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हाल ही में गुजरात के वलसाड जिले के धरमपुर तालुका के पिपरोल गांव के दूरदराज इलाके में स्वामीनारायण ज्ञानपीठ,सलवाव,वापी द्वारा 17वें सामूहिक विवाह और 91वें हनुमानजी मंदिर मूर्ति प्रतिष्ठा का एक बड़ा उत्सव आयोजित किया गया था। इस उत्सव की अध्यक्षता गुजरात के जाने-माने उद्योगपति एव शाम सेवा फाउंडेशन के चेयरमैन मगनभाई पटेलने की थी, जिसमें वे मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे और उन्होंने 51 आदिवासी लड़कियों को उनके नए जीवन की शुरुआत के लिए आशीर्वाद दिया। इस उत्सव में बड़ी संख्या में स्वामीनारायण संप्रदाय के संत,डोनर्स,सामाजिक नेता बड़ी मात्रा में मौजूद थे।इस अवसर पर 91वें हनुमानजी मंदिर में स्वामीनारायण ज्ञानपीठ,सलवाव के पुराणी स्वामी केशवचरणदासजी, ज्ञानपीठ के मैनेजिंग ट्रस्टी कपिलदासजी स्वामी और मगनभाई पटेलने वैदिक मंत्रों के साथ शाश्त्रोक्त विधि विधान अनुसार मंदिर के शिखर कलश की पूजा की। यहां बताना जरूरी है इस सामूहिक विवाह के ७ दिन पूर्व दिनांक : 15.2.26 को इसी संस्था द्वारा ब्लाइंड बेटियों की एक क्रिकेट टूर्नामेंट भी ऑर्गनाइज की गयी थी, जिसमे भी मगनभाई पटेल अध्यक्ष स्थान पर थे और उन्होंने इस क्रिकेट प्रतियोगिता में 2 लाख रुपये का डोनेशन का चेक इस संस्था को दिया।इसी तरह दिनांक : 22.2.26 को यानी सामूहिक विवाह समारोह से एक दिन पहले ही मगनभाई पटेल वापी आ गए और दूसरे दिन अगली सुबह, वे वापी से लगभग 51 km दूर पिपरोड गांव में सामूहिक विवाह समारोह में मुख्य दानदाता के तौर पर मौजूद रहे और अपने भाषण के दौरान 4,51,000 रुपये के दान की घोषणा की। इस तरह, वे हर महीने हो रहे विविध संस्थाओ के सेवा प्रोजेक्ट्स में वे अध्यक्ष एव मुख्यदानदाता के तौर पर मौजूद रहते हैं और संगठन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दान देते रहते हैं और ऐसी संस्थाओ को दूसरे दानदाताओं से डोनेशन दिलाने में मदद करते है।यहां बताना जरूरी है कि वर्ष 1967 से मगनभाई पटेल का एजुकेशनल,इंडस्ट्रियल, सोशल और इकोनॉमिक सेक्टरमे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। एक सफल उद्योगपति होने के बावजूद,वे समाज के गरीब,श्रमजीवी,आदिवासी कम्युनिटी,महिलाए,बच्चे,बुजुर्ग, मनोदिव्यांग एव नेत्रहीन लोगो के लिए आज 84 साल की उम्र में भी वे एक फरिश्ता बनकर काम कर रहे हैं। उन्होंने अब तक हजारों लोगों को नौकरी दिलाने के साथ-साथ माइक्रो एव कॉटेज इंडस्ट्री भी बनाई हैं और कई महिलाओं को रोजगारी दिलाने में मदद की है। उन्होंने अपने फंड से गुजरात राज्य के स्लम एरिया में रहनेवाली गरीब परिवारों की कई महिलाओं को सिलाई मशीनें दी हैं और इन महिलाओं के बच्चों की स्कूल फीस, स्कुलबेग,स्टेशनरी इत्यादि देकर "विद्या दान-महा दान" सूत्र को सच्चे अर्थ में चरितार्थ किया है और इसी वजह से आज समाज के धार्मिक, सामाजिक और पॉलिटिकल सेक्टर के लोग बड़े-बड़े प्रोग्रामो में उन्हें "भामाशाह","भीष्म पितामह","दानवीर कर्ण" जैसे शब्दों से सन्मानित करते है।