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    अयोध्या सुनवाई में बिजली सिस्टम की पोल खुली:3.72 करोड़ उपभोक्ताओं के लिए 132 केवीए सब स्टेशनों की क्षमता जरूरत से 2.11 करोड़ Kw कम

    2 hours ago

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    प्रदेश में 3.72 करोड़ बिजली के उपभोक्ता हैं। इतने उपभोक्ताओं के लिए प्रदेश 132 केवी सबस्टेशनों की क्षमता 8 करोड़ 36 लाख किलोवाट होनी चाहिए। लेकिन मौजूदा समय में प्रदेश 132 केवी सबस्टेशनों की क्षमता महज 6 करोड़ 25 लाख किलोवाट के बराबर है। इसी अंतर के चलते प्रदेश के सभी उपभोक्ताओं को निरंतर 24 घंटे बिजली नहीं मिल पा रही है। गर्मी में पूरा सिस्टम मिसमैच हो जाता है। ऊपर से 20 प्रतिशत बिजली की चोरी भी होती है। इसी के चलते गर्मी में बिजली की कटौती करनी ट्रांसमिशन कंपनी की मजबूरी बन जाती है। शुक्रवार दोपहर को अयोध्या सर्किट हाउस सभागार में दोपहर 12 बजे पावर ट्रांसमिशन कंपनी की वार्षिक राजस्व आवश्यकता पर बुलाई गई आपत्तियों पर सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान ट्रांसमिशन कंपनी की इन खामियों पर आयोग का ध्यान आकृष्ट कराया गया। आयोग ने कंपनी को निर्देश दिए हैं कि वह प्रदेश में ट्रांसमिशन की 132 केवीए की क्षमता को जरूरत के अनुसार बढ़ाएं। उत्तर प्रदेश नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार और सदस्य संजय कुमार सिंह की मौजूदगी में शुरू हुई सुनवाई में ट्रांसमिशन कारपोरेशन का राजस्व आवश्यकता 9596 करोड़ हैं। इसमें पावर ट्रांसमिान कंपनी का 7276 करोड़ और निजी टीबीपीबी (टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली) का 2320 करोड़ रुपए वार्षिक राजस्व जरुरत शामिल है। टीबीपीबी कुल वार्षिक राजस्व आवश्यकता का 25% है। उपभोक्ता परिषद ने आगे से टीवीसीबी व्यवस्था पर रोक लगाने का सुझाव पेश किया हे। क्या है टीबीसीबी भारत के विद्युत क्षेत्र में ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स (बिजली की ट्रांसमिशन लाइनें और सब-स्टेशन) बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक तरीका है। पहले ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स "कॉस्ट प्लस" मॉडल पर बनते थे।यहां कंपनी खर्च और साथ में मुनाफा जोड़कर टैरिफ तय करती थी। अब टीबीसीबी के तहत कंपनियां (प्राइवेट और पब्लिक) प्रतिस्पर्धा करके सबसे कम टैरिफ वाली बोली लगाती हैं। इसका फायदा ये होता है कि टैरिफ 30–40 प्रतिशत तक कम हो जाता है। प्रोजेक्ट जल्दी पूरे होते हैं और आम उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मिलती है। यह Electricity Act 2003 की धारा 63 के तहत चलता है। संविदा कर्मियों की भी छंटनी की जा रही सुनवाई में ट्रांसमिशन की राजस्व आवश्यकता का विरोध करते हुए उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने कहा 3 करोड़ 72 लाख विद्युत उपभोक्ताओं की तुलना में सभी बिजली निगम व पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन में कर्मियों और अभियंताओं की संख्या बहुत कम है। जिसे संविदा पर रखा गया, अब उसकी भी छंटनी की जा रही है। पहले कहा गया कि नियमित भर्ती नहीं हो रही है इसलिए संविदा कार्मिकों को रखा गया है। अब बड़े पैमाने पर उनकी छंटनी हो रही है। सवाल ये है कि एक तरफ उपभोक्ता बढ़ रहे हैं, तो छंटनी कैसे हो सकती है? कंपनी कहती है कि ये सरकारी कंपनी है इसका निजीकरण सरकार कर सकती है। लेकिन जब सरकार संविदा कार्मिकों को संरक्षण देने की बात करती है तो पावर कॉरपोरेशन की तरफ से चिट्ठी भेजी जाती है कि संविदा सेवा निगम से उसे अलग रखा जाए। उपभोक्ता परिषद ने बताया कि पावर ट्रांसमिशन कारपोरेशन की तकनीकी हानियां अधिक है। सिस्टम अपग्रेड नहीं है। साइबर सिक्योरिटी कमजोर है। परिषद ने मेगावाट आधारित ट्रांसमिशन सिस्टम की समीक्षा करने की बात कही। जिससे, ईंधन अधिभार शुल्क में कमी आए। थ्रोनटन कंपनी पर अमेरिका के पाास अब एमपी में भी कार्रवाई ट्रांसमिशन कंपनी की सुनवाई के दौरान परिषद की ओर से नियामक आयोग के अध्यक्ष को एमपी सरकार के एक आदेश से अवगत कराया। कहा कि यूपी के 42 जिलों की बिजली निजी क्षेत्रों को सौंपने का प्रस्ताव तैयार करने वाली कंपनी ग्रांट थ्रोनटन पर अमेरिका के अलावा अब एमपी में भी जुर्माना लगाया गया है। पहले अमेरिका पर प्रतिबंध लगाते हुए 40 हजार डॉलर की पेनल्टी लगाई गई। अब उसी कंपनी पर सितंबर 2025 में एमपी ने टर्मिनेट करते हुए बैंक गारंटी व सिक्योरिटी जब्त कर लिया है। परिषद ने मांग की कि अब आयोग को निजीकरण का प्रस्ताव खारिज कर दिया।
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