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    शुक्रवार आया...कश्मीर की सड़कों पर प्रदर्शन लौट आया! Iran पर हमले का गुस्सा Kashmir की सड़कों पर क्यों दिख रहा?

    1 hour from now

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    कश्मीर घाटी में एक बार फिर वही पुराना दृश्य सामने आया है जो कभी यहां की सड़कों की पहचान बन गया था। रमजान के आखिरी जुमे के दिन श्रीनगर, मगाम और बड़गाम जैसे इलाकों में लोग सड़कों पर उतर आए और ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के विरोध में नारे लगाने लगे। प्रशासन को पहले से आशंका थी कि नमाज के बाद भीड़ जमा हो सकती है, इसलिए सुबह से ही कई जगहों पर पाबंदियां लगा दी गई थीं। श्रीनगर के कई हिस्सों में लोगों के जमा होने पर रोक लगाई गई और हालात पर नजर रखी गई।बताया जा रहा है कि यह विरोध प्रदर्शन खास तौर पर उन इलाकों में देखने को मिला जहां शिया आबादी अधिक है। प्रदर्शनकारियों ने ईरान के समर्थन और फिलिस्तीन के साथ एकजुटता के नारे लगाए। प्रशासन का कहना है कि अब तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे हैं और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। इसके साथ ही श्रीनगर के नौहट्टा इलाके में स्थित ऐतिहासिक जामिया मसजिद को भी एहतियात के तौर पर बंद कर दिया गया।इसे भी पढ़ें: Jammu में जानलेवा हमला, अब Srinagar Court का शिकंजा, Farooq Abdullah के खिलाफ वारंटलेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। ईरान में जो कुछ हुआ, उससे कश्मीर की सड़कों का क्या लेना देना है? अगर पश्चिम एशिया में कोई टकराव होता है तो उसका जवाब श्रीनगर और बड़गाम की गलियों में क्यों खोजा जाता है? क्या घाटी की शांति इतनी कमजोर है कि हजारों किलोमीटर दूर हुए घटनाक्रम का गुस्सा यहां की सड़कों पर उतर आता है?कश्मीर ने पिछले कई सालों में मुश्किल दौर से निकल कर धीरे धीरे सामान्य जीवन की तरफ कदम बढ़ाए हैं। बाजार खुल रहे हैं, पर्यटन लौट रहा है और लोग हिंसा की छाया से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे समय में अगर हर अंतरराष्ट्रीय घटना के नाम पर भीड़ सड़कों पर उतरने लगे तो घाटी में बनी यह शांति कब तक टिकेगी।यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जैसे ही ईरान पर हमला हुआ, वैसे ही शुक्रवार की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन का वही पुराना पैटर्न फिर से दिखाई देने लगा। आखिर यह संयोग है या किसी संगठित सोच का हिस्सा? क्या यह महज भावनात्मक प्रतिक्रिया है या इसके पीछे वह मानसिकता है जो घाटी को बार बार सड़कों के टकराव की ओर धकेलती रही है?यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत एक स्वतंत्र और संप्रभु देश है। यहां की जनता को अपने देश की शांति और व्यवस्था की चिंता पहले करनी चाहिए। अगर हर अंतरराष्ट्रीय विवाद को लेकर यहां हंगामा खड़ा किया जाएगा तो इसका असर सीधे देश के भीतर के माहौल पर पड़ेगा। ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष का समाधान श्रीनगर की सड़कों पर नारे लगाने से नहीं निकलेगा।कश्मीर के लोगों को यह भी सोचना होगा कि दुनिया के हर संघर्ष को अपनी पहचान का हिस्सा बना लेने से क्या हासिल होगा? घाटी के युवाओं को रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की जरूरत है, न कि हर शुक्रवार को गुस्से और नारों की राजनीति की।प्रशासन ने एहतियात के तौर पर पाबंदियां लगाकर फिलहाल स्थिति को संभाल लिया है। लेकिन असली सवाल अभी भी खड़ा है। क्या कश्मीर बार बार उसी पुराने रास्ते पर लौटेगा जहां भीड़, नारे और टकराव ही राजनीति का माध्यम बन जाते थे। अगर ईरान में कुछ हुआ है तो उस पर चर्चा विश्व मंचों पर होगी, कूटनीति के जरिये होगी और सरकारों के बीच होगी। लेकिन कश्मीर की शांति को दांव पर लगाकर आखिर कौन-सा संदेश दिया जा रहा है। घाटी को यह तय करना होगा कि उसे विकास और स्थिरता का रास्ता चुनना है या फिर दूर बैठे संघर्षों के नाम पर अपनी ही सड़कों को अशांत बनाना है।
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