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    औरैया में गोबर गैस से जल रहे चूल्हे:10 सालों से कर रहे उपयोग, एलपीजी संकट के बीच पेश की आत्मनिर्भरता की मिसाल

    15 hours ago

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    औरैया के परवाह गांव एलपीजी गैस संकट के बीच आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रहा है। जहां देश के कई हिस्सों में लोग गैस सिलेंडर के लिए कतारों में खड़े दिखाई देते हैं, वहीं इस गांव के कई परिवार वर्षों से गोबर गैस का उत्पादन कर अपनी रसोई का काम चला रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने गांव में ही गोबर गैस तैयार करने की व्यवस्था की है, जिससे उन्हें एलपीजी गैस की कमी या बढ़ती कीमतों की चिंता नहीं सताती। गोबर गैस से भोजन पकाना न केवल आसान है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी किफायती साबित हो रहा है। गांव के लोगों का कहना है कि गोबर गैस प्लांट का समय-समय पर सही रखरखाव किया जाए तो यह लंबे समय तक बेहतर गैस उपलब्ध कराता है। इससे चूल्हे के धुएं से भी राहत मिलती है और रसोई का काम स्वच्छ तरीके से पूरा होता है। इस आत्मनिर्भरता की शुरुआत गांव के किसानों ने करीब दस साल पहले की थी। उन्होंने अपने घरों में अंडरग्राउंड टैंक बनाकर मवेशियों के गोबर से गैस तैयार करने का प्रयोग शुरू किया। उनके इस सफल प्रयास को देखकर धीरे-धीरे गांव के अन्य लोगों ने भी गोबर गैस प्लांट लगाना शुरू कर दिया। आज लगभग 60 परिवारों वाले इस गांव में करीब 20 गोबर गैस टैंक स्थापित हैं, जिनसे कई परिवारों के चूल्हे जल रहे हैं। गोबर गैस से निकलने वाला अवशेष खेतों के लिए जैविक खाद बन रहा है, जिससे कृषि उत्पादन में भी सुधार हो रहा है। ग्रामीण रामआसरे ने बताया कि वह दस साल से गोबर गैस का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि कृषि विज्ञान केंद्र और गेल की तरफ से ये प्लांट लगाए गए थे। उनके अनुसार, तीन तसला गोबर से दो समय का चूल्हा आसानी से जल जाता है। एक अन्य ग्रामीण रामसखी ने स्वीकार किया कि इसमें थोड़ी झंझट जरूर है, लेकिन जब एलपीजी का संकट हो तो इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। ग्रामीणों का मानना है कि अगर हर गांव इस तरह की पहल करे तो ईंधन की समस्या के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी बड़ा बदलाव संभव है।
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