मगनभाई पटेल अपने फंड से देश के अलग-अलग सभी धार्मिक पंथ एव संप्रदायों के सभी प्रोग्राम की अध्यक्षता करते हैं और मुख्य दानदाता के तौर पर मौजूद रहकर संगठनों के सेवाकार्यो को प्रोत्साहित करते रहते हैं। मगनभाई पटेल केंद्र एव राज्य सरकार की विभिन्न समितियाँ में ऊंचे पदों पर रहकर देश के विकास के लिए कई जरूरी सुझाव दिए हैं, जिन्हें केंद्र एव राज्य सरकारने उसका अमलीकरण भी किया है, जिसके अनगिनत उदाहरण हैं, जिनका विस्तृत में ब्यौरा किया जाये तो एक किताब बन सकती है।इस सामूहिक विवाह समारोह के अध्यक्ष और मुख्य दानदाता मगनभाई पटेलने अपने उदबोधन में कहा कि आज 17वें सामूहिक विवाह और 91वें हनुमानजी मंदिर की स्थापना के अवसर पर मैं स्वामीनारायण ज्ञानपीठ के पुराणी स्वामी केशवचरणदासजी, संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी स्वामी कपिलदासजी,सभी संत-महात्मा,दानदाताए, संस्था के एडमिन हेड डॉ. हितेनभाई उपाध्याय,गणमान्य अतिथि एव सामाजिक कार्यकर्ताओ को इस अवसर पर बधाई देता हूं और 51 आदिवासी बेटियों को उनके नए जीवन के लिए शुभकामनाएं देता हूं।मौजूद आदिवासी जनसमुदाय को संबोधित करते हुए मगनभाई पटेलने कहा कि आज जब 91 में हनुमानजी मंदिर की स्थापना हुई है, तो मैं इतना ही कहूंगा कि हनुमानजी सेवा, समर्पण और शक्ति के प्रतीक हैं। जैसे भगवान शंकर की पूजा से पहले गणेशजी की पूजा की जाती है, वैसे ही भगवान राम की पूजा से पहले हनुमानजी की पूजा की जाती है। किसी दूसरे धर्म की ओर आकर्षित हुए बिना सनातन हिंदू धर्म के प्रतीक हनुमानजी के प्रति समर्पण करने से जीवन की सभी मुश्किलों से लड़ने की ताकत मिलती है। उन्होंने आगे कहा कि चूंकि देश के आदिवासी इलाकों के ज्यादातर लोग नशा एव अंधश्रद्धा के आदी होते हैं, इसलिए ऐसे इलाकों में मंदिरों की जरूरत है ताकि वहा सुबह-शाम आरती एव पूजापाठ होने से ईश्वर के प्रति उनकी श्रद्धा बनी रहे, धार्मिक आस्था से जुड़े रहे,अंधश्रद्धा से दूर रहे और छोटे-बड़े अपराध करने से हिचकिचाएं साथ ही साथ किसी अन्य धर्म के लोग इन आदिवासी लोगो की मजबूरी का फायदा न उठा सके और यह लोग धर्म परिवर्तन से बचे रहे।"आदिवासी जन उत्थान ट्रस्ट" गुजरात के छोटा उदेपुर जिले के कंवत तालुका के भेखड़िया गाँव में स्थित है, जिसमें मगनभाई पटेल इस ट्रस्ट के सभी कार्यक्रमों और परियोजनाओं में मुख्यदाता होते हैं। यहाँ "दुर्गम विशारद आदिवासी कन्या-कुमार छात्रावास" है जिसमें कक्षा 1 से 12 तक कुल 253 बच्चे पढ़ते हैं, जबकि "दिव्यांग निवासी शाला" जिसमें कुल 12 दिव्यांग आदिवासी बच्चे रहते हैं जिनकी रहने और खाने सहित सभी आवश्यकताओं की देखभाल की जाती है। मध्य प्रदेश का जाम्बली गाँव जहाँ 200 आदिवासी बच्चे हैं और थरवता गाँव, जी. अली राजपुर, ता. सोंधवा जहाँ कक्षा 1 से 8 तक के 250 बच्चे हैं जिनकी गुरुकुल प्रणाली के अनुसार देखभाल की जाती है। "कांकरेज गाय प्रजनन विद्यालय" में कांकरेज नस्ल की लगभग 30 गायें हैं इस संस्था को मगनभाई पटेल साहब हर साल 2 लाख रुपये से ज्यादा की आर्थिक मदद करते रहते हैं और दूसरे दानदाताओं के आर्थिक सहयोग से आज यह संस्था आदिवासी परिवारों के विकास के लिए काम कर रही है।