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    भातखण्डे विश्वविद्यालय में ध्रुपद कार्यशाला संपन्न:विद्यार्थियों ने आलाप-विस्तार और गमक का गहन अभ्यास किया

    4 hours ago

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    भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय में पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे पीठ के अंतर्गत आयोजित ध्रुपद कार्यशाला का तीसरा दिन संपन्न हो गया। गायन विभाग द्वारा आयोजित इस विशेष प्रशिक्षण सत्र में विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने ध्रुपद के गहन आयामों को व्यावहारिक रूप से समझा। कार्यशाला के तीसरे दिन विभागाध्यक्ष प्रो० सृष्टि माथुर, तालवाद्य विभागाध्यक्ष डॉ० मनोज कुमार मिश्र तथा सहायक आचार्य (नृत्य) डॉ० रुचि खरे सहित कई शिक्षकगण, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। आलाप-अभ्यास की शुरुआत कराई विशेषज्ञ विदुषी प्रो० मधु भट्ट तैलंग ने ध्रुपद गायन की पारंपरिक साधना में आलाप-विस्तार की क्रमिक प्रक्रिया पर विस्तार से बताया। उन्होंने तीव्र मध्य से आलाप-अभ्यास की शुरुआत कराई और ध्रुपद में प्रयुक्त गमक, वेद, संचारी जैसे महत्वपूर्ण तत्वों की व्याख्या करते हुए उनका व्यावहारिक अभ्यास कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ध्रुपद साधना में स्वर की शुद्धता, लय की दृढ़ता और क्रमबद्ध आलाप-विस्तार का विशेष महत्व होता है। सत्र के दौरान राग मालकौंस की चौताल निबद्ध रचना और द्रुत ताल की बंदिश के माध्यम से विद्यार्थियों को विभिन्न महत्वपूर्ण अंशों का अभ्यास कराया गया। साथ ही आलाप के विभिन्न जोड़ और पूर्ण आलाप की गायन प्रक्रिया का विस्तृत प्रशिक्षण दिया गया, जिससे विद्यार्थियों की व्यावहारिक समझ में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। शास्त्रीय संगीत की प्राचीन और मूलभूत परंपरा कुलपति प्रो० मांडवी सिंह ने कहा कि ध्रुपद भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्राचीन और मूलभूत परंपरा है, जो हमारी सांगीतिक संस्कृति की गहराई और आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने बताया कि ध्रुपद विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा है और ऐसी कार्यशालाएँ विद्यार्थियों को पारंपरिक संगीत साधना के अनुशासन और सौंदर्य से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। कुलसचिव डॉ० सृष्टि धवन ने कहा कि विश्वविद्यालय निरंतर शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है। ध्रुपद जैसी शास्त्रीय विधाओं से विद्यार्थियों को जोड़ना हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने भविष्य में भी ऐसे प्रेरणादायक आयोजनों के निरंतर आयोजन की बात कही।
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