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    श्रृंगवेरपुर में निषादराज का किला, फिर मजार कैसे:निषाद पार्टी आंदोलन कर रही; मुस्लिम बोले- उनकी सरकार, जो चाहे बनवा लें

    2 hours ago

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    प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर में यूपी सरकार ने 40 बीघे में निषादराज पार्क बनवाया। इसमें करीब 37 करोड़ रुपए खर्च हुए। पीएम मोदी ने उद्धाटन किया, लोग पार्क में आने लगे। इसी पार्क की बाउंड्री से लगकर एक मजार और मस्जिद है। अब उसे लेकर विवाद हो रहा है। निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने पिछले हफ्ते हाईवे जाम कर दिया। चेतावनी दी कि अगर प्रशासन इसे नहीं हटाता, तो हमारे लोग इसे उखाड़कर गंगा में फेंक देंगे। मामला धार्मिक है, इसलिए प्रशासन बारीकी से मामले को हैंडल कर रहा। मस्जिद के पास करीब 20 घर मुस्लिमों के हैं। वह दावा करते हैं कि पार्क तो अभी बना, हमारी मस्जिद बहुत पहले से है। अब सवाल है कि सच्चाई क्या है? किस आधार पर संजय निषाद इस मजार-मस्जिद के अवैध होने की बात कह रहे? इतिहास क्या कहता है? दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची और हर पहलू को देखा। आइए सब कुछ एक तरफ से जानते हैं… निषादराज पार्क का रास्ता मुस्लिम बस्ती के बीच से श्रृंगवेरपुर के निषादराज पार्क तक पहुंचने से पहले मुस्लिमों के करीब 20 घर हैं। पार्क तक पहुंचने का जो रास्ता है, उसके ठीक बगल में कब्रिस्तान है। इनको लेकर कोई विवाद नहीं है। लेकिन, पार्क के ठीक पीछे करीब 2 बीघे में एक मजार और मस्जिद है। इसको लेकर विवाद है। 23 मार्च को इसके लिए निषाद वर्ग से जुड़े लोगों ने नेशनल हाईवे-30 जाम कर दिया। आनन-फानन में मजार की सुरक्षा के लिए सैकड़ों पुलिसकर्मी और पीएसी उतार दी गई। प्रशासन ने जैसे-तैसे स्थिति को कंट्रोल किया। लोगों को आगे कार्रवाई का आश्वासन देकर शांत कराया। जानिए हिंदुओं के सवाल मस्जिद पुरानी, तो नीचे लखौरी ईंट कैसे हमारी मुलाकात श्रृंगवेरपुर घाट पर तीर्थ पुरोहित भगवती प्रसाद मिश्रा से हुई। भगवती प्रसाद कहते हैं- मजार को हटाने की चर्चा पहले थी, लेकिन जब निषादराज पार्क बन गया तो यह चर्चा तेज हो गई। जहां मजार है, उसके ठीक बगल में सत्य-साईं आश्रम है। उसके अंदर एक मीनार है, जब नींव खोदी गई तो लखौरी ईंटें मिलीं। पुरात्व विभाग ने भी यहां खुदाई की, हर तरफ लखौरी ईंटें मिलीं। नदी के किनारे से आप देखेंगे, तब भी आपको ऐसे ही ईंट के घर बने दिखेंगे। अब जब चारों तरफ ईंटें हैं, तो फिर मजार कैसे आ गई? वहां मजार होने का तो सवाल ही नहीं होता। भगवती प्रसाद कहते हैं- यह जो मुस्लिमों का गांव है, ये पहले नहीं था। धीरे-धीरे लोग बसते चले गए और फिर गंगा की तरफ बढ़ गए। अब इन लोगों ने मजार की बाउंड्री करवा दी। वहां मेला लगवाने लगे, कव्वाली करवाने लगे।