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    उत्तराखंड के मैदानी जिलों में बढ़ रही मुस्लिम आबादी:12 कस्बों में हिंदू 50% से कम, CM धामी बोले- कांग्रेस ने बिगाड़ी डेमोग्राफी

    18 hours ago

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    उत्तराखंड के कोटद्वार में मोहम्मद दीपक प्रकरण के बाद अब प्रदेश में आबादी के संतुलन और अलग-अलग समुदायों की संख्या को लेकर बहस तेज हो गई है। भाजपा और कांग्रेस समेत अन्य राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी-अपनी बात रख रहे हैं। राजनीतिक हलकों में इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उभरते एक अहम मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है। 2011 के जनसंख्या आंकड़ों में धर्मनगरी हरिद्वार के साथ साथ देहरादून और ऊधम सिंह नगर के एक दर्जन कस्बे ऐसे मिले हैं, जहां हिंदू ही अल्पसंख्यक बन गया है। यहां मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है और हालात ऐसे हैं कि ये आंकड़ा 50% या उससे ऊपर पहुंच गया है। जनगणना के अनुसार, हरिद्वार के पिरान कलियर कस्बे में तो मुस्लिम आबादी 94% है। मैदानी जिलों में इस तरह बदलती डेमोग्राफी को कुछ राजनीतिक विश्लेषक, भाजपा के लिए चिंता और कांग्रेस के लिए फायदा मान रहे हैं। इसलिए भाजपा इस गंभीर मुद्दा मान रही है, कांग्रेस इस मुद्दे का सांप्रदायिक भेदभाव के आधार पर विरोध कर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता शीशपाल बिष्ट के मुताबिक भाजपा आबादी के मुद्दे को उठाकर पलायन, बेरोजगारी और विकास जैसे सवालों से ध्यान भटका रही है। हालांकि, भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रदेश की जनसंख्या में असंतुलन पैदा होने की कोशिशें चिंता का विषय हैं और सरकार इसे रोकने के लिए कदम उठा रही है। पहाड़ों के मुकाबले मैदानों में ज्यादा आबादी… उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो उत्तराखंड के मैदानी जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत ज्यादा दिखाई देता है। हरिद्वार जिले की रुड़की तहसील में मुस्लिम आबादी 42.29% है। ऊधम सिंह नगर के जसपुर में 37.36% और काशीपुर में 28.84% दर्ज की गई है। देहरादून जिले के विकासनगर में यह 27.18 और बाजपुर में 26.79% है। हरिद्वार और लक्सर क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी करीब 25% के आसपास है। तराई और कस्बाई क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी अच्छी संख्या में मौजूद है। रामनगर में यह 22.95%, किच्छा में 22.35% और हल्द्वानी में 18.55% है। सितारगंज (15.13%), गदरपुर (14.77%) और खटीमा (13.64%) जैसे क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी दो अंकों में दर्ज की गई है। इसके उलट पहाड़ी जिलों की तस्वीर अलग है। श्रीनगर में मुस्लिम आबादी 3.5%, टिहरी में 3.56%, रानीखेत में 2.36% और पौड़ी में 1.66% है। जोशीमठ में यह 1.16% है, जबकि कई उंचाई वाले इलाकों में यह 1% से भी कम है। अब समझिए डेमोग्राफी बदलाव पर राजनीतिक चिंता क्यों राजनीतिक विश्लेषक दिनेश मानसेरा का कहना है कि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक संविधान का हिस्सा है,संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 में धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों के संरक्षण का जिक्र है। यह टर्म राजनीति में भी जमकर प्रयोग होता है, उत्तराखंड की डेमोग्राफी को बदलना एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश का हिस्सा है, ऐसे लोगों का मकसद प्रदेश की राजनीति में अपना दबदबा बढ़ाना है। पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश से सटे राज्य के इलाकों की जनसंख्या में जबरदस्त बदलाव हो चुका है। राज्य में बड़ी संख्या में फर्जी स्थायी निवास प्रमाण पत्र मिलने के बाद प्रदेश सरकार ने 2003 से परिवार रजिस्टर की जांच का आदेश दिया है। उनके अनुसार उत्तर प्रदेश से सटे इलाकों में पिछले सालों में आबादी में बदलाव देखा गया है और ऐसे परिवर्तन प्रदेश की राजनीति पर असर डाल सकते हैं। पहाड़ी और मैदानी सीटों का गणित उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से 36 सीटें मैदानी और तराई क्षेत्रों में आती हैं, जहां आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि 34 सीटें पर्वतीय क्षेत्रों में हैं जहां आबादी अपेक्षाकृत स्थिर है। ऐसे में मैदानी इलाकों की ज्यादा सीटों पर जनसंख्या संरचना और मतदाता संख्या में बदलाव चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने वाला बड़ा कारण बन सकता है। कांग्रेस