स्वामीनारायण ज्ञानपीठ संस्था के बारे में जानकारी देते हुए मगनभाई पटेलने इस समूह लग्न समारोह के अवसर पर कहा कि पूज्य केशवचरणदासजी स्वामी, संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी पूज्य कपिलदासजी स्वामी और संस्था के सभी ट्रस्टी साल 1983 से समाज सेवा का बेहतरीन काम कर रहे हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय की इस संस्था में 25 x 15 का एक मंदिर है जिसमें सनातन हिंदू धर्म के सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं और जहां हर दिन आरती और पूजा होती है, इसलिए मेरा यहां बार-बार आने का मन करता है। आदिवासी लड़कियों के सामूहिक विवाह के साथ-साथ जिस तरह यह संस्था उनकी पढ़ाई-लिखाई से लेकर बिना मां-बाप की अनाथ लड़कियों को हॉस्टल में रखने तक हर तरह की जिम्मेदारी उठाकर काम कर रही है, वह दूसरी सामाजिक संस्थाओं के लिए प्रेरणा है। यह संस्था नेत्रहिन् लड़कियों में छुपी हुई खेल प्रतिभा को उभारने के लिए क्रिकेट टूर्नामेंट भी आयोजित करती है। वापी जैसे इंडस्ट्रियल एरिया में इस संस्था द्वारा नेत्रहिन् लड़कियों की क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन पहली बार किया गया है। यह संस्था समाज सेवा का एक बेहतरीन उदाहरण है जो किसी संप्रदाय तक सीमित नहीं है। साल 1983 से चल रही यह संस्था समाज के उत्थान, धर्म की रक्षा और सनातन हिंदू संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है। यह समाज के गरीब एव जरूरतमंद लोगों की सेवा के लिए काम करती है। शिक्षा और लोगों को रोजगारोन्मुखी बनाने के साथ-साथ जिस तरह से यह संस्था तन, मन और धन से समर्पित और प्रतिबद्ध है,उसे देश की पहली पंक्ति में अंकित किया जा सकता है, जिसमें कोई संदेह नहीं है।इस सामूहिक विवाह समारोह के लिए सरकार की अलग-अलग योजना के बारे में जानकारी देते हुए मगनभाई पटेलने कहा कि आदिवासी परिवार शादी के समय पैसे खर्च करते हैं और बाद में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे फालतू खर्चों को रोकने के लिए, गुजरात सरकारने "सात फेरे सामूहिक विवाह" और "कुंवरबाई का मामेरु" स्कीम लागू की हैं। जिसका मकसद सामूहिक विवाह को बढ़ावा देना और शादियों में होनेवाले खर्च को कम करना है। यह स्कीम साल 1998 से लागू है। जिसका फायदा अनुसूचित जनजाति की लड़कियों और उनके परिवारों को मिलता है। इस स्कीम के लिए, परिवार की सालाना आय ग्रामीण इलाकों में 1,20,000 और शहरी इलाकों में 1,50,000 से कम होनी चाहिए। सामूहिक विवाह में हिस्सा लेनेवाले हर जोड़े को 12,000 रुपये का "नर्मदा श्रीनिधि सर्टिफिकेट" दिया जाता है और ऐसी सामूहिक शादी करानेवाली संस्था सरकार की तरफ से हर जोड़े का 3000 रुपये लेने की हकदार है। आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए गुजरात सरकार की अलग-अलग स्कीमों के बारे में जानकारी देते हुए, मगनभाई पटेलने आगे कहा कि गुजरात सरकार आदिवासि समुदाय के लिए “वनबंधु कल्याण” योजना के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक सुरक्षा की कई योजनाए चला रही है। जिसमें शिक्षा के क्षेत्र में आदिवासी लड़कियों में साक्षरता बढ़ाने के लिए मुफ़्त रहने और खाने की सुविधावाले स्कूलों की योजना है। पोस्ट SSC स्कॉलरशिप 10वीं के बाद की पढ़ाई के लिए स्टूडेंट्स को आर्थिक मदद उपलब्ध है। इसके अलावा, जो आदिवासी स्टूडेंट्स विदेश में हायर स्टडीज के लिए जाना चाहते हैं, उन्हें 4% के मामूली ब्याज पर 15 लाख रुपये तक का लोन दिया जाता है। इसके अलावा, ‘सरस्वती साधना स्कीम’ के तहत 1 से 8वीं तक