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    सचिवालय में ट्रांसफर पर सवाल:विधायक ने विधानसभा में उठाया मुद्दा, आदेश के बाद भी नहीं हो रही कार्यमुक्ति

    3 hours ago

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    उत्तर प्रदेश सचिवालय में स्थानांतरण नीति के पालन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विधानसभा में नियम-51 के तहत एक विधायक ने यह मामला उठाते हुए कहा कि ट्रांसफर होने के बाद भी कर्मचारियों को कार्यमुक्त नहीं किया जा रहा है, जिससे शासनादेश की मंशा पर असर पड़ रहा है। सपा विधायक धर्मराज सिंह ने उठाए सवाल सदन का ध्यान इस ओर दिलाते हुए सपा विधायक धर्मराज सिंह ने कहा कि प्रदेश की सर्वोच्च संस्था सचिवालय में ही स्थानांतरण नीति का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है। सपा विधायक ने आरोप लगाया कि सचिवालय प्रशासन विभाग द्वारा समूह ‘क’ और ‘ख’ श्रेणी के अधिकारियों के स्थानांतरण तो किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें पुराने विभाग से कार्यमुक्त नहीं किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि ऐसे कर्मचारियों की संख्या करीब 30 से 35 है। नियम के बावजूद जमीन पर नहीं दिख रहा असर सरकार ने सचिवालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए स्थानांतरण की स्पष्ट नीति बनाई है, जिसमें अलग-अलग पदों के लिए कार्यकाल तय किया गया है। इसके अनुसार विशेष सचिव, संयुक्त सचिव, उप सचिव और अनु सचिव के लिए अधिकतम 3 वर्ष, अनुभाग अधिकारी और समीक्षा अधिकारी के लिए 5 वर्ष तथा सहायक समीक्षा अधिकारी व कंप्यूटर सहायक के लिए 7 वर्ष की अवधि निर्धारित है। इसके बावजूद विभागों में लंबे समय से जमे अधिकारियों के स्थानांतरण में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ‘लोक महत्व का विषय' बताकर मांगा जवाब विधायक ने इसे लोक महत्व का विषय बताते हुए सरकार से इस पर स्पष्ट बयान देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जब ट्रांसफर आदेश जारी हो जाते हैं, तो अधिकारियों को समय पर कार्यमुक्त भी किया जाना चाहिए, ताकि नई तैनाती प्रभावी हो सके। क्या है नियम-51 कुल मिलाकर इस मामले के सामने आने के बाद सचिवालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थानांतरण के बाद कार्यमुक्ति नहीं होती, तो इससे न केवल कामकाज प्रभावित होता है, बल्कि पारदर्शिता पर भी असर पड़ता है।
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