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    पराली मिट्टी की आत्मा है इसे जलाएं नहीं:जलाने से पर्यावरण, भूमि की उर्वरता पर पड़ता है गंभीर असर

    3 hours ago

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    रबी की मुख्य फसल गेहूं की कटाई खत्म होने को है। बतौर किसान अगर गेहूं की कटाई के बाद जायद या खरीफ फसल की तैयारी के लिए पराली जलाने का विचार कर रहे हैं, तो एक बार ठहरकर इससे होने वाले पर्यावरण और भूमि के उर्वरा शक्ति को होने वाले व्यापक और दीर्घकालिक क्षति के बारे में जरूर सोचें। पराली जलाना सिर्फ खेत को साफ करना नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत और अपनी भविष्य की पैदावार को नुकसान पहुंचाना है। पराली के साथ खेत के लिए जरूरी पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (एनपीके) जलकर नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा मिट्टी में मौजूद करोड़ों लाभकारी बैक्टीरिया और फफूंद भी खत्म हो जाते हैं, जो फसल की वृद्धि के लिए बेहद अहम होते हैं। सही अर्थों में कहें तो आप पराली के साथ भूमि की आत्मा और अपनी किस्मत को भी जला रहे हैं। सरकार की ओर से किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में लगातार जागरूक किया जा रहा है। कृषि विभाग के अधिकारी गांव-गांव जाकर किसानों को समझा रहे हैं। जलाने की बजाय पराली की कम्पोस्टिंग करें पराली को जलाने की बजाय उसकी कम्पोस्टिंग करना ज्यादा फायदेमंद है। राज्य सरकार पराली के चक्रण को बढ़ावा देकर इसे आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने पर भी जोर दे रही है। कई जिलों में बायो कंप्रेस्ड गैस (सीबीजी) प्लांट स्थापित हो चुके हैं और कुछ जगहों पर यह प्रक्रिया जारी है। पराली जलाने पर 15 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान भी लागू है। क्या कहते हैं विशेषज्ञ विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने की समस्या का समाधान किसानों की जागरूकता में ही है। किसानों को इसके नुकसान के साथ-साथ इसके उपयोग के आसान और सस्ते विकल्प भी बताए जाने जरूरी हैं। पराली एक मूल्यवान जैविक संसाधन है, जिसे कम्पोस्ट खाद, कागज, बिजली और कंप्रेस्ड बायो गैस बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित स्ट्रॉ डीकंपोजर जैसे नवाचार पराली प्रबंधन में मददगार साबित हो रहे हैं। इनके इस्तेमाल से पराली कम समय में खाद में बदल जाती है, जिससे खेत की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। पराली है पोषक तत्वों का खजाना शोध बताते हैं कि फसल अवशेषों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की पर्याप्त मात्रा मौजूद रहती है। यदि इन्हें खेत में ही सड़ा दिया जाए, तो यह प्राकृतिक खाद के रूप में काम करते हैं। इससे अगली फसल में रासायनिक उर्वरकों की जरूरत लगभग 20-25 प्रतिशत तक कम हो सकती है, जिससे खेती की लागत घटती है और लाभ बढ़ता है। इसके अलावा मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, सूक्ष्मजीव सक्रिय रहते हैं और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। एक अध्ययन के अनुसार, पराली जलाने से प्रति एकड़ बड़ी मात्रा में कार्बन के साथ-साथ करोड़ों सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। पराली न जलाने के अन्य फायदे फसल अवशेषों से ढकी मिट्टी का तापमान और नमी संतुलित रहती है, जिससे सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है। इससे जमीन की जल धारण क्षमता में सुधार होता है और सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है, जिससे पानी और लागत दोनों की बचत होती है। क्या हैं विकल्प पराली जलाने की बजाय उसे खेत में ही पलटकर गहरी जुताई करें और सिंचाई कर दें। जल्दी सड़न के लिए सिंचाई से पहले प्रति एकड़ लगभग 5 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा बाजार में उपलब्ध जैविक कल्चर का उपयोग भी किया जा सकता है, जिससे पराली जल्द खाद में बदल जाती है। कुल मिलाकर, पराली को समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखने की जरूरत है। सही प्रबंधन से यह खेती की लागत घटाने और मिट्टी की सेहत सुधारने का बड़ा साधन बन सकती है।
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