के स्टूडेंट्स को मुफ़्त यूनिफॉर्म और 9वीं में पढ़नेवाली लड़कियों को मुफ़्त साइकिल भी दी जाती है। मगनभाई पटेलने आगे कहा कि "मानव गरिमा" योजना के तहत, आदिवासी परिवारों के भाइयों को रोजगार के लिए तैयार करने के लिए सिलाई, राजमिस्त्री या बढ़ईगीरी जैसे कामों के लिए मुफ़्त टूल किट दिए जाते हैं। इसके अलावा, पशुपालन के तहत दुधारू जानवरों की खरीद के लिए 50% से 75% तक सब्सिडी दी जाती है, जबकि खेती के सेक्टर में आदिवासी किसानों को खेती के औजार, बीज और ड्रिप सिंचाई के लिए खास सब्सिडी भी दी जाती है। "हलपती आवास योजना" के तहत बेघर खेत मजदूरों और आदिवासियों के लिए पक्के घर बनाने में मदद का प्रावधान है, जबकि फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट के तहत जंगल की जमीन पर खेती करनेवाले आदिवासियों को जमीन के अधिकार (सनद) दिए जाते हैं। गुजरात में 90,000 से ज्यादा आदिवासी परिवारों को फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट के तहत जमीन के अधिकार दिए गए हैं। गुजरात की कुल आबादी में से करीब 14.75% यानि 89.17 लाख आदिवासी लोग हैं। देश के आदिवासी लोग हमारे देश के मूल निवासी हैं। भले ही उनके धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाज अलग हों, लेकिन वे भारतीय हिंदू संस्कृति से जुड़े हुए हैं। वे भौगोलिक रूप से देश के बाहरी इलाकों में रहते हैं और उनकी सामाजिक-आर्थिक हालत बहुत खराब होती है। कई सालों से, जंगलों एव पहाड़ी इलाकों में रहने के कारण आदिवासी आबादी सामान्य विकास प्रक्रिया के दायरे से बाहर रही है। गुजरात राज्य में आदिवासियों के कुल 26 समुदाय (जातियां) हैं, जिनमें गरासिया-भील, धोलीभील, तलाविया, हलपति, धोडिया, राठवा, नायकडा, नायका, गामित, गमता, कथोरी, पाधर, सिद्दी, कोलघा और कोटवालिया जैसे आदिवासी समुदाय शामिल हैं।आदिवासी समाज के शादी के रीति-रिवाजधरमपुर के दूरदराज गाँवो के आदिवासी इलाकों में बहुत ही संवेदनशील परिस्थितियाँ है। इस इलाके में पैसे की तंगी और परंपराओं की वजह से, "बड़ी शादियों" या "पारिवारिक शादियों" का एक अनोखा रिवाज देखा जाता है। पिपरोल और आस-पास के गांवों में लोग ज्यादातर खेती और मजदूरी करके गुजारा करते हैं। आदिवासी रिवाज के मुताबिक, शादी में पूरे गांव को बुलाना और कुछ सामाजिक रीति-रिवाजों पर बहुत ज्यादा खर्च करना जरूरी होता है। जब गरीब परिवारों के पास इतने पैसे नहीं होते, तो वे सिर्फ़ आम रस्मों के जरिए साथ रहने लगते हैं, लेकिन फ़ॉर्मल तौर पर शादी नहीं कर पाते। कई बार ऐसी शादियाँ में युगल के बच्चे और कभी-कभी पोते-पोतियां भी होते हैं। आदिवासी समाज में यह माना जाता है कि जब तक युगल फ़ॉर्मल तौर पर शादी नहीं कर लेते, तब तक वे धार्मिक कार्यो में हिस्सा नहीं ले सकते और न ही एक साथ धार्मिक मंदिरों में जा सकते हैं। जब सरकार या सामाजिक संगठन 'सामूहिक विवाह' ऑर्गनाइज करते हैं, तो ये बूढ़े या अधेड़ उम्र के कपल उसमें शामिल होते हैं। इन शादियों में ऐसा अद्भुत नजारा देखने को मिलता है कि दूल्हा-दुल्हन मंडप में घूम रहे होते हैं और उनके अपने बच्चे या पोते-पोतियां बारात में नाच रहे होते हैं या मंडप में मौजूद होते हैं। पारंपरिक रूप से, आदिवासियों में शादियां 'प्रकृति पूजा' और 'पंच' की मौजूदगी में