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    वाराणसी की ई-ऑटो-दीदी सीता दे रहीं महिला सशक्तिकरण का पैगाम:बोलीं - रोजगार मिला पर अब छत चाहिए, टीन शेड में रहने को मजबूर

    1 hour ago

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    ‘सरकार ने मुझे ई-ऑटो दीदी बनाया है। मैंने कई ब्लॉक में अभी तक ऑटो दीदियों को ट्रेनिंग भी दी है। सीएम ने हमसे बात की तो हम घबरा गए क्योंकि हम उन्हें जब तक नमस्ते करते उन्होंने हमें नमस्ते कर दिया। आज उनकी वजह से हमारे बच्चे पढ़ने जा रहे हैं। लेकिन हमारी सरकार से और मुख्यमंत्री जी से मांग है कि जिस तरह से उन्होंने हमें रोजगार दिया है। हमें और हमारे बच्चों को एक घर भी दे दें। हम अपने बच्चों के साथ तीन शेड में रहते हैं। गरीबों का आवास आया था पर वो प्रधान ने कटवा दिया।’ ये कहना है वाराणसी के रोहनिया थानाक्षेत्र के गोविंदपुर गांव की रहने वाली सीता देवी का; सीता देवी NRLM (National Rural Livelihood Mission) के तहत वाराणसी जिले की पहली ई-रिक्शा दीदी हैं। सरकार ने उन्हें ट्रेनिंग के बाद सब्सिडी पर ई-ऑटो दिलवाया और अब वो रोजाना 600 से 1000 रुपए कमा कर अपने बच्चों और परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं। शुरुआत में उन्होंने अपने मोहल्ले और सड़क पर बहुत कुछ सहना भी पड़ा। विश्व महिला दिवस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीता देवी से ऑनलाइन कांफ्रेंसिंग के जरिए बात की और उनकी सफलता की कहानी सबको बताई। ऐसे में दैनिक भास्कर ने जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर गोविंदपुर पहुंचकर सीता देवी से बात की और उनकी सफलता और कठिनाइयों के बारे में जाना। पढ़िए रिपोर्ट… सबसे पहले जानते हैं कौन हैं सीता देवी और कैसे बनी वो ई-ऑटो दीदी… हम जब घर पहुंचे तो सीता ई रिक्शा लेकर बाजार गयी हुईं थीं । यहां से तुरंत लौटकर आयीं और हमें बैठने के लिए कुर्सी लगाई। हमने उन्हें बैठने को कहा तो बोलीं सिर्फ दो कुर्सियां हैं । फिर हम भी खड़े हो गए और उनके ऑटो में ही बैठकर उन्हें बात की। इस दौरान उन्होंने अपनी समस्या और सफलता की कहानी सुनाई। साल 2014 में हुई शादी सीता देवी ने बताया - मेरा घर कपसेठी थाने के मधुमखिया गांव में है। साल 2014 में रोहनिया थानाक्षेत्र के सचिन राय जो टाइल्स के मिस्त्री हैं। उनसे शादी हुई। शादी के अगले ही साल मैंने ग्रामीण इलाके में चलने वाले समूह में बचत खाता खोल लिया। सीता ग्रेजुएट हैं। उन्होंने बताया शुरुआत में बच्चों की पढ़ाई। मेरी दवाई आदि की दिक्कत होने लगी। तो समूह से अच्छे से जुड़ गयी और काम करने लगी। समूह में काम करने से हुआ फायदा सीता ने बताया - कुछ ही दिन में लोग मुझे समूह दीदी के नाम से जानने लगे थे। मै भी लगन से काम कर रही थी। जनवरी 2025 मेंNRLM की योजना के तहत तीन दिवसीय ट्रेनिंग प्रोग्राम ई-ऑटो रिक्शा का आया था। हमारी जो समूह संचालिका थीं। उनके पास भी यह योजना आयी तो उन्होंने मुझे भी इस ट्रेनिंग के लिए सेलेक्ट किया। पहले डर लगा पर अपने परिवार के लिए मैंने हां कर दी । मिर्जापुर की आरती दीदी ने दी तीन दिन की ट्रेनिंग सीता ने बताया - जनवरी 2025 में मिर्जापुर से आयीं ई-ऑटो दीदी आरती ने हमें और अन्य महिलाओं को जगतपुर डिग्री कालेज के मैदान पर तीन दिवसीय ट्रेनिंग दी। इसमें हमें सभी बारीकियां समझाई गयी और साथ ही हमें इसे चलकर होने वाली आमदनी के बारे में भी बताया गया। इसके बाद हम लोग घर लौट आए। महिला दिवस पर बुलाया