कार्यकाल में डेमोग्राफी बदलाव के आरोप विभिन्न विभागों से ली गई जानकारी और 2011 की जनगणना के बाद चुनावों में बढ़ती मतदाता संख्या के आधार पर कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट अभय कुमार का दावा है कि उत्तराखंड में कांग्रेस शासनकाल के दौरान मतदाता वृद्धि दर भाजपा सरकार के मुकाबले कहीं अधिक रही। उनके अनुसार 2002–2007 में मतदाता संख्या 13.56% और 2012-2017 में 19.27% बढ़ी, जबकि भाजपा शासनकाल 2007-2012 में यह 6.54% और 2017-2022 में 8.67% दर्ज की गई। वे कहते हैं कि कुछ ऐसी सीटों पर मतदाताओं की संख्या तेजी से बढ़ी जिन्हें पहले भाजपा के लिए अनुकूल माना जाता था। देहरादून की धर्मपुर सीट पर 2012-2017 के बीच 52.54% वृद्धि इसका उदाहरण बताया जाता है। अभय कुमार का आरोप है कि जनसांख्यिकीय बदलाव के जरिए राजनीतिक संतुलन प्रभावित करने की कोशिश की गई है। एक सीट बदल सकती है सरकार का समीकरण कोटद्वार विधानसभा क्षेत्र को मिश्रित आबादी और करीबी चुनावी मुकाबलों के कारण संवेदनशील सीट माना जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कोटद्वार नगर क्षेत्र में मुस्लिम आबादी करीब 27% बताई जाती है, जबकि तहसील स्तर पर यह लगभग 9% है। 2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी से मात्र 4,623 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस हार के बाद भाजपा 31 सीटों पर सिमट गई जबकि कांग्रेस 32 सीटों के साथ सरकार बनाने की स्थिति में आ गई और प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जहां मुकाबला करीबी हो, वहां मतदाताओं की संख्या या मतदान प्रतिशत में मामूली बदलाव भी पूरे राज्य की सत्ता का संतुलन बदल सकता है। कोटद्वार को अक्सर ऐसे उदाहरण के रूप में देखा जाता है। ‘डेमोग्राफी नहीं, पलायन और बेरोजगारी असली मुद्दे’ कांग्रेस प्रवक्ता शीशपाल बिष्ट ने कहा कि भाजपा डेमोग्राफिक बदलाव का मुद्दा उठाकर प्रदेश के असली मुद्दों से ध्यान भटका रही है। उन्होंने कहा कि पलायन आयोग की रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के सैकड़ों गांव खाली हो चुके हैं और कई स्थानों पर लोग रोजगार के अभाव में पलायन कर रहे हैं। सरकार इन समस्याओं को रोकने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि जनता अब वास्तविक समस्याओं को समझ रही है और सरकार की नीतियों का आकलन उसके प्रदर्शन के आधार पर करेगी। 'जनसंख्या संतुलन बदलने की कोशिशें चिंता का विषय' भाजपा की प्रवक्ता कमलेश रमन इस मामले पर कहती हैं कि प्रदेश की डेमोग्राफी में बदलाव की कोशिशें गंभीर चिंता का विषय हैं। उनका आरोप है कि कुछ संगठित ताकतें सामाजिक संतुलन को प्रभावित करने और गलत गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही हैं। उनके अनुसार आने वाले समय में इन मुद्दों का प्रभाव चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता है, इसलिए सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। डेमोग्राफी की बहस केवल धर्म नहीं, संसाधन- राजनीति से भी जुड़ी वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप राणा का कहना है कि डेमोग्राफी का वास्तविक अर्थ केवल धार्मिक आबादी का अनुपात नहीं होता। इसमें जनसंख्या घनत्व, आयु संरचना, प्रवासन, रोजगार और संसाधनों की उपलब्धता जैसे कई कारक शामिल होते हैं। प्रशासन इन आंकड़ों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं की योजना बनाने के लिए करता है। हालांकि राजनीति में डेमोग्राफी को मतदाता संतुलन और सामाजिक प्रभाव के नजरिये से भी देखा जाता है। विशेषकर देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में पिछले दो दशकों में आबादी का विस्तार तेजी से हुआ है। ग्रामीण इलाकों में बसावट, औद्योगिक विकास और रोजगार के अवसरों ने जनसंख्या संरचना को प्रभावित किया है। उनका मानना है कि इस बदलाव को केवल धार्मिक नजरिये से नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक संदर्भों में समझना आवश्यक है, तभी वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है। ----------------- ये खबर भी पढ़ें… उत्तराखंड में डेमोग्राफिक बदलाव राज्य सरकार के सामने चुनौती:10 सालों में बॉर्डर की 6 सीटों में बढ़े 50% मतदाता, 25 में इजाफा 30% के पार उत्तराखंड चुनाव आयोग के आंकड़ों से एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इन आंकड़ों के मुताबिक राज्य की उन विधानसभा सीटों पर मतदाताओं में बड़ा उछाल आया है जो पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से सटी हुई हैं। (पढ़ें पूरी खबर)
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