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    तापसी पन्नू बोलीं- फिल्में फ्लॉप हुईं, पनौती कहा गया:हीरोइन बनने पर संदेह था, कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों से इंडस्ट्री में अपनी अलग जगह बनाई

    2 hours ago

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    दिल्ली के एक साधारण परिवार से निकलकर इंजीनियरिंग करने वाली तापसी पन्नू ने कभी नहीं सोचा था कि वह ग्लैमर इंडस्ट्री में पहचान बनाएंगी। मॉडलिंग से शुरुआत कर उन्हें साउथ फिल्म इंडस्ट्री में मौका मिला, लेकिन वहां लंबे समय तक सिर्फ ग्लैमरस किरदारों तक सीमित रहीं। कई फिल्मों के फ्लॉप होने पर उन्हें पनौती कहा गया, जिससे आत्मविश्वास को गहरा झटका लगा। बॉलीवुड में एंट्री आसान नहीं रही। ‘चश्मे बद्दूर’ से डेब्यू के बाद असफलताओं और आत्म-संदेह के दौर में तापसी ने खुद को संभाला। उन्होंने स्वीकार किया कि वह अपने लुक, आत्मविश्वास और काबिलियत को लेकर असुरक्षित महसूस करती थीं। इस संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया और बेहतर फैसले लेना सिखाया। फिर आया टर्निंग पॉइंट- पिंक। इस फिल्म ने उनकी इमेज बदली और उन्हें गंभीर अभिनेत्री के रूप में पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों का रास्ता चुना और इंडस्ट्री में अपनी अलग जगह बनाई। आज की सक्सेस स्टोरी में जानते हैं तापसी पन्नू के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें। 1984 दंगों का परिवार पर असर तापसी पन्नू का जन्म 1 अगस्त 1987 को नई दिल्ली में जाट सिख परिवार में हुआ। उनके पिता दिलमोहन सिंह पन्नू सेवानिवृत्त रियल एस्टेट एजेंट हैं, जबकि मां निर्मलजीत कौर पन्नू गृहिणी हैं। परिवार शक्ति नगर में रहता था और 1984 के सिख-विरोधी दंगे के दौरान हिंसा का सामना किया, लेकिन पड़ोसियों की मदद से सुरक्षित बच निकले। उनकी एक छोटी बहन शगुन पन्नू हैं। स्कूलिंग और शुरुआती शिक्षा तापसी ने स्कूली शिक्षा माता जय कौर पब्लिक स्कूल, अशोक विहार से पूरी की। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में डिग्री ली। इंजीनियरिंग के बाद वह सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी कर रही थीं। इसी दौरान पार्ट-टाइम कुछ नया करने के लिए मॉडलिंग ट्राय की। ग्लैमर इंडस्ट्री में आने का मकसद सिर्फ एक्स्ट्रा कमाई तापसी बताती हैं कि शुरुआत में मकसद सिर्फ एक्स्ट्रा कमाई और एक्सपोजर था, न कि ग्लैमर इंडस्ट्री में करियर बनाना। लेकिन काम मिलने पर लगा कि इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। तापसी ने 2008 में “गेट गॉर्जियस” टैलेंट शो में हिस्सा लिया, जहां से पहचान मिली और मॉडलिंग को फुल-टाइम करियर बना लिया। मॉडलिंग के दौरान उन्होंने “पैंटालून्स फेमिना मिस फ्रेश फेस” और “साफी फेमिना मिस ब्यूटीफुल स्किन” जैसे खिताब जीते। कॉलेज टाइम में ही कैमरे के सामने कॉन्फिडेंस आया कॉलेज टाइम में तापसी कल्चरल एक्टिविटीज और डांस में हिस्सा लेती थीं, जिससे कैमरे के सामने कॉन्फिडेंस आया। मॉडलिंग असाइनमेंट्स मिलने पर लगा कि इस फील्ड में ग्रोथ और पहचान मिल सकती है। धीरे-धीरे उन्होंने कई ब्रांड्स के लिए एड शूट किए और झुकाव बढ़ता गया। तापसी ने कई बड़े ब्रांड्स के विज्ञापनों में काम किया, जिनमें रिलायंस ट्रेंड्स, रेड एफएम 93.5, कोका-कोला, मोटोरोला, पैंटालून्स, पीवीआर सिनेमाज, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, डाबर, एयरटेल, टाटा डोकोमो, हैवेल्स और वर्धमान शामिल हैं। फिल्मों की ओर रुख करने का फैसला कुछ साल बाद तापसी को लगा कि मॉडलिंग से वह पहचान नहीं मिल रही जो चाहती थीं। इसी वजह से उन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया। मॉडलिंग की वजह से ही उन्हें पहला ब्रेक साउथ फिल्म इंडस्ट्री में मिला। साउथ सिनेमा में डेब्यू और शुरुआती सफर तापसी को साउथ में पहला बड़ा ब्रेक 2010 में तेलुगु फिल्म ‘झुम्मंडी नादम’ से मिला, जिसमें उन्होंने मोहन बाबू के साथ काम किया। इसके बाद तमिल फिल्म ‘आदुकलम’ में धनुष के साथ नजर आईं। फिल्म को समीक्षकों से सराहना मिली और 58वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में कई अवॉर्ड्स मिले। इसमें उनके अभिनय को प्रॉमिसिंग बताया गया। ग्लैमरस रोल्स में सीमित रहने की चुनौती शुरुआती दौर में उन्हें ज्यादातर ग्लैमरस रोल्स तक सीमित रखा गया, जिससे वह संतुष्ट नहीं थीं। इसके बाद उन्होंने ‘मिस्टर परफेक्ट’ में प्रभास और ‘वीरा’ में रवि तेजा के साथ काम किया। इन फिल्मों को मिला-जुला रिस्पॉन्स मिला। फिर तमिल फिल्म ‘वान्थान वेंदरान’ में काम किया, जो न आलोचकों को पसंद आई और न बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। इसके बाद ‘मोगुडु’ में गोपीचन्द के साथ नजर आईं। फ्लॉप फिल्मों से मिला पनौती का टैग इस फिल्म में उनके अभिनय की तारीफ हुई, भले ही फिल्म को बड़ी सफलता नहीं मिली। इसी दौरान उन्होंने ‘गुंडेलो गोदारी’, ‘दारुवु’ और ‘शैडो’ जैसी तेलुगु फिल्मों में काम किया। उस समय उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं, इसलिए उन्हें पनौती कहा जाने लगा। बाद में तापसी ने इंटरव्यू में बताया कि यह समय उनके लिए मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत करती रहीं। वह कहती हैं कि साउथ इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में उन्हें ग्लैमरस रोल्स तक सीमित रखा गया, जिससे वह संतुष्ट नहीं थीं। तापसी मलयालम फिल्म ‘डबल्स’ में ममूटी के साथ और तमिल फिल्म ‘कंचना 2’ में राघव लॉरेन्स के साथ काम कर चुकी हैं। डेविड धवन की फिल्म से बॉलीवुड में एंट्री तापसी पन्नू ने साउथ इंडस्ट्री में पहचान बनाने के बाद बॉलीवुड में कदम रखा, लेकिन शुरुआती सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने डेविड धवन की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ (2013) से हिंदी सिनेमा में एंट्री की। फिल्म औसत रही और इसके बाद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शुरुआती फ्लॉप फिल्मों का दौर ‘चश्मे बद्दूर’ के बाद तापसी ने कई फिल्मों में काम किया जो बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा सकीं। इनमें ‘रनिंग शादी’, ‘दिल जंगली’ और ‘द गाजी अटैक’ शामिल हैं। कुछ फिल्मों को क्रिटिक्स की सराहना मिली, लेकिन व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। इस तरह शुरुआती दौर में करीब 2–3 फिल्में फ्लॉप या औसत रहीं। आत्म-संदेह और मानसिक दबाव का दौर जूम टीवी के साथ बातचीत में तापसी ने कहा था- जब मैंने बॉलीवुड में कदम रखा, तो सच कहूं तो मैं खुद को काफी असुरक्षित महसूस कर रही थी। मुझे लगता था कि मैं उसके योग्य नहीं हूं। शुरुआत में मैं अपने लुक, अपने अंदाज, अपने आत्म-विश्वास को लेकर बहुत शंकित रहती थी। हर नई फिल्म, हर नया रोल मेरे लिए डर का विषय था। मैंने तेलुगू फिल्म ‘झुम्मंडी नादम’ से शुरुआत की, फिर बॉलीवुड में ‘चश्मे बद्दूर’ से डेब्यू किया। उस समय मुझे इंडस्ट्री की कोई समझ नहीं थी, कोई मार्गदर्शन नहीं मिला। अगर मुझे पहले पता होता कि मैं यहां सफल हो सकती हूं, तो शायद मैं खुद को बेहतर तरीके से तैयार कर पाती। शुरुआत में मैं खुद की हमेशा आलोचना करती रहती थी। अगर फिल्म ठीक से चली नहीं, तो मैं खुद को ही दोषी मान लेती थी, भले ही नतीजा पूरी टीम पर निर्भर करता हो। यह आत्म-संदेह मेरे मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता था। खुद से सवाल, कोई हीरोइन क्यों लेगा ? मैं यह भी सोचती थी कि मैं उन हीरोइनों जैसी खूबसूरत नहीं हूं, इसलिए शायद लोग मुझे कास्ट नहीं करेंगे। फैशन, मेकअप, कैमरे का अच्छा एंगल, इन सब चीजों की मुझे बिल्कुल समझ नहीं थी। उस समय सीखने की प्रक्रिया बहुत थकाने वाली थी। आज मुझे लगता है कि अगर आप खुद में आत्म-विश्वास महसूस करते हैं, तो आप हर चुनौती का सामना कर सकते हैं। मैंने सीखा है कि असफलता को स्वीकार करना और खुद को सीखने देना कितना जरूरी है। अब मैं खुद को इतना कठोर नहीं बनाती और हर मौके का पूरा आनंद लेती हूं। फिल्मों में कई भूमिकाएं और कहानियां हैं जो महिलाओं