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    Yes Milord: माता-पिता IAS फिर भी बच्चों को क्यों चाहिए आरक्षण? OBC Creamy Layer पर सुनवाई के दौरान SC में उठ गया सवाल

    34 minutes from now

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    जब दोनों पेरेंट्स आईएएस हैं फिर भी रिजर्वेशन क्यों लेना? आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने आज एक बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हमारे देश में आरक्षण के दुरुपयोग को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं और इस पर लगातार बहस होती रहती है। कुछ लोग आरक्षण के पक्ष में हैं। कुछ लोग आरक्षण के खिलाफ हैं। कुछ लोग यह कहते हैं कि आरक्षण का दुरुपयोग हो रहा है। अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि अगर कोई परिवार आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक और सामाजिक रूप से अब प्रगति कर चुका है। आर्थिक रूप से अब वह सक्षम हो चुका है तो क्या उसकी अगली पीढ़ी को भी आरक्षण मिलना चाहिए? यानी क्या आरक्षण का लाभ पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे ही मिलते रहना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट में भी एक मामले की सुनवाई के दौरान ये मामला उठा है। इसे भी पढ़ें: आरक्षण क्यों चाहिए? IAS अफसरों के बच्चों को SC का तीखा सवाल, Reservation पर बहस तेजसुप्रीम कोर्ट का जो 22 मई को पिछड़े समुदाय यानी कि ओबीसीज में क्रीमी लेयर को आरक्षण का लाभ देने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया। क्या है पूरा मामला? सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या ऑब्जरवेशन दिए? एक-एक करके समझते हैं। क्या है पूरा मामला?सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण के 'क्रीमी लेयर' सिद्धांत को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि जिन परिवारों ने आरक्षण के जरिए शिक्षा और आर्थिक उन्नति हासिल कर ली है, उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ लगातार क्यों मिलता रहे। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण से सामाजिक गतिशीलता आती है, ऐसे में अगर माता-पिता अच्छे पदों पर हैं और अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं तो बच्चों के लिए फिर से आरक्षण मांगने का औचित्य क्या है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं तो बच्चों को आरक्षण क्यों चाहिए? इससे हम कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे। जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की बेंच ने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर में आने के आधार पर ओबीसी आरक्षण से बाहर रखने के निर्णय को बरकरार रखा था। ओबीसीज में क्रीमी लेयर को आरक्षण का लाभमामला कर्नाटक के कुरुबा समुदाय से जुड़े एक उम्मीदवार का है, जो राज्य की पिछड़ा वर्ग सूची में श्रेणी II (A) में आता है। उम्मीदवार का चयन कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड में असिस्टेंट इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल) पद के लिए रिजर्व कैटिगरी के तहत हुआ था, लेकिन जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने उसे जाति वैधता प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि उम्मीदवार 'क्रीमी लेयर' में आता है। अधिकारियों के अनुसार उम्मीदवार के परिवार की वार्षिक आय लगभग 19.48 लाख रुपये आंकी गई। दर्ज किया कि माता-पिता राज्य सरकार के कर्मचारी हैं और उनकी संयुक्त आय निर्धारित क्रीमी लेयर सीमा से अधिक है।