गया लखनऊ 8 मार्च 2025 को लखनऊ में एक कार्यक्रम हुआ। सीता ने बताया - इस कार्यक्रम में की ई-ऑटो दीदी पहुंची थीं। यहां डिप्टी सीएम ने हम सभी दीदियों को हरी झंडी दिखाई और हम सभी को वहां नया नाम ई-ऑटो दीदी मिल गया। वहां थोड़ी दूर ऑटो चलाया फिर उसे छोड़कर हम वापस आ गए। बताया गया था कि बनारस में आप को ऑटो मिल जाएगा। पति के साथ ले आयी ऑटो सीता ने बताया - 10 मार्च को मै और पति रोहनिया में महिंद्रा की एजेंसी पहुंचे और सरकार द्वारा मिली इस योजना के अंतर्गत हमने ऑटो निकाला। जिसे लेकर मै बढ़ी पर पुल पर मेरे पति ने मुझे संभाला। लेकर आ तो गयी घर पर उसे बाहर लेकर निकलने में लाज और शर्म लग रही थी। अब जानिए कैसे ई-ऑटो ने बदली सीता की जिंदगी ? और अभी क्या है कमी?… पैसे नहीं थे तो निकली और 300 कमाए सीता बताती हैं - एक दिन घर में बच्चों के खाने के लिए कुछ नहीं था। ऐसे में मैंने ठान लिया कि आज ऑटो लेकर निकलूंगी। मेरी तबियत भी नहीं ठीक थी पर घर से निकल गई। रोहनिया पहुंची और वहां से सवारी भरी, सवारी को उसके गंतव्य पर छोड़ा तो मुझे 300 रुपए मिले। उसे लेकर घर पहुंचीतो खुशी का ठिकाना नहीं था। पहली कमाई थी जिससे मैंने अपने बच्चों को खाना खिलाया था। लोग कस्ते थे फब्तियां सीता ने बताया - शुरू-शुरू में बहुत दिक्कत होती थी। गांव से लेकर ऑटो स्टैंड तक लोग फब्तियां कस्ते थे और कई ऐसे कमेंट करते थे जिन्हे अपनी जुबान से नहीं कह सकती। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। अब रोजाना ऑटो लेकर निकलती हूं लेकिन दिन में सिर्फ 3 से 4 घंटा ही चला पाती हूं। भरनी होती है 6 हजार महीना किस्त सीता ने बताया - ऑटो हमें सरकार ने सब्सिडी पर दिलाया है। लेकिन इसकी क़िस्त अभी भी हम पे कर रहे हैं। हर महीने हमें 6 हजार रुपए इसकी किस्त जमा करनी होती है। लेकिन अब हमें सोचना नहीं कि आज क्या बनना है। यदि पनीर खाने का मन है तो शाम में पनीर ही बनेगा। पहले ऐसा नहीं था। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे सीता और सचिन राय के दो बच्चे है। लड़का अंश राय और लड़की शिवांगी राय। सचिन राय ने बताया - सीता के ऑटो चलाने से पहले लोग ताना मारते थे। पर मैंने कभी जवाब नहीं दिया। आज सभी को सीता की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा हमारे दोनों बच्चे जिन्हे चाह कर भी हम स्कूल नहीं भेज पा रहे थे वो आज अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं। अब जानिए मुख्यमंत्री से क्या की सीता ने डिमांड? प्रधान क्यों कर रहा परेशान ?… आवास की अभी भी आवश्यकता सीता ने कहा - हम अब ई-ऑटो दीदी बन गए हैं। लेकिन आज भी बरसात में हमें घर में डर लगता है क्योंकि ईंटों को एक के ऊपर एक रखकर दीवार का पर्दा बनाया गया है और उसी पर तीन शेड डाला गया है। प्रधान से मकान के लिए कहा गया तो आवास आया भी पर ऑडिटर ने यह कहते हुए काट दिया कि पक्का मकान है जबकि ऐसा नहीं है। सीएम सर से निवेदन है कि वो हमें एक आवास भी दिलवा दें। ---------------------------- ये खबर भी पढ़ें… चलती स्कूल बस की टूटी फर्श से गिरी बच्ची, मौत:मासूम पर चढ़ा पहिया, मां-दादी लाश देखकर बेहोश; आगरा में स्कूल वालों ने बस छिपाई आगरा में बुधवार को 9 साल की छात्रा चलती स्कूल बस से नीचे गिर गई। उसके ऊपर बस का पहिया चढ़ गया। बच्चों ने शोर मचाया तो ड्राइवर ने बस रोकी। छात्रा को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। पढ़ें पूरी खबर….
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