के संघर्ष, व्यक्तित्व और ताकत पर केंद्रित हैं। मुझे खुशी है कि मैंने भी ऐसी भूमिकाएं निभाईं, जो मेरे लिए चुनौती और सीख दोनों साबित हुई हैं। बॉलीवुड में संघर्ष और चुनौतियां तापसी के लिए बॉलीवुड में जगह बनाना आसान नहीं था। साउथ इंडस्ट्री में काम करने के बाद भी उन्हें बॉलीवुड में आउटसाइडर की तरह देखा गया। बड़े बैनर और स्टार किड्स के बीच पहचान बनाना बड़ी चुनौती थी। उन्हें कई बार टाइपकास्ट होने का खतरा रहा, जहां सिर्फ ग्लैमरस रोल ऑफर किए जाते थे। लेकिन उन्होंने इस धारणा को तोड़ते हुए कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों का चुनाव किया और धीरे-धीरे अभिनय के दम पर अलग पहचान बनाई। तापसी ने बताया कि जब फिल्मों का सिलसिला उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हुआ, तो उन्होंने खुद पर भरोसा करना सीखा। इन अनुभवों ने उन्हें मजबूत बनाया और अपनी प्रतिभा के अनुसार सही प्रोजेक्ट्स चुनना सिखाया। उन्होंने कहा कि अब वह उन फिल्मों को चुनती हैं जिनसे उन्हें भावनात्मक और रचनात्मक जुड़ाव महसूस होता है। उनके अनुसार अब कमर्शियल सफलता से ज्यादा कलात्मक संतुष्टि उनके निर्णयों का आधार है। तापसी ने स्वीकार किया कि शुरुआती फिल्मों के चयन में उन्होंने सुरक्षित विकल्प चुने, जो बॉक्स ऑफिस पर असरदार साबित नहीं हुए। लेकिन बाद में उनके चुनौतीपूर्ण निर्णयों ने दर्शकों से अच्छा कनेक्शन बनाया और उन्हें अलग पहचान दिलाई। पिंक से करियर का टर्निंग पॉइंट लगातार फ्लॉप और औसत फिल्मों के बाद तापसी ने करियर की दिशा बदली। 2016 में रिलीज फिल्म ‘पिंक’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी। इसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया। कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों से बनी पहचान ‘पिंक’ के बाद तापसी पन्नू ने करियर की दिशा साफ कर दी थी। वह सिर्फ ग्लैमरस या कमर्शियल रोल तक सीमित नहीं रहना चाहती थीं। उन्होंने ऐसी फिल्मों का चुनाव किया, जिनकी कहानी मजबूत हो और जो समाज से जुड़े अहम मुद्दे उठाती हों। इस कड़ी में उन्होंने ‘नाम शबाना’, ‘मुल्क’, ‘मनमर्जियां’, ‘बदला’ और ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों से उन्होंने साबित किया कि वह कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा की भरोसेमंद एक्ट्रेस हैं। खासकर ‘थप्पड़’ में उनके अभिनय को सराहा गया, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड मिला। इस फिल्म के बारे में उन्होंने फिल्मफेयर को दिए इंटरव्यू में कहा था- यह फिल्म सिर्फ एक थप्पड़ की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की कहानी है, और मैं ऐसी कहानियों का हिस्सा बनना चाहती हूं। इसके अलावा तापसी ने ‘सांड की आंख’ और ‘हसीन दिलरुबा’ में दमदार किरदार निभाए। ‘रश्मि रॉकेट’ में एथलीट की भूमिका निभाई, जबकि ‘लूप लपेटा’ में अलग अंदाज दिखा। ‘दोबारा’ और ‘ब्लर’ में उन्होंने एक्सपेरिमेंटल सिनेमा में हाथ आजमाया। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी तापसी ने मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। ‘हसीन दिलरुबा’ और ‘ब्लर’ को डिजिटल ऑडियंस से अच्छा रिस्पॉन्स मिला, जिससे लोकप्रियता बढ़ी। उन्होंने शाहरुख खान के साथ फिल्म ‘डंकी’ में काम किया, जिसने उन्हें मेनस्ट्रीम सिनेमा में मजबूत पहचान दिलाई। _______________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... कम उम्र में गंजेपन का सामना:सुपरस्टार बनने का अधूरा सपना, धुरंधर से अक्षय खन्ना ने साबित किया, ‘धुरंधर’ से शानदार वापसी की कम उम्र में गंजेपन जैसी पर्सनल चुनौतियों और करियर के कई उतार-चढ़ाव झेलने के बावजूद अक्षय खन्ना ने कभी खुद पर भरोसा नहीं खोया। सुपरस्टार बनने का उनका सपना भले पूरी तरह साकार न हो पाया हो, लेकिन उन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग के दम पर इंडस्ट्री में एक अलग और मजबूत पहचान जरूर बनाई। पूरी खबर पढ़ें..
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