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    यूपी में बीमारी बांट रहा बोतलबंद पानी:जांच में 80% प्लांट फेल, 119 में मिले मल-मूत्र के बैक्टीरिया

    2 hours ago

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    अगर आप बोतल बंद पानी के आदी हैं और उस पर भरोसा करते हैं, तो यह खबर आपके लिए है। उत्तर प्रदेश में चल रही जिन वाटर बाटलिंग यूनिट की जांच की गई, उनमें से 80 प्रतिशत यूनिट मानकों पर खरी नहीं उतरीं। कहीं रख-रखाव में कमी मिली, तो कहीं पानी में माइक्रोज (बैक्टीरिया, वायरस, फंगस) में ग्रोथ पाई गई है। कहीं पानी में सक्रेशिया कोलिव और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया है, जो मल-मूत्र होने के संकेत है। एफएसडीए ने पूरे प्रदेश में अभियान चलाकर दूसरे प्रदेशों की टीमें बुलाकर जांच कराई, जिसमें ये खुलासा हुआ है। यूपी में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर और मिनरल वॉटर प्लांट की कितनी यूनिट रजिस्टर हैं? कितनी यूनिट काम कर रही हैं? कितने की जांच की गई? कितने में कमियां पाई गईं, क्या-क्या कमियां पाई गईं और कितने प्लांट बंद कराए गए? इस खबर में इसके बारे में विस्तार से जानेंगे… दरअसल, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की आयुक्त रोशन जैकब ने पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर प्लांट की जांच के लिए एक विशेष अभियान चलाया। इसके तहत एक मंडल की टीमों ने दूसरे मंडलों में जाकर जांच की। जांच के दौरान बड़े पैमाने पर खामियां पाई गईं। 164 प्लांट का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया और 104 यूनिट को सुधार के लिए नोटिस भेजा गया। संयुक्त खाद्य आयुक्त हरिशंकर सिंह ने दैनिक भास्कर को बताया कि पैकेज्ड वॉटर को हाई रिस्क फूड कैटेगरी में डाला गया है। इसी के चलते एफएसडीए कमिश्नर रोशन जैकब ने पूरे प्रदेश में अभियान चलाए जाने का निर्णय लिया। इसके बाद प्रदेश स्तरीय विशेष अभियान चलाकर पूरे प्रदेश में चल रहे पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर और मिनरल वॉटर प्लांट की जांच कराई गई। बड़ी संख्या में सैंपल कलेक्ट कर जांच के लिए भेजा गया। जांच के दौरान कई तरह की कमियां पाई गईं। इसमें कुछ जगहों पर माइक्रोज ग्रोथ पाई गईं, कहीं मिनरल अधिक मिले। उन्होंने बताया कि यूपी में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर के कुल 850 यूनिट का लाइसेंस है। इनमें से 560 की जांच की गई। 397 प्लांट से पानी के नमूने लिए गए और उनकी जांच कराई गई। 194 प्लांट का स्ट्रैंडर्ड लो पाया गया। 119 में स्क्रेशिया कोलीव और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया। पानी में इसके कण की मौजूदगी मल-मूत्र होने की ओर इशारा करते हैं। हरिशंकर सिंह ने बताया- ये बैक्टीरिया बीमारियों का कारण बनते हैं। इन्हें तत्काल बंद करा दिया गया है। कुल 164 यूनिट या प्लांट के लाइसेंस सस्पेंड कर दिए गए हैं। केवल 84 यूनिट ऐसी थीं, जो सभी मानकों पर खरी उतरीं। यानी 397 में करीब 79 प्रतिशत यूनिट मानकों पर खरी नहीं उतरीं। हरिशंकर सिंह बताते हैं- पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर की यूनिट लगाने के लिए पहले ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड यानी बीआईएस सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता था। क्योंकि पानी फूड कैटेगरी में शामिल है। इसलिए इसके लिए एफएसएसएआई सर्टिफिकेट भी जरूरी था। लाइसेंस देने से पहले भारतीय मानक ब्यूरो (बीएसआई) प्लांट का इंस्पेक्शन करती थी। सोर्स वॉटर की जांच होती थी, प्रोसेसिंग की जांच होती थी। प्लांट चलाने वाली कंपनी के पास अपनी लैब है या नहीं, इसकी जांच होती थी। उसके बाद ही काम शुरू करने के लिए लाइसेंस जारी किया जाता था। 17 अक्टूबर, 2024 से बीएसआई सर्टिफिकेट की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया। एफएसएसएआई लाइसेंस को अनिवार्य कर दिया गया। इसके तहत नियमित टेस्टिंग कराना जरूरी है। इसमें हर महीने माइक्रोबायोलॉजिकल जांच, हर तीन महीने पर केमिकल जांच और हर 6 महीने पर सोर्स वॉटर टेस्टिंग कराना अनिवार्य है। कोलीफॉर्म बैक्टीरिया अधिक होने पर हो सकती हैं बीमारियां लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में डॉक्टर ए.क्यू. जिलानी बताते हैं कि वैसे तो आमतौर पर पानी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया जाना सामान्य बात है। लेकिन, मात्रा से अधिक होने पर ये कई बीमारियों को जन्म देता है। इन बैक्टीरिया से पेट या उसके नीचे के हिस्से में अलग-अलग बीमारी हो जाती है। लखनऊ में अपर आयुक्त खाद्य विजय प्रताप सिंह बताते हैं कि पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर या मिनरल वाटर प्लांट के लिए लाइसेंस हासिल करने की एक लंबी प्रक्रिया है। इसके लिए एफएसएसएआई की वेबसाइट foscos पर लाइसेंस के लिए अप्लाई करना होता है। वहां दिए गए निर्देशों का पालन करना होता है। ----------------------- ये खबर भी पढ़ें… E हटाकर A जोड़ो, पानी से खूब कमाओ:यूपी में ब्रांडेड पानी के नकली नाम, सेल्समैन बोला- बेचो...कोई नहीं देखता स्टिकर चेंज हो जाएगा बस… पानी सबका सेम होता है। आप देख लीजिए… सेम है। एक्वा अमित में एकदम किनले जैसी बोतल है। ये कहना है ललित कश्यप का...। वह ब्रांडेड वाटर के नाम पर मिलते–जुलते नाम की बोतल की पैकिंग कर नकली पानी बेचता है। यूपी में पानी की बोतल में धोखे की पैकिंग का धंधा खुलेआम चल रहा है। इसकी सबसे पहली वजह है– मुनाफाखोरी। पढ़ें पूरी खबर
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