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    अखिलेश के PDA को ऐसे मात देगी भाजपा:'ट्रिपल S' फॉर्मूला, संघ देगा फीडबैक; योगी ने 6 बैठकें कीं

    7 hours ago

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    सपा के PDA की काट भाजपा ट्रिपल-S से करेगी। ट्रिपल-S मतलब है, संगठन-सरकार-संघ। आम लोगों तक यह मैसेज कैसे पहुंचाना है? इसके लिए भाजपा संगठन, सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समन्वय बैठक 28 फरवरी से 7 मार्च, 2026 के बीच 6 शहरों में हुईं। सवाल उठा कि सभी लीडर एक जगह जुटे क्यों? दरअसल, 2024 लोकसभा चुनाव में माना गया था कि तालमेल कमजोर होने से भाजपा की चुनावी गाड़ी पटरी से उतर गई। 2027 के विधानसभा चुनाव में ऐसा न हो, इसलिए समन्वय बैठकें हुईं। 4 बैठकों में संघ प्रमुख मोहन भागवत भी शामिल हुए थे। इनमें 3 बातों पर सबसे अहम चर्चा हुई… 1. UGC नियमों और माघ मेला में बटुक की चोटी खींचने के बाद ब्राह्मणों की नाराजगी का डैमेज कंट्रोल कैसे होगा? 2. BJP विधायकों का फीडबैक, देखा गया कि लोकल लेवल पर उनका तालमेल अच्छा है या नहीं। 3. BJP सांसद, विधायकों में कहां-कहां टकराव की स्थिति है? इसको कैसे खत्म किया जाना है? बैठकों में 5 पॉइंट निकले 1. 2027 और 2029 के चुनाव में परफॉर्मेंस सुधारनी है। 2. विधायकों और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करनी है। 3. BJP संगठन और सरकार के बीच तालमेल बेहतर करना है। 4. कार्यकर्ताओं को डोर-टू-डोर भेजना, सरकार के काम को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है। 5. सांसदों-विधायकों को हिदायत दी गई कि कोई भी ब्राह्मण असंतोष, UGC विवाद जैसे मुद्दे पर टिप्पणी नहीं करेगा। UGC को लेकर भाजपा से नाराजगी जनवरी, 2026 में आए UGC रेग्युलेशन से आरक्षण और अन्य नियमों को लेकर सवर्ण (खासकर ब्राह्मण) वर्ग में नाराजगी देखी जा रही है। कानपुर और गाजियाबाद की बैठक में इसे पार्टी के लिए बड़ा नुकसान बताया गया। RSS ने भी इस पर ध्यान देने की सलाह दी। हिदायत दी कि पार्टी का कोई भी नेता इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करेगा। बैठक में शंकराचार्य विवाद भी उठा माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के अपमान के बाद के घटनाक्रम का मामला भी बैठक में उठा। कहा गया कि इससे सनातन एकता अभियान पर असर पड़ सकता है। बैठक में आम लोगों की प्रतिक्रिया और इससे हिंदुत्व की छवि पर प्रभाव पड़ने का अंदेशा जताया गया। कार्यकर्ताओं और संगठन में नाराजगी बैठक में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी का भी मुद्दा उठा। कार्यकर्ताओं की ओर से बताया गया कि चुनाव में तो खूब पूछ परख होती है, लेकिन चुनाव के बाद उनकी बातों को नजरअंदाज किया जाता है। समर्पित कार्यकर्ताओं का किसी भी बोर्ड, निगम और नगर निकायों में समायोजन न होने का भी मुद्दा उठा था। इसीलिए बैठक के बाद 16 मार्च को सरकार ने नगर निकायों में 2802 पार्षद नामित कर दिए। पार्टी में गुटबाजी बढ़ी, हो सकता है बड़ा नुकसान बैठक में विधायकों-सांसदों और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती खींचतान का भी मुद्दा उठा। कई जिलों में विधायक और सांसदों में गुटबाजी की बात उठी। कानपुर, बस्ती के मामले उठे। कानपुर (अकबरपुर) के भाजपा सांसद देवेंद्र सिंह ‘भोले’ का राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला के पति और पूर्व सांसद अनिल शुक्ल से विवाद चल रहा है। इस पर संघ ने नाराजगी जताई। इसी तरह बस्ती में पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी को लेकर भी कुछ पूर्व विधायक और कार्यकर्ताओं ने गुटबाजी बढ़ाने के आरोप लगाए। गाजियाबाद में जिस तरीके से सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप वहां के विधायक नंद किशोर गुर्जर ने खुलेआम उठाए, उस पर भी चर्चा हुई। बताया गया कि सरकार जमीनी सच्चाई के लिए पूरी तरह से अफसशाही के भरोसे है। अफसरों की ओर से गलत फीडबैक दिया जा रहा। जमीन की सच्चाई सरकार तक पहुंच ही नहीं पाती। इसी तरह बुंदेलखंड में सरकार के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और विधायक ब्रजभूषण राजपूत के बीच विवाद पर भी चर्चा हुई। कहा गया कि इस तरह के विवाद से बचना होगा। इसको रोकने के लिए भी इन बैठकों में सरकार को कई सुझाव दिए गए। सीनियर जर्नलिस्ट अनिल सिंह कहते हैं- इनको सिर्फ रूटीन मीटिंग नहीं मान सकते। ये 2027 के चुनाव से पहले BJP की चुनावी रणनीति का शुरुआती ब्लूप्रिंट है। 2019 लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी ऐसी ही समन्वय बैठक हुई थीं। उनका फायदा भी मिला था। यही कोशिश 2027 के लिए की जा रही है। सारे लीडर एक प्लेटफार्म पर क्यों आ रहे? संघ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अफसर अक्सर सत्ता में बैठे लोगों को अंधेरे में रखते हैं। जमीनी हकीकत सरकार तक ठीक से नहीं पहुंच पाती। अक्सर सरकार के खिलाफ पनप रहे आक्रोश को अधिकारी तर्कों से झुठलाने की कोशिश करते हैं। जबकि, सरकार और संघ की समन्वय बैठकों में सरकार को जमीनी हकीकत के बारे में पता चलता है। यहां संघ कार्यकर्ता, भाजपा के स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि सीधे मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखते हैं। इससे सरकार को पता चलता है कि जमीन पर कौन-से मुद्दे उभर रहे हैं? कहां नाराजगी है और जनता की अपेक्षाएं क्या हैं? सीनियर जर्नलिस्ट अनिल सिंह कहते हैं- भाजपा और संघ को अलग-अलग देखना नासमझी होगी। संघ के पूर्णकालिक प्रचारक ही भाजपा के संगठन महामंत्री बनते हैं। संघ कार्यकर्ता चुपचाप, बिना दिखावे के समाज के बीच काम करते हैं। इससे उन्हें जमीनी हकीकत का सबसे साफ और बेबाक फीडबैक मिलता है। कानपुर की बैठक में ये नाराजगी सामने आई संघ सूत्रों के मुताबिक, कानपुर की समन्वय बैठक में RSS के पदाधिकारियों ने नाराजगी जाहिर की। उनका कहना था कि प्रशासन, पुलिस सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उनकी सुनवाई नहीं करते। संगठन से जुड़े कामकाज भी विभागों में नहीं होते। कानपुर की बैठक में संघ और भाजपा के बीच समन्वय की कमी भी सामने आई। ‘ट्रिपल S’ मॉडल से भाजपा जीत चुकी है कई राज्य जब सरकार-संगठन-संघ साथ चलते हैं, तो भाजपा की मशीनरी बेहद दमदार हो जाती है। 