आज से 15-20 साल पहले ऐसा नहीं होता था। राज घाट से लेकर राम घाट तक अगर सब राम और निषादराज से जुड़ा है, तो फिर मजार तो बाद में बनाई गई होगी। उल्टे-सीधे काम के लिए मजार आते हैं लोग श्रृंगवेरपुर में ही पैदा हुए संजय त्रिपाठी कहते हैं- मैंने यहां 15-20 साल में बहुत बदलाव देखा है। यह निषादराज की नगरी है। यहां का इतिहास रामायण में दिखता है। मजार के बगल सत्य-साईं का आश्रम है। वहां 1-2 महंत की हत्या तक हो चुकी है। लोग मजार के पास उल्टे-सीधे काम के लिए जाते हैं। हम तो चाहते हैं कि प्रशासन समस्या सुलझाए। क्योंकि हमने अयोध्या, मथुरा, काशी का विवाद देखा है। 70 साल के कल्लूराम मिश्रा इस मजार वाले स्थल को हनुमान का मंदिर बताते हैं। कहते हैं- मुसलमानों की संख्या बढ़ी, तो इन लोगों ने यहां गुंबद बना लिया। तब किसी ने विरोध नहीं किया। जबसे निषाद पार्टी के संजय निषाद आने लगे, तब से विरोध होने लगा। अगर इसका निर्णय हो जाए तो अच्छा होगा। रामलला यहां आए थे, स्नान किया था। वहीं से रामलला पार हुए थे। अब अगर मजार हो जाएगी तो ठीक नहीं होगा। श्रृंगवेरपुर के निर्मल बाबा कहते हैं- 20-25 साल से तो मैं देख रहा हूं कि वहां मस्जिद है। ये लोग कव्वाली वगैरह करवाते हैं। संजय निषाद कहते हैं कि 3 किलोमीटर का एरिया खाली करवाया जाए, ये निषादराज की राजधानी है। संजय निषाद अगर कह रहे हैं कि मस्जिद हटनी चाहिए तो उनके लोग हटा भी देंगे। 23 मार्च को बहुत बड़ी संख्या में निषाद लोग इकट्ठा भी हुए थे। अब मुस्लिम पक्ष की बात मजार हमेशा खुला, जिसे आना हो आए हम पार्क के किनारे से मजार तक पहुंचे। करीब 2 बीघे का एरिया है। शुरुआत में दो मजार हैं। आगे बढ़ने पर अंदर एक मजार दिखी। ईद-बकरीद के मौके पर यहां नमाज होती है। इस मजार की देख-रेख गांव के ही ननकऊ करते हैं। मस्जिद के ही अंदर वह मजार के सामने बैठकर धार्मिक किताब पढ़ रहे थे। ननकऊ कैमरे पर बात नहीं करते। कहते हैं- यह मजार बहुत पहले से यहां है। पार्क तो अभी बना है। यहां न सिर्फ मुस्लिम, हिंदू लोग भी आते हैं। हमने कहा कि संजय निषाद इसे अतिक्रमण बता रहे हैं, हटाने के लिए हाईवे जाम कर रहे हैं। ननकऊ कहते हैं- अगर उन्हें लेना ही है, तो वह ले लेंगे। उन्हें कौन रोक सकता है? बाकी यहां बहुत पहले से लोग आते रहे हैं। कभी किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई। यहां का गेट हमेशा खुला रहता है। जिसे इबादत करनी होती है, वह आता है। पार्क की सड़क कब्रिस्तान से गई, हमने कुछ नहीं कहा गांव में हमारी मुलाकात मोहर्रम अली से हुई। वह सरकारी नौकरी से रिटायर हैं। मोहर्रम अली कहते हैं- इन लोगों की मर्जी है, ये लोग विवाद करें। बाकी किसी किस्म का विवाद यहां नहीं है। इंदिरा गांधी एक बार यहां आई थीं। तभी उन्होंने मनारी शाह बाबा की मजार के विषय में ऐलान किया था। तब हिंदू-मुस्लिम दोनों ने उनको माला पहनाई थी। जहां तक पार्क की बात है, तो यह पिछले साल ही बना है। ग्राम सभा की 12 बीघा चारागाह