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    Vanakkam Poorvottar: Assam में चुनावी संग्राम ने पकड़ा जोर, Himanta जीतेंगे या Gogoi? क्या हैं बड़े चुनावी मुद्दे

    3 hours from now

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    असम विधानसभा चुनाव 2026 की रणभेरी बज चुकी है और सियासी जमीन पर ऐसा घमासान छिडा है, जिसे नजरअंदाज करना किसी के लिए संभव नहीं। भारतीय जनता पार्टी ने 88 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा एक बार फिर जलुकबारी सीट से मैदान में उतरने जा रहे हैं। देखा जाये तो मुख्यमंत्री हिमंता के लिए यह चुनाव केवल सत्ता बचाने का नहीं, बल्कि वर्चस्व स्थापित करने की निर्णायक जंग बन चुका है।इस बार का चुनावी समीकरण बेहद दिलचस्प है। 126 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 64 है और भाजपा ने सहयोगियों के साथ मिलकर पहले ही अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। सीट बंटवारे के तहत भाजपा 89, असम गण परिषद 26 और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट 11 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यह गठबंधन साफ संकेत देता है कि भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता हाथ से जाने नहीं देना चाहती।इसे भी पढ़ें: Assam Election 2024: NDA का सीट फार्मूला तय, BJP 89 सीटों पर लड़ेगी, जानें AGP को क्या मिला?सबसे चौंकाने वाला कदम यह रहा कि पार्टी ने 11 मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया और केवल 5 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया। यह फैसला जहां बदलाव का संदेश देता है, वहीं सवाल भी खड़े करता है। क्या यह रणनीतिक दांव है या अंदरूनी असंतोष का परिणाम?दूसरी तरफ कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ मैदान में है। गौरव गोगोई के नेतृत्व में पार्टी 65 सीटों पर उम्मीदवार उतार चुकी है और भाजपा को सीधी चुनौती देने की कोशिश में है। लेकिन असली खेल केवल भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं है। बदरुद्दीन अजमल, अखिल गोगोई और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कई सीटों पर चुनावी गणित बिगाड़ सकता है।इस चुनाव का सबसे विस्फोटक मुद्दा है घुसपैठ और नागरिकता। एनआरसी और सीएए जैसे मुद्दे एक बार फिर जनता के बीच उबाल ला रहे हैं। भाजपा खुद को सख्त रक्षक के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष आरोप लगा रहा है कि निर्दोष लोगों को परेशान किया जा रहा है। खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह मुद्दा चुनावी दिशा बदल सकता है।भूमि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी आग में घी डालने का काम कर रही है। सरकार का दावा है कि उसने जंगल और सरकारी जमीन को मुक्त कराया, लेकिन विपक्ष इसे मानवीय संकट बता रहा है। हजारों लोग बेघर हुए, रोजी रोटी छिन गई और अब यही दर्द वोट में तब्दील हो सकता है।बाल विवाह के खिलाफ कार्रवाई भी सियासत का हथियार बन गई है। सरकार इसे सामाजिक सुधार बता रही है, जबकि विपक्ष इसे एक खास समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश करार दे रहा है। यह मुद्दा ग्रामीण इलाकों में खास असर डाल सकता है।विकास के नाम पर भी जबरदस्त टकराव है। भाजपा सड़कों, रेल, हवाई अड्डों और बड़े निवेश समझौतों का हवाला दे रही है। टाटा समूह की परियोजना से लेकर असम शिखर सम्मेलन तक को उपलब्धि बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष कह रहा है कि विकास केवल चुनिंदा इलाकों तक सीमित है और इसके लिए स्थानीय लोगों की जमीन छीनी गई।महिलाओं के लिए योजनाएं, हर महीने आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसर भाजपा के प्रमुख चुनावी हथियार हैं। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अपराध कम नहीं हुए और योजनाओं का लाभ बराबर नहीं मिला। युवाओं के लिए 1.6 लाख नौकरियों का दावा भी चुनावी बहस के केंद्र में है। हम आपको यह भी बता दें कि चाय बागान श्रमिक, जो कभी कांग्रेस के साथ थे, अब भाजपा के साथ नजर आ रहे हैं। यह वोट बैंक चुनाव का रुख बदल सकता है।एक और भावनात्मक मुद्दा है प्रसिद्ध गायक जुबिन गर्ग की मौत। विपक्ष इसे न्याय का सवाल बना रहा है, जबकि सरकार जांच और गिरफ्तारी का हवाला दे रही है। यह मुद्दा खासकर युवा मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है।मतदाताओं की बात करें तो इस बार करीब 2.5 करोड़ मतदाता चुनाव में हिस्सा लेंगे। पुरुष और महिला मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है, जो इस चुनाव को और दिलचस्प बनाती है। पिछले चुनाव में 82 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था और इस बार भी भारी भागीदारी की उम्मीद है।देखा जाये तो असम में राजनीतिक समीकरण साफ है लेकिन मुकाबला आसान नहीं है। भाजपा के पास मजबूत संगठन और गठबंधन है, जबकि विपक्ष मुद्दों के सहारे वापसी की कोशिश में है। हर सीट पर संघर्ष है, हर वोट की कीमत है। हम आपको बता दें कि राज्य में 9 अप्रैल को मतदान होगा और 4 मई को नतीजे आएंगे। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या भाजपा अपनी सत्ता बचा पाएगी या असम की जनता इस बार नया फैसला सुनाएगी?बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि यह चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का नहीं, बल्कि असम की पहचान, जमीन, नागरिकता और भविष्य की दिशा तय करने का चुनाव है। और यही वजह है कि यह मुकाबला हर दिन और भी ज्यादा तीखा होता जा रहा है।
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