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    राम मंदिर आंदोलन के 4 संत राष्ट्रपति से सम्मानित होंगे:बोले-राम मंदिर की भव्यता ने पुलिस की यातना और संघर्ष को सुखद बना दिया

    4 hours ago

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    एक समय था कि अयोध्या की गलियों में राम-राम कहना भी दूभर था। राम मंदिर आंदोलन के अनेक चरणों में संतों ने न केवल पुलिस की यातनाएं सहीं। राम मंदिल के लिए जेल की हवा भी खाई। पुलिस से झड़प हुई। जान की बाजी लगाकर आंदोलन के दौरान पुलिस की गोलियों के बीच से होकर गुजरे। पर आज यह सब एक सुखद तस्वीर बन गई है। श्रीराम की जन्मभूमि पर राम का दिव्य और भव्य मंदिर और चारों ओर भगवान के नाम के जयकारों की गूंज सब कुछ सुखद लगने लगी ।अब सब कुछ भूल यह योद्धा राममंदिर की स्वर्णिम आभा में खो गए हैं। 19 मार्च को नव संवत्सर समारोह में आमंत्रित ऐसे ही चार योद्धाओं को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया जाएगा। दैनिक भास्कर ने इन सभी से खास बातचीत की है। यह खास रिपोर्ट पढ़िए… राम मंदिर आंदोलन के आरंभ काल से ही सक्रिय रहा आश्रम श्रीरामवल्लभाकुंज के प्रमुख स्वामी राजकुमार दास का मंदिर आंदोलन के आरंभ काल से ही आश्रम सक्रिय रहा। उस समय के महंत रामपदारथ दास वेदांती के नेतृत्व में संतों ने न केवल भागीदारी निभाई, बल्कि आंदोलन को दिशा भी दी। उनके बाद हरिनाम दास वेदांती महाराज ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने स्मरण किया कि 1984 से 1992 के मध्य वे स्वयं विद्यार्थी जीवन में जागरूकता रैलियों में सम्मिलित होते रहे। प्रशासनिक कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार आंदोलनकारियों को दूरस्थ, वीरान क्षेत्रों में छोड़ दिया जाता था, किंतु उत्साह कभी क्षीण नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि जब 2012 से 17 के बीच समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान 84 कोसी परिक्रमा का आवाहन हुआ, तब संतों को कारावास तक का सामना करना पड़ा। स्वयं वे स्वास्थ्य कारणों से जेल नहीं जा सके, परंतु अनेक संतों ने आंदोलन की लौ प्रज्वलित रखी। उनके अनुसार, राम मंदिर केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व भर के सनातन अनुयायियों के लिए गर्व का विषय है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अयोध्या आगमन पर उन्होंने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे अवसरों पर रामलला के दर्शन से अद्भुत शांति और आनंद की अनुभूति होती है। हनुमानगढ़ी के महंत बोले- निर्मोही अखाड़े ने सबसे पहले मुकदमा किया नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास ने बताया कि राष्ट्रपति के आगमन के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ है, साथ ही आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं। उन्होंने वासंतिक नवरात्र और नवसंवत्सर के अवसर पर सभी श्रद्धालुओं से रामलला के दर्शन-पूजन का आह्वान किया। मंदिर आंदोलन के ऐतिहासिक पक्ष को रेखांकित करते हुए उन्होंने निर्मोही अखाड़े की भूमिका को विशेष रूप से उल्लेखित किया। उनके अनुसार, 1885 में प्रथम मुकदमा दायर कर अखाड़े ने संघर्ष की नींव रखी, जो स्वतंत्रता के पश्चात विभिन्न न्यायालयों से होते हुए अंततः नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तक पहुंचा। इस दीर्घकालिक संघर्ष में संतों के त्याग, तपस्या और बलिदान का परिणाम आज भव्य मंदिर के रूप में साकार हुआ है। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में विभिन्न स्तरों पर संवाद और समझौते के प्रयास भी हुए, किंतु संत समाज का संकल्प अडिग रहा “मंदिर वहीं बनेगा।” आंदोलन के दौरान गिरफ्तारियां, यात्राएं और जनजागरण के अनेक आयाम जुड़े, जिनमें विश्व हिंदू परिषद सहित विभिन्न संगठनों का सहयोग रहा। आज, जब अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भव्य स्वरूप आकार ले चुका है, तब उन संघर्षपूर्ण दिनों की स्मृतियां संत समाज के लिए भावविभोर कर देने वाली हैं। यह केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं, बल्कि आस्था, धैर्य और एकजुटता की विजय गाथा है, जिसे पीढ़ियां स्मरण करती रहेंगी। ज्योतिषाचार्य राकेश दास बोले-1982 से आंदोलन से जुड़े अयोध्या के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य राकेश दास ने अपने संस्मरणों में बताया कि वे 1982 से इस आंदोलन से जुड़े रहे। 1989-90 के दौर में, जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, उन्हें 42 दिन तक गोंडा जेल में रहना पड़ा। 6 दिसंबर 1992 की घटनाओं को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय आंदोलनकारियों के साथ ऐसा व्यवहार हुआ मानो वे देशवासी नहीं, अपितु आतंकवादी, अपराधी हों। गिरफ्तारी, मुकदमे और वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बावजूद उनके मनोबल में कमी नहीं आई। उन्होंने इसे अपने जीवन का सौभाग्य बताते हुए कहा कि राम मंदिर के दर्शन से वही संतोष मिलता है, जैसा भूखे को अन्न मिलने पर होता है। प्रसिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी के सरपंच महंत रामकुमार दास ने अपने अनुभव साझा करते हुए आंदोलन की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि वर्ष 1984 से ही वे राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े रहे। जहां भी आवश्यकता पड़ी, वहां उन्होंने बढ़-चढ़कर सहभागिता की। वर्ष 1990 के उस दौर को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि जब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह बयान दिया था कि “परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा”, तब संत समाज और कारसेवकों ने संगठित होकर आंदोलन को और तेज किया। 1992 की घटना में कारसेवकों का उत्साह बढ़ाया महंत रामकुमार दास ने बताया कि हनुमानगढ़ी चौराहे पर आंदोलन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया था, जिसमें अनेक संत घायल हुए। इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने पीछे हटने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने कहा कि हनुमानगढ़ी से आगे बढ़ते हुए वे लोग बड़ी जगह तक पहुंचे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वर्ष 1992 की घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब विवादित ढांचा गिराया जा रहा था, तब वे उसी क्षेत्र में, कुछ दूरी पर उपस्थित थे और कारसेवकों का उत्साहवर्धन कर रहे थे। उस समय का वातावरण आज भी उनकी स्मृतियों में सजीव है। उन्होंने आगे बताया कि आगामी 19 मार्च को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अयोध्या आगमन के अवसर पर उन्हें भी आमंत्रित किया गया है। इसे उन्होंने अपने पूर्वज संतों के दीर्घ संघर्ष का प्रतिफल बताया। प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जिस आंदोलन के लिए संतों ने एकजुट होकर वर्षों तक संघर्ष किया, आज उसी का साकार रूप भव्य श्रीराम मंदिर के रूप में सामने है। महंत रामकुमार दास ने कहा कि अब प्रत्येक महत्वपूर्ण आयोजन में उन्हें आमंत्रित किया जाता है, जो संत समाज के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने विश्वास जताया कि 19 मार्च को राष्ट्रपति के साथ उपस्थित होकर वे इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनेंगे।
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