भी इसमें गई है। इनका जो रास्ता बना है, वह भी कब्रिस्तान से होकर गया है। हम लोगों ने कभी ऐतराज नहीं जताया। मोहर्रम अली कहते हैं- हम लोग किसी भी तरह का कोई विवाद नहीं चाहते हैं। अगर ये लोग हटाना चाहते हैं, तो बता दें कि क्या नुकसान है? क्या मुस्लिमों ने इनका कोई नुकसान किया? क्या हम लोग इनके पार्क में कोई नुकसान किया? आपको कोई नहीं मिलेगा। यहां जब चौकी उठती थी तो मुस्लिम उसे कंधा देते थे। कुछ लोगों को ऐतराज हुआ तो मुस्लिम कंधा नहीं देते, लेकिन आज भी चौकी के साथ चलते हैं। उस दिन संजय निषाद के साथ जो लोग हंगामा कर रहे थे, सभी बाहर से आए थे। यहां किसी तरह का कोई विवाद नहीं है। अब सवाल है कि कैसे साबित होगा कि यहां क्या होना चाहिए? इसके लिए हमें पुराने शोध को देखना होगा.... पुरातत्व विभाग ने 9 साल तक यहां खुदाई की श्रृंगवेरपुर में पुरातत्व विभाग ने साल-1977 से लेकर 1986 तक खुदाई की। ये खुदाई उस वक्त के ASI महानिदेशक बीबी लाल और केएन दीक्षित की देख-रेख में हुई थी। इस प्रोजेक्ट का नाम ‘ऑर्कियोलॉजी ऑफ द रामायण साइट्स’ था। जिस जगह पर मस्जिद है, वहां से करीब 400 मीटर दूर एक 250 मीटर लंबा पक्का तालाब मिला। इसमें जल प्रबंधन और फिल्ट्रेशन सिस्टम था। ऐसा कहा गया कि ये करीब 2100 साल पुराना है। मिट्टी की मूर्तियां मिलीं, जिनमें धार्मिक आकृतियां बनी थीं। एक शिव की प्राचीन मूर्ति का सिर मिला था। ये 1वीं-2वीं शताब्दी ईस्वी का था। 13 सिक्के मिले थे। ये सिक्के कन्नौज के गहरवार वंश के राजा गोविंद चंद्र की रजत मुद्राएं थीं। ईंट की जो इमारतें मिली थीं, वह मंदिर के अवशेष पाए गए। कुछ स्त्रोत में यह भी कहा गया कि ये श्रृंगी ऋषि से जुड़े मंदिर के अवशेष हैं। खुदाई से पता चला कि यहां गुप्त काल से लेकर मध्य काल तक की निरंतरता दिखती है। रामायण काल से भी जोड़कर देखा जाता है। पुरातत्व विभाग की जो खुदाई हुई या फिर सर्वे हुआ, उसमें कहीं भी मजार-मस्जिद या फिर इस्लामिक संरचना जैसा कुछ नहीं मिला। 19वीं सदी में अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी यहां सर्वे किया था, लेकिन कहीं कोई मजार या इस्लामिक संरचना के बारे में नहीं बताया। उन्होंने रामायण से जुड़े अवशेषों का उल्लेख किया। 1950-60 के बीच इंडियन ऑर्कियोलॉजी रिव्यू रिपोर्ट्स में भी श्रृंगवेरपुर को रामायण के रूप में ही चिन्हित किया, किसी मजार या फिर मस्जिद की चर्चा नहीं की। ------------------------------ ये खबर भी पढ़ें… ‘आलू की बंपर पैदावार, लेकिन लागत निकालना मुश्किल’, यूपी में किसान बोले- ऐसे तो बर्बाद हो जाएंगे यूपी में आलू की बंपर पैदावार हुई है। इस वजह से आलू के दाम काफी गिर गए है। एक क्विंटल आलू 600 से 700 रुपए में मिल रहा है। इस भाव से किसान की लागत भी नहीं निकल रही है। किसान परेशान हैं। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट…
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