इसे भी पढ़ें: Suvendu Adhikari का 'एक्शन मोड', सुब्रत गुप्ता बने सलाहकार, CMO से 16 अधिकारियों का तबादलाआधार वेतन नहीं होना चाहिएयाचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शशांक रत्नू ने दलील दी कि सरकारी कर्मचारियों के मामले में क्रीमी लेयर तय करने का आधार वेतन नहीं होनी चाहिए, बल्कि माता-पिता की सेवा-स्थिति जैसे ग्रुप A या ग्रुप B निर्णायक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर सैलरी को ही मुख्य मानक बना दिया गया तो ड्राइवर, चपरासी, क्लर्क जैसे निचले पदों पर कार्यरत कर्मचारी भी आरक्षण से बाहर हो सकते है। यह विवाद कर्नाटक हाई कोर्ट के डिविजन बेच के फैसले से जुड़ा है, जिसने सिंगल जज के उस आदेश को पलट दिया था जिसमे माता-पिता की वेतन आय को क्रीमी लेयर निर्धारण से बाहर मानते हुए उम्मीदवार के पक्ष में जाति वैधता प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था।बराबर मिले लाभ आज समाज में किसी की हैसियत बहुत कुछ उसकी आर्थिक स्थिति से तय होती है। बेहतर शिक्षा, परवरिश, रहन-सहन और आगे बढ़ने के मौके आर्थिक मजबूती से कई राहें खुल जाती हैं। शीर्ष अदालत की टिप्पणी का अर्थ यह है कि अगर किसी ने आरक्षण के जरिये यह सब हासिल कर लिया, तो उसे अलग हटकर पीछे वालों के लिए रास्ता दे देना चाहिए। वास्तविक समानता इसी तरह से आ सकती है, वरना आरक्षित वर्गों के भीतर ही असमानता की खाई बढ़ने का खतरा है। 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी जजमेंट से क्रीमी लेयर अस्तित्व में आया था। यह मुद्दा जितना जरूरी है, उतना ही संवेदनशील भी। इसी के चलते राजनीतिक दल इस पर बहस करने से बचते रहे हैं, लेकिन बात न करने से मामला बस टलेगा, खत्म नहीं होगा। शीर्ष अदालत ने संतुलन की बात की है। यह संतुलन है आरक्षण की जरूरत और सामाजिक वास्तविकता के बीच।क्रीमी लेयर क्या होता हैइस केस में बार-बार एक शब्द का जिक्र हो रहा है और वो है क्रीमी लेयर। क्रीमी लेयर के नियमों के मुताबिक ओबीसी आरक्षण का फायदा उसी को मिलेगा जिसके परिवार की आमदनी 8 लाख से कम है। यानी अगर किसी ओबीसी परिवार की सालाना आमदनी ₹8 लाख से ज्यादा है तो उनके बच्चों को ओबीसी आरक्षण का फायदा नहीं मिलता। पैसे के अलावा अगर माता-पिता सरकारी नौकरी में हैं तो उनके पद के हिसाब से भी क्रीमी लेयर तय की जाती है। कई राज्यों में क्रीमी लेयर को लेकर अलग-अलग नियम है। क्रीमी लेयर की यह व्यवस्थाएं इसलिए की गई ताकि जो लोग आरक्षण की वजह से पहले ही तरक्की कर चुके हैं। पहले ही आर्थिक रूप से संपन्न हो चुके हैं। उनकी जगह अब दूसरे जरूरतमंद लोगों को आरक्षण की सुविधा दी जाए। जिन्हें इसका वाकई में इसकी जरूरत है और इससे आरक्षण का फायदा ज्यादा से ज्यादा लोगों को मिल पाएगा। उन लोगों को मिल पाएगा जिन्हें वाकई में इसकी आवश्यकता है। इस केस में जिसने याचिका दायर की थी उसके परिवार के सालाना आमदनी जो है वो लगभग ₹1.5 लाख है। जो युवा आया है सुप्रीम कोर्ट में उसके परिवार की आमदनी है सालाना ₹19 लाख और ₹8 लाख की तय सीमा से यह काफी आगे है। काफी ऊपर है। आपने देख लिया। जांच में यह भी पता चला कि इस युवा के माता-पिता दोनों ही सरकारी नौकरियों में हैं। सरकारी कर्मचारी हैं। इस समय केंद्र सरकार ने आरक्षण को लेकर जो सीमा तय की है उसके मुताबिक शेड्यूल कास्ट के लिए के लिए 15% शेड्यूल ट्राइब्स के लिए 7.5% अदर बैकवर्ड क्लासेस यानी ओबीसी जो क्रीमी लेयर के दायरे में नहीं आते उनके लिए 27% और जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं उनके लिए 10% अलग से आरक्षण की व्यवस्था है। यानी केंद्र सरकार की ओर से ही कुल मिलाकर 5.59% आरक्षण हमारे देश में लोगों को दिया जा रहा है। अलग-अलग कोटे के हिसाब से आपके सामने ब्रेकअप है। लेकिन कई राज्यों में आरक्षण की सीमाएं और श्रेणियां अलग-अलग हैं। यह राज्यों पर निर्भर करता है और आपने देखा होगा तुष्टीरण के लिए, चुनाव जीतने के लिए, किसी खास वर्ग को खुश करने के लिए राज्य सरकारें अक्सर जो रिजर्वेशन को लेकर अपने फैसले बदलती रहती हैं। 
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