होती हैं। लेकिन अब ग्रुप मैरिज के जरिए वे हिंदू धर्मग्रंथों और अग्नि की साक्षी में शादी के बंधन में बंध जाते हैं। इससे उन्हें एक लीगल मैरिज सर्टिफिकेट मिलता है, जो सरकारी स्कीमों का फ़ायदा उठाने और उनके बच्चों के डॉक्यूमेंट्स के लिए बहुत जरूरी होता है। धरमपुर तालुका में, कई चैरिटेबल ऑर्गनाइजेशन और एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी ऐसे जोड़ों को ढूंढकर उनकी शादी करवाती हैं, ताकि वे बिना पैसे के कर्ज में पड़े सामाजिक रूप से अपनी जगह बना सकें। यह प्रथा अब इस इलाके में गरीबी से लड़ने का एक बड़ा हथियार बन गई है। आमतौर पर, यहां रहनेवाले आदिवासी समाज में शादी की शुरुआत प्राकृतिक चीजों की पूजा से होती है। शादी के हॉल में मिट्टी का कुंभ (घड़ा) लगाया जाता है, जिसे वे धरती और पानी का प्रतीक मानते हैं। शादी से पहले, कुल देवी और पुरखों को प्रसाद ('खतरू') चढ़ाया जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पुरखों के आशीर्वाद के बिना शादी सफल नहीं हो सकती। शादी के हॉल के बीच में सादड़ या महुदा की लकड़ी से बना एक खंभा लगाया जाता है। आदिवासी संस्कृति में महुदा के पेड़ को बहुत पवित्र माना जाता है। हॉल को आम या आसोपालव के पत्तों से सजाया जाता है, जिसे वे खुशहाली का प्रतीक मानते हैं। यहां दहेज की जगह 'डप्पा' प्रथा है, जो दूसरे समाजों से उलटी है। लड़के को लड़की के पिता को एक तय रकम ('डप्पा') देनी होती है। यह रकम बेटी के पिता को बेटी की परवरिश के लिए दिया जानेवाला सम्मान माना जाता है। अगर लड़का यह रकम नहीं दे पाता है, तो उसे 'खंडलिया' (घरजमाई) बनकर अपने ससुर के घर रहकर भी यह रकम चुकानी पड़ती है। यहां शादी से पहले दूल्हा-दुल्हन को हल्दी और तेल चढ़ाया जाता है। माना जाता है कि इससे नेगेटिव एनर्जी दूर रहती है और वे शुद्ध होते हैं।धरमपुर के कुछ इलाकों में यह भी मान्यता है कि अगर दूल्हा खुद शादी में जाए तो यह अशुभ हो सकता है, इसलिए दूल्हे की तरफ से उसकी बहन (कुंवारी दुल्हन) तलवार लेकर शादी में जाती है और दुल्हन को ले आती है। शादी के दौरान गाए जानेवाले गीतों में भगवान और प्रकृति का वर्णन होता है, जिससे माहौल पवित्र हो जाता है। यहां की कुछ खास धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर शादी तय करते समय सड़क पर कोई खास जानवर या पक्षी दिख जाए, तो इसे भगवान का इशारा मानकर शादी का फैसला किया जाता है। शादी के बाद पूरा गांव एक साथ खाना खाता है, जो सामाजिक एकता और भाईचारे की धार्मिक भावना को दिखाता है। इसलिए, पिपरोल जैसे आदिवासी गांवों में शादी को शास्त्रों के रीति-रिवाजों के बजाय पारंपरिक लोक मान्यताओं और प्रकृति पूजा पर आधारित कार्यक्रम माना जाता है।वलसाड जिले के धरमपुर तालुका में, हर 1000 पुरुषों पर 1007 महिलाओं का रेश्यो है, जो गुजरात के एवरेज से ज्यादा है। यह एक प्राकृतिक रेश्यो है जो हमेशा बना रहता है, जबकि पढ़े-लिखे और श्रीमंत परिवारों में इसके उलट स्थिति है। यहां, हर 1000 पुरुषों पर 800 महिलाओं का रेश्यो है। आज भी, देश में बेटा होने की उम्मीद में लड़कियों का अबॉशन किया जाता है। आज हम सब प्रकृति के विरुद्ध मानव सर्जित इसी असंतुलित परिस्थित का नतीजा भुगत रहे हैं।