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    PM मोदी होने वाले थे रवाना, ठीक उससे पहले ही भारत ने इजरायल को दे दिया झटका!

    3 hours from now

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    अगले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की होने वाली इजराइल यात्रा से ठीक पहले भारत ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जहां भारत ने इजराइल के खिलाफ यूएन में अपना पक्ष रखा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उस संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें वेस्ट बैंक में इजराइल द्वारा नियंत्रण मजबूत करने की कार्रवाई की कड़ी निंदा की गई है। यूएन का यह बयान 100 से अधिक देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा जारी किया गया है। जिसमें यूनाइटेड किंगडम, रशिया, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश शामिल है और भारत ने भी इस बयान के डेडलाइन समाप्त होने से ठीक पहले इस बयान का समर्थन किया है। इस बयान में कहा गया है कि वेस्ट बैंक में इजराइल की एकतरफ़ा कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। साथ ही 1967 के बाद कब्जे वाली फिलिस्तीनी क्षेत्रों जिसमें पूर्वी यरूशलेम भी शामिल है।इसे भी पढ़ें: चीन-अमेरिका नहीं, AI पर दुनिया की अगुवाई करेगा भारत? UN चीफ Guterres ने जताया भरोसावहां की जनसंख्यिकी और भौगोलिक स्थिति बदलने की किसी भी कोशिश को खारिज किया गया है। आपको बता दें इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की अंडर सेक्रेटरी जनरल रोजमरी डिकालो ने भी चेतावनी दी है कि यह कदम डिफेक्टो एनेक्सेशन यानी व्यवहारिक रूप से कब्जे की स्थिति बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। यह मुद्दा यूनाइटेड नेशन सुरक्षा परिषद तक पहुंच चुका है। भारत का ये रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि नई दिल्ली और तेल अवी के रिश्ते पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। खास करके रक्षा और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में। लेकिन भारत लगातार हमेशा से दो राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। जिसमें एक तरफ स्वतंत्र फिलिस्तीन दूसरी तरफ सुरक्षित सीमाओं के भीतर इजराइल दोनों साथ-साथ अस्तित्व में हो ऐसा भारत मानता है।इसे भी पढ़ें: North Korea का 'दुश्मन' को संदेश, Kim ने तैनात किए 50 Advanced रॉकेट लॉन्चरयह कदम एक संतुलित कूटनीति का संकेत भी है। जहां भारत फिलिस्तीन और इजराइल दोनों से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहता है। एक ओर भारत इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है। तो दूसरी ओर वो अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों में फिलिस्तीन का समर्थन भी कर रहा है। अब सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी की आगामी इजराइल यात्रा के दौरान यह मुद्दा वहां पर उठ सकता है और क्या भारत अपने पारंपरिक संतुलन वाले रुख को बरकरार रखते हुए पश्चिमी एशिया में बड़े भूमिका निभाने की कोशिश करेगा। एक बात तो स्पष्ट है कि भारत ने यह संदेश दिया है कि दोस्ती अपनी जगह लेकिन वैश्विक नियम और सिद्धांत भी उतने ही महत्वपूर्ण है। 
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