2014 के बाद कई चुनावों में इस मॉडल ने अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के एक बयान से संघ का कैडर घर बैठ गया था। तब नड्‌डा ने कहा था- अब भाजपा बड़ी और सक्षम हो गई है। इसलिए उसे हर मामले में संघ की जरूरत नहीं पड़ती, जैसी शुरुआत में होती थी। रिजल्ट आए, तो यूपी और महाराष्ट्र जैसे दो बड़े राज्यों में पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ। नतीजा यह हुआ कि भाजपा बहुमत से 32 सीट पीछे रह गई। इसके बाद भाजपा संगठन को अपनी चूक का एहसास हुआ। संघ के साथ भाजपा ने फिर रिश्ते मजबूत किए। नतीजा ये रहा कि भाजपा ने लोकसभा के बाद हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीता। अब यूपी में भी इन बैठकों के जरिए वही तालमेल मजबूत करने की कोशिश हो रही है। योगी ने संघ से बूथ स्तर पर संगठन को लेकर फीडबैक मांगा CM योगी ने इन बैठकों में संघ से बूथ स्तर के संगठन, सामाजिक पहुंच और हिंदुत्व के संदेश को लेकर फीडबैक मांगा है। साथ ही विपक्ष (खासकर सपा-कांग्रेस गठबंधन) को कैसे काउंटर किया जाए, इस पर भी मंथन हो रहा। जातीय समीकरण और सामाजिक न्याय के मुद्दे एक बार फिर तेज हो रहे हैं। ऐसे में BJP हिंदुत्व के एजेंडे को और मजबूती से आगे बढ़ाने की तैयारी में है। योगी की छवि पहले से ही हिंदुत्व के मजबूत चेहरे की है। इसलिए इसे दोबारा प्रभावी ढंग से उठाने से कोर वोटबैंक को मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर भी काम हो रहा। बैठकों में यह भी तय हुआ कि संघ और BJP मिलकर छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक समूहों के बीच काम तेज करेंगे। हाल में यूजीसी जैसे विवादों के बाद युवाओं के बीच संवाद मजबूत करने की जरूरत महसूस की गई है। संघ के सहयोगी संगठनों की रिपोर्ट भी इन बैठकों में पेश की जा रही है। RSS के 100 साल पूरे होने के मौके पर प्रदेश में बड़े कार्यक्रम चल रहे हैं, जिन्हें संगठन को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। एक्सपर्ट बोले- 2024 के नतीजों से भाजपा सतर्क समन्वय बैठकों के पीछे CM योगी और संघ प्रमुख मोहन भागवत के बीच बढ़ती बातचीत को भी माना जा रहा है। पिछले साल नवंबर में दोनों ने अयोध्या में करीब डेढ़ घंटे तक बंद कमरे में मीटिंग की थी। नवंबर में ही संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी लखनऊ आए। मंत्रियों-अफसरों के साथ विभागों की समीक्षा की। फरवरी में भी योगी और संघ प्रमुख की लखनऊ में बैठक हुई । BHU के प्रोफेसर टीपी सिंह कहते हैं- इन बैठकों का सीधा असर चुनावी नतीजों में भले न मापा जा सके, लेकिन कैडर का मनोबल बनाए रखने और संगठन को सक्रिय रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। जब कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनकी बात शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच रही, तो वे ज्यादा मेहनत करते हैं। सरकार को भी इन बैठकों के जरिए असंतोष और जनहित के मुद्दे पता चलते हैं। 2024 के नतीजों ने भाजपा को संकेत दिया कि यूपी में चुनावी समीकरण अब पहले जैसे आसान नहीं रहे। स्थानीय मुद्दे और सामाजिक बदलाव चुनाव पर गहरा असर डाल सकता है। यही वजह है कि पार्टी अभी से अपनी कमजोरियां पहचान कर संगठन को सक्रिय करने में जुटी है। -------------------------- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में भाजपा के 54% जिलाध्यक्ष सवर्ण, सपा में 70% मुस्लिम-यादव, बसपा में 92% दलित उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति सबसे बड़ा समीकरण होता है। पार्टी की जिम्मेदारी देते समय उनका भरोसा अब भी अपने कोर वोट बैंक पर ही टिका है। जिलाध्यक्षों की नियुक्तियों पर नजर डालें तो भाजपा में 54% सवर्ण, सपा में 70% मुस्लिम-यादव और बसपा में 92% दलितों को जिम्मेदारी दी गई है। पूरी खबर पढ़ें…
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