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    वर्ल्ड अपडेट्स:यूक्रेन के ड्रोन हमले के बाद मॉस्को में काली बारिश हुई, सड़कें और गाड़ियां काली पड़ीं

    16 hours ago

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    रूस की राजधानी मॉस्को और आसपास के कई इलाकों में लोगों ने काली बारिश (ब्लैक रेन) होने की शिकायत की। स्थानीय लोगों के मुताबिक, बारिश के साथ कालिख और तेल जैसे चीजें गिर रही थीं, जिससे गाड़ियां, सड़कें और कपड़े काले रंग से ढक गए। दरअसल, यूक्रेन ने गुरुवार को रूस की राजधानी मॉस्को पर अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला किया था। 1000 से ज्यादा ड्रोन मॉस्को की ओर भेजे गए, जिनमें से एक ने शहर की मॉस्को ऑयल रिफाइनरी को निशाना बनाया। हमले के बाद रिफाइनरी में भीषण आग लग गई। यह रिफाइनरी रूस की सरकारी तेल कंपनी गजप्रोम नेफ्ट संचालित करती है और मॉस्को की करीब 40% पेट्रोल तथा 50% डीजल जरूरत पूरी करती है। हमले के बाद पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ी खबरें… चीन ने पाकिस्तान के साथ 8 पनडुब्बियों का सौदा किया था , 11 साल बाद मिली पहली पनडुब्बी पाकिस्तान ने चीन में निर्मित अपनी नई हैंगोर क्लास पनडुब्बी को शामिल किया है। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश के बनने के बाद से यह पहली बार है जब पाकिस्तान बंगाल की खाड़ी में अपनी नौसैनिक उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है। चीन के साथ पनडुब्बी सौदे पर हस्ताक्षर करने के एक दशक से ज्यादा समय बाद पाकिस्तान को पहली पनडुब्बी मिली है। यह सौदा पाकिस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा अधिग्रहण माना जाता है। अप्रैल 2015 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान पाकिस्तान और चीन के बीच 8 हैंगोर-क्लास पनडुब्बियों की खरीद का समझौता हुआ था। समझौते के अनुसार, इनमें से 4 पनडुब्बियां चीन में बननी थीं और 2022-23 तक पाकिस्तान को सौंप दी जानी थीं। बाकी 4 पनडुब्बियों को कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स (KSEW) में 2028 तक असेंबल किया जाना था। हालांकि, 2026 तक पाकिस्तान नौसेना में सिर्फ एक पनडुब्बी ही शामिल हो पाई है। चीन में बनने वाली बाकी तीन पनडुब्बियां- पीएनएस गाजी, पीएनएस शुशुक और पीएनएस मंग्रो लॉन्च हो चुकी हैं और फिलहाल सी ट्रायल से गुजर रही हैं। यानी चीन में बनी पहली चार पनडुब्बियों को तय समय सीमा तक पाकिस्तान को सौंपने का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि सभी 8 पनडुब्बियां 2028 से 2030 के बीच पाकिस्तान को मिलेंगी। पनडुब्बी निर्माण के लिए कराची शिपयार्ड में बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। इसके तहत नया शिप लिफ्ट और ट्रांसफर सिस्टम भी लगाया गया है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि किसी नई पनडुब्बी श्रेणी का निर्माण बेहद जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। पाकिस्तान इससे पहले अगोस्ता 90बी श्रेणी की पनडुब्बी PNS हमजा का निर्माण कर चुका है, जिसे 2008 में नौसेना में शामिल किया गया था। लेकिन हैंगोर-क्लास परियोजना आकार, लागत और तकनीक तीनों मामलों में उससे कहीं बड़ी है। हैंगोर-क्लास पनडुब्बी कार्यक्रम की अनुमानित लागत 4 से 5 अरब डॉलर (करीब 34 से 43 हजार करोड़ रुपए) है। यही वजह है कि इसे पाकिस्तान के इतिहास का सबसे महंगा नौसैनिक कार्यक्रम माना जाता है। UN में भारत ने पाकिस्तान को फ्रेंकेंस्टाइन स्टेट कहा; खुद पाले आतंकियों के निशाने पर आने पर हैरान होता है संयुक्त राष्ट्र में भारत ने पाकिस्तान को आतंकवाद का संरक्षक बताते हुए उस पर तीखा हमला किया। भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान को “फ्रेंकेंस्टाइन स्टेट” करार देते हुए कहा कि वह आतंकियों को शरण, प्रशिक्षण और समर्थन देता है, फिर जब वही आतंकी उसके खिलाफ होते हैं तो वह खुद को आतंकवाद का पीड़ित बताता है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाने के बाद भारत ने राइट टु रिप्लाई का इस्तेमाल किया। अनुपमा सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और रहेगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में एकमात्र अनसुलझा मुद्दा पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों की वापसी है। भारत ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में हालात पर भी सवाल उठाए। सिंह ने कहा कि रावलकोट समेत विभिन्न क्षेत्रों में नागरिकों की मौत और दमनकारी कार्रवाई उस व्यवस्था का नतीजा है, जो जबरन कब्जे और दमन पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि दशकों से सैन्य कब्जे, जनसांख्यिकीय बदलाव और बुनियादी अधिकारों के हनन ने हालात को गंभीर बना दिया है। भारतीय राजनयिक ने कहा कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री स्वयं आतंकियों को शरण देने और प्रशिक्षण देने की बात स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद को राज्य की नीति के तौर पर इस्तेमाल करता है, लेकिन साथ ही खुद को आतंकवाद का शिकार भी बताता है। सिंधु जल संधि पर भारत का पक्ष रखते हुए सिंह ने कहा कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश सहयोग और सद्भावना पर आधारित व्यवस्थाओं के लाभ की अपेक्षा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि 1960 में हुई संधि आज की परिस्थितियों में पुरानी हो चुकी है और बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप इसकी समीक्षा जरूरी है।
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