों नोएडा में केंद्रित नजर आ रही है। 28 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जनसभा और 29 मार्च को समाजवादी की दादरी में समानता रैली के बाद अब आज निषाद पार्टी अपना शक्ति प्रदर्शन करने जा रही है। नोएडा के इंडोर स्टेडियम में आयोजित कश्यप, गुर्जर, निषाद, पिछड़ा और अति पिछड़ा एकता महा सम्मेलन को पार्टी का बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने इसे महज रैली नहीं बल्कि सम्मान और अधिकार की लड़ाई बताया है। उन्होंने कहा कि कमजोर वर्गों को संविधान के अनुसार शिक्षा और सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए। संजय निषाद ने जनगणना में वंचित समुदायों की गिनती, 27% राजनीतिक आरक्षण और जमीन गंवाने वालों को कंपनियों में हिस्सेदारी देने की मांग भी दोहराई। सपा-बसपा पर हमला, सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश सम्मेलन से पहले निषाद पार्टी ने विपक्ष पर सीधा हमला बोला है। संजय निषाद ने आरोप लगाया कि बसपा ने रोजी-रोटी छीनी और सपा ने शिक्षा और अब इन अधिकारों को वापस दिलाने की जरूरत है। यह सम्मेलन साफ तौर पर पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट बैंक को साधने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। पूर्वांचल से पश्चिम यूपी तक विस्तार का संकेत अब तक पूर्वांचल की राजनीति में सक्रिय रही निषाद पार्टी इस सम्मेलन के जरिए पश्चिमी यूपी में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का संदेश देना चाहती है। गोरखपुर और प्रयागराज के बाद नोएडा को चुनना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पहले यह रैली मेरठ में प्रस्तावित थी, लेकिन बाद में इसे नोएडा शिफ्ट किया गया। दनकौर क्षेत्र को एकलव्य से जोड़ते हुए पार्टी ने इसे ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में पेश किया है, जिससे सामाजिक न्याय का संदेश देने की कोशिश की जा रही है। बीजेपी गठबंधन और 2027 की तैयारी भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी निषाद पार्टी इस सम्मेलन के जरिए अपने राजनीतिक कद और हिस्सेदारी का संकेत भी देना चाहती है। पार्टी पहले ही साफ कर चुकी है कि उसके कार्यकर्ता विभिन्न राज्यों में बीजेपी के समर्थन में सक्रिय हैं। ऐसे में नोएडा का यह महा सम्मेलन सिर्फ भीड़ जुटाने का आयोजन नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक मोलभाव की जमीन तैयार करने की कवायद माना जा रहा है।
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