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    40 के बाद एक बार आंखों की जांच है जरूरी:शुगर-बीपी की तरह अब 'ग्लूकोमा' की स्क्रीनिंग को भी बनाएं आदत

    12 hours ago

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    आंखों की रोशनी कब धीरे-धीरे कम होकर पूरी तरह खत्म हो जाए और आपको पता भी न चले, इसे ही मेडिकल की भाषा में ग्लूकोमा या 'काला मोतिया' कहते हैं। शहर के नेत्र रोग विशेषज्ञों ने लोगों को जागरूक करते हुए कहा,कि यह बीमारी एक ऐसे चोर की तरह है जो चुपचाप आंखों की रोशनी खा जाती है और सबसे डरावनी बात यह है कि एक बार गई हुई रोशनी को दुनिया का कोई भी डॉक्टर वापस नहीं ला सकता। मोतियाबिंद और ग्लूकोमा का अंतर समझना जरूरी: अक्सर लोग मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) और काला मोतिया (गुलकोमा) के बीच के अंतर को नहीं समझ पाते। मोतियाबिंद में नजर धीरे-धीरे धुंधली होती है और ऑपरेशन के बाद रोशनी वापस आ जाती है। लेकिन ग्लूकोमा में ऐसा नहीं है। डॉ. शरद बाजपेई ने कहा कि,कई बार मरीज इस वहम में बैठे रहते हैं कि उनका मोतियाबिंद 'पक' रहा है, जबकि असल में ग्लूकोमा उनकी आंखों की नसें सुखा चुका होता है। जब तक मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 'सबल बाई' और सिरदर्द से जुड़ी भ्रांति समाज में एक बड़ा मिथक यह भी है कि अगर सिर में दर्द नहीं है, तो ग्लूकोमा नहीं हो सकता। ग्रामीण इलाकों में इसे 'सबल बाई' भी कहा जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है, कि जरूरी नहीं कि आंखों का प्रेशर बढ़ने पर हमेशा सिर में दर्द हो। बिना किसी लक्षण या दर्द के भी ग्लूकोमा आपकी आंखों की नसों को डैमेज कर सकता है। इसलिए सिर्फ दर्द के भरोसे बैठना भारी पड़ सकता है। कैसे पहचानें शुरुआती लक्षण? डॉ. रुचिका अग्रवाल ने बताया कि, इस बीमारी में सामने की नजर तो ठीक रहती है, लेकिन आसपास (साइड) की नजर धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसका पता ऐसे चलता है कि चलते समय व्यक्ति किनारे की चीजों या लोगों से टकराने लगता है। ड्राइविंग के दौरान साइड का अंदाजा न मिलना इसका शुरुआती संकेत हो सकता है। जब तक मरीज को यह अहसास होता है कि उसे कम दिख रहा है, तब तक उसकी आंखों की नसें काफी हद तक सूख चुकी होती हैं। 40 के बाद आंखों की स्क्रीनिंग है अनिवार्य डॉक्टरों की सलाह है,कि जिस तरह लोग 40 की उम्र के बाद बीपी और शुगर की नियमित जांच कराते हैं, उसी तरह आंखों के पर्दे और नसों की जांच भी करानी चाहिए। एलएलआर अस्पताल की डॉ. शालिनी मोहन ने कहा कि, 40 वर्ष से अधिक उम्र के हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार ग्लूकोमा की विस्तृत जांच जरूर करानी चाहिए। सरकार से भी मांग की गई है कि जैसे मोतियाबिंद के लिए अभियान चलाए जाते हैं, वैसे ही ग्लूकोमा की स्क्रीनिंग के लिए भी गांव-गांव कैंप लगने चाहिए। जागरूकता के लिए 12 मार्च को 'मेट्रो वॉक' ग्लूकोमा सप्ताह के तहत लोगों को जागरूक करने के लिए कानपुर ऑप्थल्मिक सोसाइटी और रामा मेडिकल कॉलेज मिलकर आगामी 12 मार्च को एक विशेष 'मेट्रो वॉक' का आयोजन करेंगे। इस पैदल मार्च के जरिए शहरवासियों को आंखों की इस गंभीर बीमारी के प्रति सतर्क रहने का संदेश दिया जाएगा।
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