रोजगारयहां के लोगों का मुख्य काम खेती और पशुपालन है। यहां खेती मौसमी होती है। क्योंकि यह पहाड़ी इलाका है, इसलिए लोग ज्यादातर धान (चावल), नागली और उड़द जैसी फसलें उगाते हैं। क्योंकि यहां खेती बारिश पर निर्भर है, इसलिए मौसम खत्म होने के बाद कई परिवार रोजगार के लिए शहरों में चले जाते हैं। इस गांव के लोग अपनी जमीन पर खेती करने के अलावा, दूसरों के खेतों में मजदूरी करके पैसे कमाते हैं। खेती का मौसम खत्म होने के बाद, कई परिवार रोजगार की तलाश में वापी, वलसाड या धरमपुर जैसे पास के शहरों में चले जाते हैं। वे वापी और वलसाड में अलग-अलग दवा कंपनियों, प्लास्टिक पैकेजिंग कंपनियों और केमिकल कंपनियों में काम करके अपने परिवार का गुजारा करते हैं। कई परिवार घरघाटी की नौकरीया भी करते है। इसके अलावा, सरकार MANREGA जैसी स्कीम के जरिए लोकल लेवल पर गांव के लोगों को रोजगार भी देती है।लाइफ़स्टाइलयहां के लोगों का कल्चर प्रकृति से जुड़ा हुआ होता है। वे ट्रेडिशनल मिट्टी और फूस (नलिया) के घरों में रहते हैं, हालांकि अब पक्के घर भी बन रहे हैं। उनका खाना सादा और पौष्टिक होता है, जिसमें नागली रोटी, उड़द दाल और जंगली सब्जियां शामिल हैं। वे पूर्वजों की पूजा और प्रकृति की सुरक्षा को अपनी जिंदगी का मेइन फोकस मानते हैं। इस गांव में ट्राइबल कल्चर साफ़ दिखता है। यहां वर्ल्ड ट्राइबल डे (9 अगस्त) बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। होली (शिग्मो) और दिवाली जैसे त्योहार ट्रेडिशनल डांस और गानों के साथ मनाए जाते हैं। वे अपने त्योहार 'वाघदेव' और 'हिरवा देव' की पूजा के साथ मनाते हैं और 'तुर' और 'पावरी' जैसे इंस्ट्रूमेंट्स के साथ डांस करते हैं। ये लोग ग्रुप में रहना पसंद करते हैं और सोशल मौकों पर पूरा गांव इकट्ठा होता है क्योंकि वे पूर्वजों की पूजा और प्रकृति की पूजा को अपनी जिंदगी का जरूरी हिस्सा मानते हैं।सड़कें,कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चरवलसाड से धरमपुर तालुका के पिपरोल गांव की सड़क से दूरी करीब 49 से 51 किलोमीटर है। नॉर्मल ट्रैफिक में इस सफर में करीब 1.15 घंटे लगते हैं, जिसमें वलसाड से धरमपुर की दूरी करीब 28 km और धरमपुर से पिपरोल गांव की दूरी करीब 17 किलोमीटर है। क्योंकि इस सड़क पर खतरनाक मोड़ और पहाड़ियां घाटियां हैं, इसलिए गाड़ी चलाते समय सावधान रहना बहुत जरूरी है। पिपरोल गांव पक्की डामर सड़क से जुड़ा है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, गांव के प्राइमरी स्कूल तक पहुंचने के लिए एक पक्की सड़क बनी है जो पूरे साल खुली रहती है। गांव के अंदरूनी हिस्सों में कुछ सड़कें CC रोड (कांक्रीट) की हैं, जबकि गांवों के अंदरूनी हिस्सों में अभी भी कच्ची सड़कें मिलती हैं। गांव के पास मेन बस स्टॉप पिंडवाल है। लोग आने-जाने के लिए ज्यादातर प्राइवेट गाड़ियों या ST का इस्तेमाल करते हैं।आज, धरमपुर तालुका के 160 गांवों में 24 घंटे बिजली है। घरों के अलावा, सरकारी संस्थाने जैसे स्कूल और पंचायत भवन में बिजली के कनेक्शन उपलब्ध हैं। कुछ गांवों में प्राइमरी स्कूल भी हैं, जिनमें 9 पक्के क्लासरूम, पीने के पानी की सुविधा और टॉयलेट जैसी सुविधाएं हैं। इसके अलावा, वहां एक कंप्यूटर लैब भी है। गांव का अपना अलग ग्राम पंचायत भवन है, जहां भारतनेट के तहत इंटरनेट की सुविधा और CSC सेंटर की सुविधाएं उपलब्ध हैं, ताकि गांववाले ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का लाभ उठा सकें। पीने के पानी के लिए मुख्य रूप से हैंडपंप, कुएं और सरकार की "नल से जल" योजना के तहत कनेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। खेती के लिए चेक डैम और बारिश के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। गांव में छोटी-बड़ी बीमारियों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र उपलब्ध है, लेकिन गंभीर इलाज के लिए गांववालों को धरमपुर या वलसाड जैसे शहरों में जाना पड़ता है। गांव में मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी उपलब्ध है, जबकि पंचायत भवन में इंटरनेट की सुविधाएं अभी बन रही हैं।अपनी स्पीच के आखिर में, मगनभाई पटेलने कहा कि आज वलसाड के धरमपुर तालुका के सभी गांवों में 24 घंटे बिजली, पक्की सड़कें,पीने के पानी की सुविधा, आदिवासी बच्चों के लिए अच्छे स्कूल और इंटरनेट की सुविधा मौजूद है, जिसके लिए मैं गुजरात के माननीय मुख्यमंत्री भूपेंद्रभाई पटेल और उनकी टीम को बधाई देता हूं। देश के आदिवासी लोगों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार की कई योजनाएं हैं, लेकिन ये योजनाएं अभी भी इन लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इसलिए, अगर गांव के सरपंच, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, सरकारी अधिकारी एक ब्रिज बनकर इन लोगों तक अलग-अलग योजनाऐ पहुंचाने में मदद करेंगे,तो इसे एक परिणामलक्षी कार्य माना जाएगा। साथ ही, अगर देश के राजनीतिक, सामाजिक नेता, उद्योगपति, अलग-अलग NGO भी सरकार की इन योजनाओं को सही लोगों तक पहुंचाने में मदद करें, तो आदिवासी लोगों की जिंदगी हमेशा खुशहाल रहेगी, जिसमे कोई संदेह नहीं है। इस कार्यक्रम में,स्वामीनारायण ज्ञानपीठ,सल्वाव के मैनेजिंग ट्रस्टी कपिलदासजी स्वामीजीने कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए मगनभाई पटेल साहब का शुक्रिया अदा किया और नए शादीशुदा जोड़े को आशीर्वाद देते हुए, उन्हें अपने जीवन में आपसी सम्मान और विश्वास बनाए रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने नशा-मुक्त जीवन जीने, सनातन धर्म में पक्की आस्था रखने और हनुमानजी के प्रति समर्पित होने का संदेश दिया। उन्होंने यह भावना जाहिर की कि हनुमानजी जिंदगी की हर मुश्किल में ताकत और सुरक्षा देते हैं। इस प्रोग्राम में पुराणी स्वामी केशवचरणदासजी (सलवाव), पुराणी स्वामी ज्ञानजीवनदासजी (नासिक), पूज्य स्वामी लक्ष्मीनारायणदासजी (पारडी), पूज्य स्वामी देवस्वरूपदासजी (अब्रामा), स्वामी ब्रह्म स्वरूपदासजी (वलोटी), स्वामी संत स्वरूपदासजी (कोशिमपाड़ा), स्वामी हरिसेवकदासजी (भिलाड), स्वामी हरिवल्लभदासजी (भिलाड), स्वामी विश्व स्वरूपदासजी (धरमपुर), दिव्य स्वरूप स्वामी (चस्मदवा) और स्वामी माधवप्रकाशदासजी (नासिक) समेत बड़ी संख्या में संतजन मौजूद थे। अमेरिका से आईं दो महिलाए लोरी और डेबो क्रेन भी इस प्रोग्राम में मौजूद थीं। प्रोग्राम को सफल बनाने के लिए बाबूभाई सोडवाडिया, हरीशभाई बोधानी, मनसुखभाई गोंडालिया, जयश्रीबेन बाबूभाई सोडवाडिया, दयाबेन हरीशभाई बोधानी और योगिनीबेन मनसुखभाई गोंडालिया ने भी काफी मेहनत की थी।